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मोदी की राह इस बार आसान नजर नहीं आ रही

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Girish Malviya  

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कल 16 मई थी, पांच साल पहले 16 मई 2014 को ही मोदी सरकार को एक स्पष्ट मेंडेट मिला था, लेकिन इस बार देखें तो मोदी की राह उतनी आसान नजर नहीं आ रही है, पिछली बार मोदी जनता के लिए एक साफ स्लेट के समान थे. लेकिन इस बार उस स्लेट पर पिछले पांच सालों के कामकाज का लेखाजोखा है!,…एंटीएनकबन्सी है!…

बहुत से लोग भूल रहे हैं कि 2014 के अधिकतर मुकाबले बहुकोणीय थे, लेकिन इस चुनाव में राज्यों के स्तर पर विभिन्न गठबंधनों के चलते ज्यादातर आमने-सामने का मुकाबला है, 2014 में बीजेपी को बड़ा फायदा बहुकोणीय मुकाबलों में ही हुआ…31 प्रतिशत वोट हासिल करते हुए 282 सीट पर कब्जा जमा लेना इन्ही बहुकोणीय मुकाबलों के कारण ही सम्भव हो पाया था. लेकिन इस बार परिस्थितियां बीजेपी के पक्ष में नहीं हैं, बशर्ते कोई अंडर करंट काम नहीं कर रहा हो….

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भाजपा से लड़ने का मन बनाए हुए विपक्ष में मौजूद हर तरह के छोटे बड़े दल लड़ते वक्त अपनी पहली प्राथमिकता बीजेपी की हार जाहिर कर रहे हैं…. यह बात 2014 में नहीं थी…. क्षेत्रीय दलों का उभार 2019 के चुनावों का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष साबित होने जा रहा है भाजपा -कांग्रेस की लगातार बात करते राजनीतिक पंडित इस बारे में चूक रहे हैं….

क्षेत्रीय दलों का वोट शेयर और सीटों की संख्या 1996 के बाद बढ़ती ही गयी, 2014 में भी जब भाजपा को भारी बहुमत मिला, तब भी क्षेत्रीय पार्टियों पर उत्तर प्रदेश को छोड़ दिया जाए तो बहुत ज्यादा असर नहीं पड़ा था, 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद हालिया विधानसभा चुनाव में ज्यादातर क्षेत्रीय दलों का वोट शेयर कम नहीं हुआ है और अगर कम हुआ है तो उन दलों का हुआ जो बीजेपी के साथ है…

असम, आंध्र प्रदेश, बिहार, झारखंड, हरियाणा, कर्नाटक, महाराष्ट्र, ओडिशा, पंजाब, तमिलनाडु, तेलंगाना, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल…..देश के इन 13 राज्यों में क्षेत्रीय दलों की मजबूत उपस्थिति है.

और सच मानिए 2019 की चाबी भी इन्हीं राज्यों में मौजूद क्षेत्रीय दलों के पास है, जो भी पार्टी ज्यादा सीटें जीतेगी, वह केंद्र सरकार बनाने के लिए क्षेत्रीय दलों पर निर्भर रहेगी और गठबंधन सरकार बनने की संभावनाएं अधिक नजर आ रहीं हैं…

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2019 के छ चरणों के चुनाव में जिन इलाको में जैसा वोटिंग प्रतिशत बढ़ने की उम्मीद बीजेपी कर रही थी, वो अभी तक वह पूरी नहीं हो पाई है. बहुसंख्यक मतदाताओं ने पिछली बार जमकर भाजपा को वोट किया था. इसबार उन्होंने अभी तक के मतदान में कम उत्साह दिखाया है, यह दिखा रहा है कि एंटी एनकबन्सी विद्यमान है….

और वैसे भी एंटी एनकमबेंसी का असर उन राज्यों में ज्यादा होता है, जहां केंद्र और राज्य दोनों में एक ही पार्टी की सरकार होती है. बिहार, छत्तीसगढ़, गुजरात, झारखंड, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान और उत्तर प्रदेश की 273 सीटों में बीजेपी को 216 सीटें मिली थीं.

इन 8 राज्यों में से 5 राज्यों में बीजेपी की सरकार है. एक स्टडी को कोट करते हुए राजनीतिक विश्लेषक मिलान वैष्णव लिखते हैं कि सत्ताधाऱी के फिर से जीतने की संभावना दूसरे की तुलना में 9% प्वाइंट कम हो जाती है….

चुनाव विश्लेषक प्रणव रॉय कहते हैं कि 2014 में जिसे मोदी लहर कहा गया, दरअसल वह मोदी लहर नहीं थी. उनके अनुसार, ‘2015 में ‘मोदी वेव’ का जो टर्म प्रचलन में आया, दरअसल वह लैंडस्लाइड विक्ट्री थी. वेव और लैंडस्लाइड में फर्क जानना जरूरी है.

‘वेव’ यानी लहर ‘हाई पॉपुलर’ वोट से तय होती है, जबकि लैंडस्लाइड अधिक संख्या में सीटें आने से’….. ‘उत्तर प्रदेश इसका उदाहरण है उत्तर प्रदेश ऐसा राज्य है, जहां देश के अन्य हिस्सों से कहीं ज्यादा दलित और मुस्लिम रहते हैं. लेकिन इस बार वह बीजेपी की तरफ जाता दिख नहीं रहा है’

उत्तर प्रदेश में प्रियंका गांधी फैक्टर भी बीजेपी का अपर कास्ट वोट कम कर रहा है. ओवरऑल देखा जाए तो पिछली बार जिन राज्यों में बीजेपी का प्रदर्शन अच्छा था. दरअसल वह बेस्ट था उससे अच्छा प्रदर्शन किया ही नही जा सकता…. 2014 के लोकसभा चुनाव में निम्न राज्यों में 162 सीटों में से 151 सीट पर एनडीए को जीत मिली थी, ये राज्य है हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, गुजरात, महाराष्ट्र और झारखंड….इन राज्यों में आसानी से 35 से 50 सीटों का नुकसान देखने को मिल सकता है.

दूसरी ओर यूपी, बिहार और कर्नाटक में जहां आज एक गठबंधन चुनाव लड़ रहा है, वहां भाजपा ने 2014 में यहां 148 सीटों में से 121 में जीत हासिल की थी. इन तीनों राज्यों में विपक्ष के गठबंधन की संयुक्त शक्ति कम से कम 60 से 70 सीटें बीजेपी से छीन सकती हैं.

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इस नुकसान की पूर्ति के लिये भाजपा ओडिशा बिहार और कुछ हद तक उत्तर पूर्व का मुंह देख रही है. 2014 में भाजपा को इन राज्यों में 88 में से सिर्फ 11 सीटें ही मिली थीं…..हमें यह भी ध्यान रखना चाहिए कि नार्थ ईस्ट के ज्यादातर क्षेत्रीय दल भी बीजेपी से नाराज हैं, फिर भी अधिक से अधिक से इन जगहों पर भाजपा 20 से 25 सीटें जीत सकती है.

दक्षिण में बीजेपी का कोई प्रभाव नजर नहीं आता, इसलिए वहां से कोई अच्छी तस्वीर वैसे भी नही उभर रही है, इसलिए यह माना जा रहा है कि लगभग 100 से 120 सीटों का बीजेपी को नुकसान होना अवश्यम्भावी हैं. 23 मई अब अधिक दूर नहीं है…

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(लेखक आर्थिक मामलों के जानकार हैं और ये उनके निजी विचार हैं)

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