
Ranchi: विकास के पैमाने पर झारखंड खरा नहीं उतर पाया है. पिछले चार साल में बुनियादी सुविधाओं से जुड़े एक भी बड़े प्रोजेक्ट पूरे नहीं हो पाये हैं. सिर्फ प्रोजक्टों को पूरा करने की डेडलाइन ही तय की गयी है. जलसंसाधन, पेयजल, सड़क, बिजली, सहित कई प्रोजेक्ट को मार्च 2016 तक पूरा करने का समय तय किया गया था, लेकिन 2019 में भी ये प्रोजेक्ट पूरे नहीं हो पाये. प्रदेश में लगभग 50 हजार करोड़ के प्रोजेक्ट जमीं पर नहीं उतर पाये हैं. इसके पीछे उद्योगों को कोल ब्लॉक का आबंटन नहीं होना, पानी उपलब्ध नहीं होना और जमीन का नहीं मिलना प्रमुख समस्या है. वहीं कई प्रोजेक्ट्स पर अब तक फॉरेस्ट क्लीयरेंस का पेंच फंसा हुआ है.
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पेयजल में 2000 करोड़ की योजना पूरी नहीं
प्रदेश में पानी पिलाने की लगभग 2000 करोड़ की योजना अब तक पूरी नहीं हो पाई है. लघु ग्रामीण पाइप जलापूर्ति के लिये 621 योजना शुरू की गई थी. इसे मार्च 2016 तक पूरा किया जाना था, यह भी पूरा नहीं हो पाया. इसकी तरह 34 बहु ग्रामीण जलापूर्ति योजना को मार्च 2016 तक पूरा किया जाना था, यह भी पूरा नहीं हो पाया. राज्य में सिर्फ 20 फीसदी ग्रामीणों को ही नल का पानी मिलता है. वहीं 50 से अधिक जलापूर्ति योजनाएं कागजों में ही सिमट कर रह गई हैं.
1100 करोड़ की योजनाएं लंबित
पेयजल की 1100 करोड़ की योजनायें अब तक लंबित है. योजनाओं के क्रियान्वयन में पड़ने वाले वन विभाग की जमीन, एनएच की जमीन सहित अन्य संस्थाओं की जमीन का अधिग्रहण सबसे बड़ी बाधा है. अब तक एनओसी नहीं मिल पाई है. इसमें जमीन सबसे बड़ी बाधा है. इसके कारण 630 करोड़ की गोविंदपुर नार्थ साउथ जलापूर्ति योजना, 138 करोड़ की साहेबगंज मल्टीविलेज जलापूर्ति योजना और 300 करोड़ की पांकी-छत्तरपुर-लेस्लीगंज जलापूर्ति योजना लंबित हैं.
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जलसंसाधन विभाग में 7000 करोड़ की योजनाएं अधूरी
जलसंसाधन विभाग में लगभग 7000 करोड़ की योजनाएं पूरी नहीं हो पाई हैं. सिंचाई की मध्यम और बड़ी परियोजनाओं में आज की तारीख तक 6302 करोड़ रुपये खर्च हो चुके हैं. लेकिन 13 फीसदी ही सिंचाई की सुविधा उपलब्ध है. 88 फीसदी खेतों में पानी नहीं पहुंच पाया है.
अंतर्राज्यीय अड़चन भी बड़ी बाधा
अंतर्राज्यीय समझौते के कारण झारखंड के जलाशयों में जमा पानी, पड़ोसी राज्यों को देना पड़ता है. प्रदेश का अधिकांश हिस्सा पठारी है. नदियों में बराज, डैम, चेकडैम के उचित स्थान में निर्माण नहीं होने के कारण पानी बह जाता है. वहीं चार नदियों को जोड़ने वाली योजना भी ठंढे बस्ते में चली गई. कई जलाशयों के पानी को लेकर पड़ोसी राज्यों से अब तक विवाद बना हुआ है.
इन परियोजनाओं का काम पूरा नहीं
स्वर्णरेखा परियोजना- 6613.74 करोड़, अजय बराज- 331 करोड़,गुमानी- 162 करोड़, कोनार- 348.38 करोड़, पुनासी- 185 करोड़, अमानत- 341 करोड़, सुकरी- 07 करोड़, सोनुआ- 83 करोड़, अपर शंख- 141.19 करोड़, सुकरी- 9.35 करोड़, रैसा- 67.68 करोड़, सोनुआ- 8.92 करोड़, सुरंगी-41.17 करोड़, पंचखेरा- 75.68 करोड़, भैरवा- 118.30 करोड़, नकटी- 31.5 करोड़, रामरेखा- 53.86 करोड़, केसो- 131 करोड़.
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खदानों में भी है पेंच, सालाना 1120 करोड़ का नुकसान
एक तरफ राज्य सरकार उद्योगों के विस्तारीकरण और उसे बढ़ावा देने की बात कर रही है. मोमेंटम झारखंड के साथ तीन बार ग्राउंड ब्रेकिंग सेरेमनी भी हुई. सौ से अधिक एमओयू भी किये गये. लेकिन खदानों खासकर आयरन ओर और कोल ब्लॉक खुलने में अब भी पेंच फंसा हुआ है. खदाने खुलतीं तो 6000 करोड़ रुपये से अधिक की रॉयल्टी भी आती. वर्तमान में 62 कोल ब्लॉक में से 40 का लाइसेंस अब भी लंबित है. सालाना 1120 राजस्व का नुकसान भी हो रहा है. आयरन ओर की 32 और कोयले की 20 खदानें अब तक बंद हैं. खदान बंद रहने के कारण लगभग एक लाख लोगों को रोजगार नहीं मिल पाया है.
राज्य में कितना है कोयले का रिजर्व
राज्य में 80.36 बिलियन टन कोयला रिजर्व है. सीसीएल को आवंटित खदानों में 42.37 बिलियन टन कोयला रिजर्व है. बीसीसीएल को आवंटित खदानों में 19.43 बिलियन कोयला रिजर्व है. ईसीएल को आवंटित खदानों में 18.56 बिलियन टन कोयला रिजर्व है.
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इन विभागों के प्रोजेक्ट भी हैं लंबित
पावर सेक्टर में 56000 करोड़ का प्रोजेक्ट लंबित
पथ विभाग में 5000 करोड़ के प्रोजेक्ट का काम पूरा नहीं
बिजली व्यवस्था सुधार में 14 हजार करोड़ का एक्शन प्लान पूरा नहीं
उद्योग विभाग में तीन लाख करोड़ का एमओयू हुआ, सिर्फ 10 से 15 हजार करोड़ के प्रोजेक्ट पर चल रहा है काम




