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पूर्व स्पीकर शशांक शेखर भोक्ता की व्यथा: केवल आदिवासियों का ही नहीं, मूलवासी, दलित, पिछड़ों का भी झारखंड आंदोलन में रहा योगदान

Ranchi: दुमका में झामुमो का 46वां स्थापना दिवस रविवार को मनाया गया. सीएम हेमंत सोरेन ने इस दौरान झारखंड आंदोलन के लिए अलग राज्य को लड़ाई में आदिवासियों को अगुवा बताया. केंद्र द्वारा झारखंड की हकमारी किये जाने का मसला रखा. इस बीच पूर्व स्पीकर और झामुमो सदस्य शशांक शेखर भोक्ता ने अपनी व्यथा सोशल मीडिया के जरिए साझा की है. कहा कि 34 साल से चला आ रहा 2 फरवरी का झारखंड स्थापना दिवस का सिलसिला टूट गया. टूटना ही था. क्षेत्रीय पार्टियां पारिवारिक पार्टी के रूप में काम करती हैं जहां सामूहिक निर्णय नहीं होकर व्यक्तिगत निर्णय होते हैं. भले ही उसे सामूहिकता का लबादा ओढ़ाकर पेश किया जाता हो. राजा के कनखियों के इशारे पर टिका संगठन. आम कार्यकर्ता जाए तो कहां जाए. शशांक के मुताबिक, उनकी पार्टी (झामुमो) ने मुझे बहुत कुछ दिया. उन्होंने भी अपने जीवन का बेहतरीन काल पार्टी के उत्थान में लगाया. कोई जाने या न जाने, जनता तो जानती है. आज पार्टी शायद नई पीढी की पार्टी बनना चाहती है. आवश्यकता भी है. पुरानी पीढ़ी की आवश्यकता सत्ता प्राप्ति तक ही वाजिब होता है. स्वतंत्रता आन्दोलन के बाद कितने आंदोलनकारी कांग्रेसी गांव-गलियों में खो गए. राजा-महाराजाओं ने पार्टी और सत्ता पर कब्जा कर लिया जो समय के साथ भाजपा की गोद में जाकर बैठ गए.

केवल आदिवासियों को क्रेडिट देना ठीक नहीं

पूर्व स्पीकर ने कहा कि वे झारखंड आंदोलनकारी हैं, इसका उन्हें फख्र है. भले ही माननीय मुख्यमंत्री ने कहा कि झारखंड की लड़ाई  आदिवासियों ने लड़ी. निश्चित रूप से आदिवासियों ने आंदोलन की शुरुआत मारांग गोमके जयपाल सिंह मुंडा के नेतृत्व में की. निर्णायक रूप से गुरूजी शिबू सोरेन के नेतृत्व में लड़ा. क्रमशः मूलवासी, दलित, पिछड़ों, अल्पसंख्यकों की भी झारखंड निर्माण आंदोलन में भागीदारी  थी. कुर्बानियां भी इस कौम ने सबसे ज्यादा दी. पर ये भी सत्य है कि शहीद निर्मल महतो, स्व.बिनोद बिहारी महतो, स्व.ए के राय, शहीद सुनील महतो की भूमिका के उल्लेख के बिना झारखंड आंदोलन की कल्पना भी नहीं की जा सकती. 1994 में झारखंड आंदोलन में शहीद श्याम सुंदर सिंह के शहादत को भुलाया नहीं जा सकता. गुरुजी शिबू सोरेन ने आंदोलन को नायक की भांति एक स्पष्ट दिशा दी.

शशांक ने स्पष्ट करते कहा है कि वे झारखंड मुक्ति मोर्चा के सदस्य हैं. जिला, प्रखंड समितियों की उदासीनता से उन्हें फर्क पड़ता नहीं. एक आंदोलनकारी को किसी सिफारिश की आवश्यकता नहीं है. पार्टी और पार्टी आलाकमान के प्रति निष्ठा बरकरार है. राज्य और जनता के हित में सवाल और संवाद भी जारी रहेगा.

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