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संदेह किया जा रहा है कि चुनाव आयोग के तरीकों से राजनीतिक हिंसा पर अंकुश संभव नहीं

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Faisal Anurag

दरअसल राजनीतिक हिंसा को लेकर राजनीतिक दलों का दोहरापन बारबार उजागर होता है. बंगाल तो कई दशकों से चुनाव में भी और चुनावों के बाद राजनीतिक हिंसा का शिकार प्रदेश रहा है. सत्तर के दशक के बाद बंगाल के लिए इसमें कुछ भी नया नहीं है. लेकिन बंगाल के शोर में त्रिपुरा में हुई हिंसक घटनाओं को और उत्तर प्रदेश की घटनाओं पर कोई खास चर्चा ही नहीं है.

बंगाल की हिंसा में चूंकि केंद्र और राज्य के सत्तापक्ष का टकराव दिख रहा है. यह टकराव एकतरफा नहीं दिख रहा है. ईश्वरचंद्र विद्यासागर की प्रतिमा का तोड़ा जाना एक बड़ी घटना है. विद्यासागर की प्रतिमा को तोड़ने के समय का जो वीडियों दिख रहा है वह अमित शाह के आरोपों से अलग कहानी बयान करता है.

इस घटना की फौरी जांच कराये बगैर चुनाव आयोग ने जो तत्परता दिखायी है वह निष्पक्षधता के धरातल पर खरी नहीं दिखती है. यदि बंगाल की हालत चुनाव आयोग की निगाह में बेहद खराब है तो उसने तुरंत से ही चुनाव प्रचार पर रोक क्यों नहीं लगाया.

उसमें एक और दिन की मोहलत देना उस अवधि में प्रधान मंत्री मोदी की निर्धारित रैली को लेकर यदि सवाल उठ रहे हैं तो उसे नजरअंदाज भी नहीं किया जा सकता है. ऐसे अनेक मामले चुनाव के दरम्यान आये हैं. जिसमें आयोग का एकपक्षीय नजरिया बार-बार उजागर हुआ है.

इस चुनाव आयोग ने त्रिपुरा की घटना को क्यों नजरअंदाज किया जब कि वहां ज्यादा व्यापक हिंसा हुई है. इसी तरह यूपी मे अदिति सिंह नाम की विधायक के खिलाफ हुई हिंसा पर आयोग चुप क्यों है. आयोग से अपेक्षा की जा रही है कि वह अपने कदमों के बारे में सफाई दे.

चुनाव आयोग के बंगाल संबंधी फैसले को ले कर राजनीतिक दलों में जिस तरह की तीखी प्रतिक्रिया हुई है उसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है. लेकिन इन सवालों का दीर्घकालिक असर भी है. इस बहस को केंद्रित किये जाने की जरूरत है. राजनीतिक दलों की प्रक्रिया से किस तरह अतितवादी रुझान एक हिंसक उग्रवाद में बदला जा रहा है. इसे आकस्मिक घटना नहीं माना जा सकता है.

जब राजनीति को धर्म केंद्रित किया जायेगा तो इसके परिणाम भी इसी दिशा में जायेंगे. बाबरी मस्ज्दि विध्वंस के बाद के घटनाक्रम पर निगाह डालते ही सारा परिदृष्य स्पष्ट हो जाता है. यदि एडीआर की रिपोर्ट को भी ध्यान से देखा जाये तो गंभीर किस्म के अपराधियों और अपराधों में शामिल हुए लोगों के प्रति राजनीतिक दलों का नजरिया घुटना टेकू ही बना हुआ है.

पिछले पांच सालों में इस देश ने ही देखा है कि रेपिस्टों के बचाव में किस तरह कुछ बड़े नेताओं की भूमिका रही है. यही नहीं रेप के मामलों को उठाने में भी राजनीतिक नजरिया और प्रतिबद्धता साफ दिखती है. प्रधानमंत्री मोदी के लिए अलवर की घटना अहम है, क्योंकि राजस्थान कांग्रेस शासित है लेकिन जम्मू और गुजरात की घटनाओ पर उनकी खामोशी सर्वविदित है.

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यूपी के एक भाजपा विधायक का मामला जिस तरह सामने आया था उसमें भी मोदी और योगी दोनों की खामोशी जाहिर है. यहां तक कि वह विधायक आज तक भाजपा का सदस्य बना हुआ है. इसी तरह की कुछ अन्य घटनाओं का भी उल्लेख किया जा सकता है, जिसमें दूसरे राजनीतिक नेताओं की भूमिका का आकलन किया जा सकता है.

राजनीतिक हिंसा को रोकने में यदि लोकतंत्र की संस्थाएं सार्थक भूमिका नहीं निभा रही हैं, तो बीमारी की गंभीरता को समझा जाना चाहिए. भारत के ही अनेक राज्यों में चुनावों के समय होने वाली हिंसा में जबरदस्त कमी आयी है. खास कर टीएन शेषण के चुनाव आयुक्त के कार्यकाल में शुरू प्रक्रिया का ही यह परिणाम है.

इसका यह अर्थ नहीं है कि राजनीति की प्रक्रिया में अंतरनिहित हिंसा पूरी तरह खत्म हो गयी है. इस संदर्भ में कई अनेक महत्वपूर्ण आयाम हैं. जिसका अध्ययन किये जाने की जरूरत है. आम चुनाव को हिंसक बनाने के लिए राजनीतिक दलों की ओर से प्रयास किया जाता रहा है. भारत की राजनीति में जिस तरह असामाजिक तत्वों को राजनीतिक दल पनाह देते हैं, उससे यह उम्मीद नहीं की जा सकती है कि इस तरह के तत्व राजनीतिक विचारों के वाहक बनेंगे.

भारत की राजनीति में आपराधिक तत्वों को सम्मान के साथ पार्टियां  टिकट देती हैं. यदि राजनीति और अपराधिक तत्वों के अंतरसंबंध को देखा जाये तो उसमें पिछले पांच सालों में एक बड़ा बदलाव आया है. लुंपेन और असामाजिक तत्व के भीतर खास तरह का अतिवाद पैदा किया गया है.  सत्तर के दशक में जब अपराधियों ने राजनीति में दखल दिया था तब वे ज्यादातर सामंती व्यवस्था के हिस्से थे. पहले तो नेताओं ने व्यतिगत रूप से अपराधियों की मदद ले कर उस दौर में चुनावों में जीत का रास्ता तय किया.

लेकिन बाद में वे ही राजनीतिक दलों के नेता के रूप में स्वीकार कर लिये गये. इन अपराधिक तत्वों को मंत्रीपरिषद में भी जगह दी गयी है.

यदि लोकतांत्रिक मूल्यों को राजनीतिक आचरण का हिस्सा बनाने में चूक की जायेगी तो इस तरह की प्रवृति अंकुश से बाहर ही रहेगी. राजनीति को सांप्रदायिक ध्रुवीकरण से मुक्त किये जाने की जरूरत पर बार-बार जोर दिया गया है.

भारत की राजनीति में शायद यह चुनाव इस अर्थ में विशिष्ट है कि जरूरी मुद्दों पर संवाद करने से प्रचार तंत्र और सत्ता पक्ष के साथ विपक्ष का भी बड़ा हिस्सा परहेज कर रहा है. लोकतंत्र और निष्पक्ष चुनाव के लिए इस पर तत्काल अंकुश लगाने की राजनीतिक प्रक्रिया की जरूरत है.

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