
Ranchi: भाजपा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष सह राज्यसभा सांसद दीपक प्रकाश ने राज्यसभा में खान एवं कोयला मंत्रालय से झारखंड में अवैध खनन और इससे हो रहे जान-माल, राजस्व के बड़े नुकसान की जानकारी मांगी. इससे निबटने के केंद्र सरकार के द्वारा उठाये गये कदम से सम्बंधित सूचना की भी मांग की. इसके जवाब में केंद्रीय खान, कोयला एवं संसदीय कार्य मंत्री प्रह्लाद जोशी ने बताया कि खान और खनिज (विकास और विनियमन) अधिनियम, 1957 की धारा 23ग के अनुसार, राज्य सरकारों को अवैध खनन, अवैध रूप से खनन किए गए खनिजों की दुलाई एवं भंडारण पर अंकुश लगाने और इससे संबंधित प्रयोजनों के लिए नियम बनाने का अधिकार दिया गया है. राज्य सरकारों को अवैध खनन से संबंधित मामले सौंपे गए हैं. झारखंड सरकार से राज्य में अवैध खनन के विरूद्ध कठोर कार्रवाई करने के लिए कई बार अनुरोध किया गया है फिर भी उसके द्वारा कोई सक्रिय कदम नहीं उठाये जा रहे हैं. श्री जोशी ने आगे बताया कि झारखंड सरकार से प्राप्त सूचना के अनुसार, राज्य में अवैध खनन के खिलाफ़ 2019 से लेकर नवम्बर2023 तक कुल 6597 एफआईआर दर्ज की गई थी. ढुलाई में उपयोग किये गए कुल 12,280 वाहनों को जब्त किया गया है.
अवैध खनन की रोकथाम के लिए ये प्रयास
केंद्रीय मंत्री के मुताबिक झारखंड खनिज (अवैध खनन, ढुलाई और भंडारण की रोकथाम) नियम, 2017 को एमएमडीआर अधिनियम, 1957 (यथा संशोधित) की धारा 23 ग (1) और 23 ग (2) के तहत राज्य सरकार द्वारा अधिसूचित किया गया है कि राज्य में प्रमुख खनिजों के लिए खनन निगरानी प्रणाली (एमएसएस) और कोयले के लिए “खनन प्रहरी” के अलावा राज्य सरकार ने गौण खनिजों के लिए भी एमएसएस शुरू किया है. राज्य सरकार द्वारा पारदर्शिता सुनिश्चित करने हेतु ई-परमिट, ई-चालान, ई-भुगतान आदि जैसे खानों और खनिजों से संबंधित सभी प्रकार के ऑनलाइन लेन-देन के लिए झारखंड एकीकृत खान और खनिज प्रबंधन प्रणाली (जेआईएमएमएमएस) कार्यान्वित की गई है.
अवैध खनन करने पर जुर्माना
केन्द्र सरकार ने अवैध खनन पर अंकुश लगाने के लिए वर्ष 2015 में एमएमडीआर अधिनियम में संशोधन करके अवैध खनन के लिए दंड को और अधिक कठोर बनाया है. अधिनियम के तहत इसका उल्लंघन करने पर लगाये जाने वाले दंडों को 25 हजार रुपये प्रति हेक्टेयर से बढ़ाकर 5 लाख रुपये प्रति हेक्टेयर कर दिया गया है. कारावास की अवधि 2 वर्ष से बढ़ाकर 5 वर्ष कर दी गई है. एमएमडीआर अधिनियम, 1957 के तहत अवैध खनन/दुलाई/भंडारण मामलों की शीघ्र सुनवाई के लिए राज्य सरकारों द्वारा विशेष न्यायालयों के गठन का प्रावधान है. यह भी प्रावधान है कि ऐसे विशेष न्यायालयों को सत्र न्यायालय माना जाएगा.
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