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‘विश्व आदिवासी दिवस’ को भूल गयी झारखंड सरकार

एक ओर पूरी दुनिया में आज की तारीख को विश्व आदिवासी दिवस के रूप में मनाया जाता है. लेकिन, झारखंड में आदिवासी दिवस को भूला दिया गया. संयुक्त राष्ट्र संघ के द्वारा मुकर्रर की गई, यह तारीख में भारत भी हस्ताक्षरी के रूप में है. वही संयुक्त राष्ट्र संघ इन इस बार के आदिवासी दिवस का थीम ‘पलायन और विस्थापन’ रखा है.

संविधान प्रदत देश में कई कानून और आधिकार आदिवासी समाज को मिले है. वही झारखंड की कुल जंनसख्या का बड़ा हिस्सा आदिवासी समुदाय का है. ऐसे में राज्य गठन के बाद राज्य में जो भी सरकार बनी सभी ने आदिवासी दिवस को महत्व दिया था. गत वर्ष कल्याण विभाग की ओर से जारी विज्ञापन में मुख्यमंत्री का संदेश प्रकाशित हुआ था. जबकि इस वर्ष राज्य सरकार ने विश्व आदिवासी दिवस को भुला दिया, ना किसी तरह का आयोजन ना अखबारों में शुभकामनाएं प्रकाशित की गई है. और ना ही आदिवासी समाज के लिए किसी तरह की घोषणा सरकार के द्वारा की गई है. शायद सरकार यह मान चुकी है कि आदिवासी समाज पूरी तरह सत्ताधारी दल के साथ अब नहीं है. आज के रवैये ने ये संदेश भी दे दिया है.

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साल 2016 को सरकार द्वारा अखबारों में दिया गया विज्ञापन

मेरा फोन आज सुबह 6 बजे से ही बजने लगा, बहुत से सगंठन आदिवासी दिवस के संबंध में हो रहे कार्यक्रम के बारे में बताने लगे. इसी बीच आठ बजे एक संगठन से जुड़े व्यक्ति का फोन आया और कहने लगे सरकार ने आदिवासियों को भूला दिया. ऐसे में सरकार से कुछ उम्मीद करना बेकार है. आदिवासियों के हित को लेकर सरकार विभिन्न कार्यों को अमलीजामा पहुंचा रही है.
लेकिन वन अधिकार कानून, विस्थापन,पलायन जैसे मुद्दे पर सरकार की ओर से विशेष ध्यान नहीं दिया जा रहा है. वही भूमि अधिग्रहण कानून 2017 को कानून के रूप में लाना, स्थानीय नीति, लैंड बैंक और विस्थापन जनित सरकारी योजनाएं जिससे जल,जंगल, जमीन पर संकट के साथ-साथ आदिवासी समाज पर ही संकट है. ऐसे में सरकार से किसी तरह की उम्मीद करना बेकार है. सरकार अब सीधे-सीधे आदिवासियों को राज्य से समाप्त करने की रणनीति अपना रही है. ऐसे में समाज को खुद संगठित होना होगा और अपने हक और अधिकार के लिए लड़ना होगा.

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राज्य की राजधानी से लेकर विभिन्न जिलों में अलग-अलग जन संगठन आदिवासी समूहों के द्वारा विश्व आदिवासी दिवस पर कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं. एक ओर नेतरहाट फील्ड फायरिंग संघर्ष विरोधी समिति नेतरहाट टूटूआपानी में अधिकार दिवस के रूप में मानने का निर्णय लिया है. वहीं संताल परगना में भी आदिवासी संगठन, विश्व आदिवासी दिवस को आदिवासी अधिकार दिवस के रूप में मना रहे हैं. वही रांची में भी विभिन्न सामाजिक संगठन के द्वारा विश्व आदिवासी दिवस का आयोजन किया जा रहा है जिसमें रैली से लेकर सांस्कृतिक कार्यक्रम और आदिवासी अधिकारों पर हो रहे प्रहार पर विमर्श भी शामिल है.

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‘सरकार भूली या जानबूझकर भुलाने की हुई कोशिश’

आदिवासी दिवस पर सरकार की ओर से शुभकामना ना देने के सवाल पर लम्मी नारायण मुंडा का मानना है कि जानबूझकर कर आदिवासी दिवस को सरकार द्वारा भुलाने की कोशिश की गयी है. ऐसे में आदिवासी अब खुद ही सोचे कि राज्य में उनकी स्थिति क्या है. आदिवासियों के काल्याण की बात और योजना सिर्फ आई वॉश है. यह फिर मुख्यमंत्री समझा चुके है कि आदिवासी समाज उनकी पार्टी के साथ नहीं आयेगी. इसलिए इस दिन को सरकार ने भुलने की कोशिश की है.

ये लेखक के निजी विचार हैं

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