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कौन जीतेगा यह तो तय नहीं, लेकिन चुनाव आयोग तो हार ही गया है

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Faisal Anurag

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यह पहला अवसर ही है जब किसी चुनाव की प्रक्रिया की स्ववंत्रता और निष्पक्षता को लेकर इतने सारे सवाल उठे हैं. चुनाव आयोग पर केवल विपक्षी दलों ने ही सवाल नहीं उठाये हैं.

बल्कि देश के कई अन्य तबकों ने पूरी प्रक्रिया को लेकर तीखे सवाल उठाये हैं. मीडिया की खबरों के अनुसार, इसी सवाल को लेकर चुनाव आयुक्तों में भी मतभेद गहरा गया है.

एक मीडिया रिपोर्ट में कहा गया है कि मुख्य चुनाव आयुक्त से असहमत चल रहे एक चुनाव आयुक्त अशोक लवासा 4 मई से आयोग कार्यालय नहीं आ रहे. लवासा ने प्रधानमंत्री और अमित शाह को दिए गए क्लीन चीट की प्रक्रिया और निर्णय पर असहमति जतायी थी.

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लवासा ने मुख्य चुनाव आयुक्त को पत्र लिख कर कहा है कि अल्पसंख्यक मत को भी दर्ज किया जाना चाहिए और आयोग के अधिकृत दस्तावेजों में इसका प्रमुखता से उल्लेख किया जाना चाहिए.

मीडिया में आयी खबरों की मानें तो अशोक लवासा ने इस बात को लेकर कई बार मुख्य चुनाव आयुक्त को पत्र लिखा है. लेकिन मुख्य चुनाव आयुक्त ने इसका कोई जबाव नहीं दिया. लवासा इसी का विरोध करते हुए दफ्तर नहीं जा रहे हैं.

कहा जा रहा है कि लवासा ने स्पष्ट कहा है कि जब तक उनके मत को दर्ज नहीं किया जाता है, वे आयोग कार्यालय नहीं जायेंगे. खबर तो ये भी है कि लोकसभा चुनाव के पहले तीन चरणों में आयोग की एक भी बैठक नहीं हुई थी.

चुनाव आयोग अभूतपूर्व संकट में है. विपक्षी दलों ने मोदी सरकार पर तमाम संवैधानिक संस्थाओं को कमजोर करने का जो आरोप लगाया है, वह अनेक संवैधानिक संस्थाओं के विवाद के बाद प्रमाणित भी होता जा रहा है.

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जब सुप्रीम कोर्ट के चार जज ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर आम जनता से लोकतंत्र बचाने की गुहार की थी, तब पूरे देश में बहस खड़ी हुई थी. प्रेस कॉन्फ्रेंस भारत की संवैधानिक संस्थाओं की स्वतंत्र कार्यशैली को प्रभावित करने के बारे में ही था.

वर्तमान चीफ जस्टिस भी हाल में कह चुके हैं कि कुछ बेहद प्रभावशाली ताकतें सक्रिय हैं, जो कार्यशैली को प्रभावित करने की कोशिश कर रही है.

चार जजों की उस प्रेस कॉन्फ्रेंस में भी रंजन गोगाई मौजूद थे. और पत्रकारों के सवाल के जबाव में उन्होंने ही जस्टिस लोया की हत्या के मामले को प्रभावित करने की बात कही थी.

सीबीआई का विवाद भी बेपर्द होकर सामने आ चुका है. उस विवाद के बाद के घटनाक्रम ने भी सीबीआई पर सरकार के इशारे के अनुकूल कार्य करने के दबाव के आरोप को ही पुष्ट किया है.

पूर्व सीबीआई निदेशक आलोक वर्मा ने तो रिटायर होने के बाद एक मामले में सरकार के दबाव की चर्चा कर अनेक सवालों को खड़ा किया. सीएजी जैसी संस्था भी रफाल मामले को लेकर विवाद में आयी. सीएजी पर खुला आरोप लगा.

2019 के आमचुनाव के शुरू होने के पहले से ही चुनाव आयोग विवादों के घेरे में आने लगा. चुनाव आयोग ने आचार संहिता को लागू करने में अनावश्यक विलंब किया.

इसे लेकर कहा गया कि चुनाव आयोग ने प्रधानमंत्री मोदी के पूर्वनियोजित सभाओं के खत्म होने का इंतजार किया और उसके बाद ही चुनाव की प्रक्रिया के शुरू करने का ऐलान किया.

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चुनाव के कार्यक्रम को लेकर भी चुनाव आयोग की भूमिका पर संदेह किया गया. कांग्रेस के अध्यक्ष राहुल गांधी ने तो अनेक साक्षात्कारों के माध्यम से कहा कि चुनाव के कार्यक्रम नरेंद्र मोदी को ध्यान में रख कर ही बनाये गये. राहुल गांधी के इस आरोप को अनेक दूसरे नेताओं का भी समर्थन मिला.

नेताओं के आरोप लगाने के पहले ही सोशल मीडिया पर इस तरह के सवाल उठाये गये. आचार संहिता के उल्लंघन के मामले में आयोग की कार्रवाई तो सबसे ज्यादा विवाद का विषय बनी है.

चुनाव आयोग के निर्णयों में यह साफ दिखता है कि उसने भारतीय जनता पार्टी के नेताओं के खिलाफ की गयी शिकायतों पर न केवल नरमी दिखायी है, बल्कि विपक्षी नेताओं को नोटिस भेजने और कार्रवाई करने में तत्परता दिखायी है.

प्रधानमंत्री पर सेना के चुनावी इस्तेमाल और धार्मिक सवालों को उठाने के तमाम शिकायतों को खारिज कर उन्हें पाकसाफ करार दिया. हालांकि फैसला सर्वसम्मति से नहीं लिया गया. तीन आयुक्तों में एक ने इसका विरोध किया.

चुनाव आयुक्त लवासा का दर्द यही है कि उनके विरोध को दस्तावेज में दर्ज भी नहीं किया गया है. मुख्य चुनाव आयुक्त खासतौर पर विवाद के केंद्र में उभर कर आए हैं.

पश्चिम बंगाल के संदर्भ में लिये गये फैसलों पर भी विवाद गहराया. आयोग ने बंगाल में चुनाव प्रचार की प्रक्रिया पर रोक लगाने के पहले प्रधानमंत्री के निर्धारित दो आम सभाओं को हाने दिया.

आयोग से यह सवाल पूछा गया कि यदि बंगाल की हालत उसे इतनी ही खराब लगी तो उसने तत्काल ही चुनाव प्रचार पर रोक क्यों नहीं लगायी. आयोग ने इसका कोई जबाव भी देना जरूरी नहीं समझा.

कोलकाता में शाह के रोड शो में जिस तरह के धार्मिक प्रतीकों का खुला प्रदर्शन किया गया, उस पर आयोग की चुप्पी को लकर उसकी आलोचना की गयी है. चुनाव आचार संहिता नियमों के अनुसार, धार्मिक प्रतीकों का इस्तेमाल गैर कानूनी है.

चुनाव आयोग का विवादास्पद होना और उसके आंतरिक विवाद का इस तरह सार्वजनिक होना देश की निष्पक्ष चुनाव प्रणाली को तो संशय में डाल ही रहा है लोकतंत्र को भी नुकसान पहुंचा रहा है.

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