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मीडिया पर संपूर्ण नियंत्रण का इरादा अभिव्यक्ति की आजादी पर पहरा

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Faisal Anurag

इमरजेंसी के दौरान लाल कृष्‍ण आडवाणी ने कहा था, मीडिया को झुकने के लिए कहा गया तो वह रेंगने लगा. मीडिया के लिए यह उक्ति आज भी प्रासंगिक है. पिछले कुछ समय से मीडिया पर भारी दबाव है और आलम यह है कि सरकार बहादुर के बारे में कोई भी आलोचनात्‍मक टिप्‍पणी नागवार मानी जा रही है. जून महीने में आपातकाल के बरसी पर सत्तारूढ़ दल ने जी भरकर लोकतंत्र का पक्ष लिया और मीडिया पर तब पड़े दबाव की चर्चा की. लेकिन मीडिया संस्‍थानों के भीतर काम करने वालों को मालूम है कि आज के हालात भिन्‍न नहीं है. पहले तो मीडिया संस्‍थानों पर एकाधिकार स्‍थापित कर नियंत्रित करने का प्रयास हुआ, लेकिन बात यहीं तक नहीं ठहरी, व्‍यक्तियों को भी निशाना बनाया जाना शुरू किया गया. प्रिंट और विजुअल के कई दर्जन पत्रकार अभिव्‍यक्ति के कारण नौकरी खो चुके हैं. संस्थानों पर दबाव डालकर ऐसे लोगों की पहचान की गयी है. जो रेंगने के लिए तैयार नहीं हैं. या तो उन्‍हें मुख्‍यधारा पत्रकारिता से अलग कर दिया गया है या नौकरी से मुक्‍त.

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दुनिया के अनेक देश ऐसे हैं, जहां मीडिया को आजादी नहीं दी गयी है. अमरीका में मीडिया और प्रसिडेंट  के बीच तनाव की खबरें लगातार आती हैं. ट्रंप तो लगातार अमेरिकी मीडिया की आलोचना करते हैं. बावजूद इसके अमेरिकी मीडिया ने ट्रंप के खिलाफ लिखना या बोलना बंद नहीं किया है. ट्रंप की अनेक नीतियों की जैसी खुली आलोचना अमेरिका में हो रही है, वह वहां के मीडिया संस्‍थानों और पत्रकारों के साहस और अभिव्यक्ति की आजादी के प्रतिब्ध्ता का परिचायक है. इसी तरह ब्रिटेन के अखबार भी अपनी गरिमा की रक्षा के लिए लगातार संघर्ष करते रहते हैं. हालांकि ब्रिटेन के कई बड़े अखबारों की अपनी पक्षधरता है और वे उसी अनुरूप आचरण भी करते हैं. पश्चिम के अनेक देशों में मीडिया की आजादी लोकतंत्र की हिफाजत में बड़ी भूमिका निभाती है और वहां का पाठक और दर्शक समूह भी इस आजादी की हिफाजत के लिए सक्रिय रहता है. लंबे समय के लोकतांत्रिक परिवेश के कारण मीडिया की आजादी की भूमिका है और उन देशों में आलोचनाओं का महत्‍व है. लेकिन दुनिया के अनेक हिस्‍सों में मीडिया की स्थिति सहज नहीं है और न ही पाठक दर्शक समूहों में इसे लेकर सजगता है. मीडिया को सरकार का प्रचारतंत्र बना दिया गया है और सरकारों की आलोचना के लिए उसमें जगह नहीं है. आजादी के संघर्ष के दौरान भी भारत में मीडिया की स्वतंत्रता के लिए अनेक लोगों ने संघर्ष किया और इसके लिए यातनायें झेली, आजादी के बाद भारत ने लोकतांत्रिक गणराज्‍य बनने का संकल्‍प लिया और इसमें मीडिया की स्‍वतंत्रता और अभिव्‍यक्ति की आजादी को अहम माना गया, भारत के संविधान में भी अभिव्‍यक्ति की स्वतंत्रता को महत्व दिया गया. एक समय ऐसा भी भारत में रहा है, जब प्रधानमंत्री  जवाहर लाल नेहरू छद्म नाम से खुद अपनी सरकार की आलोचना अखबारों में करते थे.

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यहां तक की नेहरू पर कार्टून बनाने वालों को नेहरू आतंकित कर बात करते थे और इस तरह की आलोचना के लिए प्रोत्‍साहित करते थे. लेकिन 1975 से 197 की शुरूआत तक मीडिया पर स्‍वतंत्रता की अलोचना पर प्रतिबंध लगा दिया गया, और सरकारी अधिकारी समाचारों की देखरेख करने लगे. अनेक पत्रकारों को इस अवधि में जेल भी जाना पड़ा, लेकिन इंदिरा गांधी के पराजय के बाद हालात बदले. बीते दिनों में मीडिया के कइ समूहों ने सरकार के खिलाफ अनेक मामले प्रकाश में लायें और सरकारों के खिलाफ खूब लिखा. लेकिन तब ऐसी शिकायतें नहीं सामने आयी. हालांकि इसके भी अपवाद हैं. लेकिन अब हालात तेजी से बदले हैं.

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शासकों का वर्तमान समूह अपने सरकारी विज्ञापन की ताकत का इस्‍तेमाल कर कॉरपोरेट के सहयोग से संपूर्ण मीडिया नियंत्रण की रणनीति पर लगभग सफल होता जा रहा है. कई राज्‍यों में तो सरकार के लोग ही तय करते हैं कि टीवी पर क्‍या दिखाया जाएगा या अखबारों में क्‍या छपेगा और क्‍या नहीं. बात सिर्फ इतनी नहीं है. मीडिया संस्‍थानों में सरकारों के समर्थक समूहों की सुनियोजित नियुक्तियों ने भी हालात को सरकारों के अनुकूल बना दिया है.  इसमें पहली बात यह हुई है कि विपक्ष को खलनायक बनाने, विमश्र के सवाल और संदभ्र को मानों अनूकूल करने की होड़ लगी हुयी है. चारों ओर से प्रायोजित सूचनाओं के हमले से आवाम के दिमाग को प्रभावित करने का प्रयास सुनियोजित तरीके से किया जा रहा है.

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खंडेकर, वाजपेयी और अभिसार की परिघटना इसी की परिणति है. यह उन लोगों के लिए भी संदेश है जो अब भी न तो झुकने के लिए तैयार हैं और ना ही रेंगने के लिए. मीडिया पर खास कॉरपोरेट नियंत्रण की प्रक्रिया लगातार बढ़ती जा रही है.  संसद के गलियारे में भाजपा के शीर्ष नेताओं की एक बात इस प्रकरण के बाद खूब चर्चा में है, जिसमें उस नेता ने कई पत्रकारों की उपस्थिति में कहा था कि वह उस चैनल  को जल्‍दी दुरूस्त कर देंगे, जो इन एंकरों को रखे हुए है. इस तरह की खुली कार्रवाई तो आपातकाल में भी नहीं हुयी थी.

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