
- जयंती पर विशेष
Naveen Sharma
आपको शायद यकीन करना मुश्किल हो कि कोई व्यक्ति एक लाख से भी अधिक Books भी पढ़ सकता है, लेकिन ये सच है. ओशो जिन्हें आचार्य रजनीश के नाम से भी जाना जाता है ऐसा करनेवाले शख्स हैं. आज ओशो की जयंती है. इस मौके पर आइये जानते हैं ओशो की किताबों के प्रति दीवानगी की प्रेरक और रोचक दास्तान. ओशो की किताब मेरी प्रिय पुस्तकें में इसका वर्णन है.
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महीने का पूरा वेतन देकर खरीदी पीडी ऑस्पेंस्की की टर्शियम आर्गानम किताब
ओशो बताते हैं कि पीडी ऑस्पेंस्की की टर्शियम आर्गानम महंगी पुस्तक थी. उन दिनों में मैं केवल ₹70 प्रति माह वेतन पाता था. संयोग से इस पुस्तक का मूल्य भी ₹70 ही था, लेकिन मैंने इसे खरीद लिया.पुस्तक विक्रेता आश्चर्यचकित था. उसने कहा यहां तक कि हमारे समाज के सबसे धनी व्यक्ति भी इसे नहीं खरीद सके.
पिछले 5 सालों से मैंने इसे बेचने के लिए रखा हुआ था, पर इसे किसी ने नहीं खरीदा. लोग आते हैं और इसे देखते हैं उसके बाद खरीदने का ख्याल छोड़ देते हैं. तुम एक निर्धन छात्र जो दिन भर काम करता है रात को पढ़ने आता है और हर रोज लगभग 24 घंटे काम करता है तुम इसे कैसे खरीद सकते हो?
मैंने कहा अगर जीवन देकर भी मुझे खरीदना पड़े तो भी मैं इस पुस्तक को खरीद सकता हूं. इसकी पहली पंक्ति पढ़ना ही पर्याप्त है. मुझे यह चाहिए ही चाहे जो भी मूल्य हो. भूमिका में पहला वाक्य जो मैंने पढ़ा था वह था विचार का तीसरा सिद्धांत और केवल तीन ही है पहला अरस्तु का, दूसरा बैकेन का और तीसरा मेरा खुद का. आस्पेंस्की के साहस से मैं रोमांचित हो उठा जब उसने कहा तीसरा सिद्धांत पहले भी मौजूद था.
यही वो वाक्य था जिसने मेरे हृदय को भड़का दिया था. पुस्तक विक्रेता को मैंने अपने पूरे महीने की तनख्वाह दे दी. तुम समझ नहीं सकते क्योंकि उस पूरे महीने मुझे करीब-करीब भूखा ही रहना पड़ा. लेकिन यह पुस्तक इसके योग्य थी.
उस सुंदर महीने को मैं याद कर सकता हूं. ना भोजन न कपड़े और ना ही सिर पर छत क्योंकि किराया अदा न कर पाने के कारण मुझे अपने छोटे से कमरे से बाहर निकाल दिया गया था. लेकिन टर्शियम आर्गानम के साथ आसमान के नीचे भी मैं प्रसन्न था. मैंने पुस्तक को सड़क के खंभे की रोशनी में पढ़ा है. ने इस पुस्तक को जिया है.
सबसे चर्चित और और विवादास्पद आध्यात्मिक गुरु रहे हैं ओशो
रजनीश जो बाद में ओशो के नाम से जाने जाते हैं वे आधुनिक भारत की सबसे चर्चित और और विवादास्पद आध्यात्मिक गुरु रहे हैं. ओशो का महत्व इस वजह से भी है कि वो अपने प्रवचनों में किसी एक धर्म से बंधे नहीं रहते.
उन्हें महावीर की अहिंसा प्यारी लगती है तो दूसरी बुद्ध की करुणा भी लुभाती है. कृष्ण का इंद्रधनुषी जीवन भी आकर्षित करता है. भगवत गीता पर उनके प्रवचनों की लंबी श्रृंखला है जो किताब के रूप में उपलब्ध है.
वे लगभग सभी भक्ति संतों मीरा, कबीर, दाद्दु आदि के बारे में भी काफी गहराई में अध्ययन मनन कर उनके बारे में बताते हैं. ओशो महज अपने ही देश के आध्यात्मिक सदगुरुओं तक नहीं रुकते. वे आपको ताओ और झेन गुरु से भी रूबरू कराते हैं.
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निडरता और बेबाकी की अद्भुत मिसाल
ओशो की एक बड़ी खूबी उनकी निडरता और बेबाकी है. उन्हें जो सही लगता है उसे बिना भय के कहते हैं. कौन खुश होगा और कौन नाराज इसकी तनिक भी फिक्र नहीं करते. सभी धर्मों के पाखंड और पोंगापंथी की पोल खोलते हैं.
वे सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों पर भी बेबाकी से अपनी राय रखते हैं. वे भारत के पहले ऐसे आध्यात्मिक गुरु थे जिनकी विदेश में काफी पूछ थी. खासकर अमेरिका में तो उनके हजारों शिष्य बने थे.
‘ओशो’, यह शब्द लैटिन भाषा के ‘ओशनिक’ शब्द से लिया गया है जिसका अर्थ है सागर में विलीन हो जाना. अपने संपूर्ण जीवन में आचार्य रजनीश ने बोल्ड शब्दों में रूढ़िवादी धर्मों की आलोचना की, जिसकी वजह से वह बहुत ही जल्दी विवादित हो गए और ताउम्र विवादित ही रहे.
संभोग से लेकर समाधि तक
ओशो की आलोचना विभिन्न कारणों से की जाती है, उन पर कई आरोप भी लगे. कहा जाता है कि ओशो फ्री सेक्स का समर्थन करते थे और उनके आश्रम में हर संन्यासी एक महीने में करीब 90 लोगों के साथ सेक्स करता था. इसके अलावा यह भी माना जाता है कि ओशो ने धर्म को एक व्यापार बनाया और खुद सबसे बड़े व्यापारी बन बैठे.
उनको प्रवचनों को संकलित कर कई पुस्तकों का रूप दिया गया है. जिनमें से ‘संभोग से लेकर समाधि तक’ नामक पुस्तक ने उन्हें विवादों के चरम पर पहुंचाया. लेकिन इस पर विवाद बेवजह है आप ये किताब ध्यान से पढ़ेंगे तो आपको कोई भी वाक्य अश्लील नहीं देखेगा आप उनके मुरीद हो जाएंगे.
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उन्मुक्त बचपन
11 दिसंबर, 1931 को मध्य प्रदेश के गांव कुचवाड़ा के जैन परिवार में रजनीश का जन्म हुआ था. ग्यारह भाइयों में सबसे बड़े ओशो का पारिवारिक नाम रजनीश चंद्र मोहन जैन था. 11 वर्ष की उम्र में रजनीश को अपने नाना के घर भेज दिया गया, जहां बिना किसी नियंत्रण और रूढ़िवादी शिक्षा के पूरी उन्मुकतता के साथ उन्होंने अपना जीवन व्यतीत किया.
बचपन से ही रजनीश विरोधी प्रवृत्ति के व्यक्ति थे, जिन्होंने कभी परंपराओं को नहीं अपनाया. किशोरावस्था तक आते-आते रजनीश नास्तिक बन चुके थे. उन्हें ईश्वर में जरा भी विश्वास नहीं था. वे भारतीय स्वतंत्रता संग्राम और राष्ट्रीय स्वयंसेवक दल में भी शामिल हुए थे.
पहला सार्वजनिक भाषण
जबलपुर विश्वविद्यालय से स्नातक (1953) और फिर सागर विश्वविद्यालय से स्नातकोत्तर (1957) की उपाधि ग्रहण करने के बीच रजनीश ने तारनपंथी जैन समुदाय द्वारा आयोजित अपने पहले सालाना सर्व धर्म सम्मेलन का हिस्सा बने.
यहीं उन्होंने सबसे पहले सार्वजनिक भाषण दिया, जहां से उनके सार्वजनिक भाषणों का सिलसिला शुरू हुआ जो वर्ष 1951 से 1968 तक चला.
लेक्चरर के रूप में विवि में पढ़ाया
वर्ष 1957 में लेक्चरर के तौर पर रजनीश ने रायपुर विश्वविद्यालय जॉइन किया. लेकिन उनके गैर परंपरागत धारणाओं और जीवन यापन करने के तरीके को छात्रों के नैतिक आचरण के लिए घातक समझते हुए विश्वविद्यालय के कुलपति ने उनका ट्रांसफर कर दिया. अगले ही वर्ष वे दर्शनशास्त्र के लेक्चरर के रूप में जबलपुर यूनिवर्सिटी में पढ़ाया. इस दौरान भारत के कोने-कोने में जाकर उन्होंने गांधीवाद और समाजवाद पर भाषण दिया, अब तक वह आचार्य रजनीश के नाम से अपनी पहचान स्थापित कर चुके थे.
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डाइनमिक मेडिटेशन
वर्ष 1970 में रजनीश जबलपुर से मुंबई आ गए और यहां आकर उन्होंने सबसे पहली बार ‘डाइनमिक मेडिटेशन’ की शुरुआत की. उनके अनुयायी अकसर उनके घर मेडिटेशन और प्रवचन सुनने आते थे. अब तक वे सार्वजनिक सभाएं करना बंद कर चुके थे. वर्ष 1971 में उन्हें उनके अनुयायियों ने ‘भगवान श्री रजनीश’ की उपाधि प्रदान की थी.
मुंबई की जलवायु आचार्य रजनीश को रास नहीं आई और वे पुणे शिफ्ट हो गए. उनके अनुयायियों ने यहां उनके लिए आश्रम बनाया जहां आचार्य रजनीश 1974 से 1981 तक दीक्षा देते रहे. कुछ ही समय बाद आचार्य रजनीश के पास विदेशी अनुयायियों की भी भीड़ जमा होने लगी, जिसकी वजह से आश्रम का प्रसार भी तेज गति से होने लगा. वर्तमान समय में पुणे स्थित इस आश्रम को वैश्विक तौर पर ‘ओशो इंटरनेशनल मेडिटेशन सेंटर’ के नाम से जाना जाता है.
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अमेरिका के ओरेगन सिटी में बनाया रजनीशपुरम
जून, 1981 में आचार्य रजनीश अपने इलाज के लिए अमेरिका गये, जहां ओरेगन सिटी में उन्होंने ‘रजनीशपुरम’ की स्थापना की. पहले यह एक आश्रम था लेकिन देखते ही देखते यह पूरी कॉलोनी बन गयी. धीरे-धीरे ओशो रजनीश के फॉलोवर्स और रजनीशपुरम में रहने वाले लोगों की संख्या बढ़ने लगी, जो ओरेगन सरकार के लिए भी खतरा बनता जा रहा था.
सरकार का भय
समर्थकों की कट्टरता की वजह से अमेरिकी सरकार और ओशो रजनीश के बीच कुछ भी सामान्य नहीं था. आने वाले खतरे को भांपते हुए ओशो रजनीश ने सार्वजनिक सभाएं करना बंद कर दिया था, वे अब सिर्फ अपने आश्रम में ही प्रवचन देते और ध्यान करते थे.
कुछ समय बाद वर्ष 1981 में उन्होंने अपनी सचिव मां आनंद शीला को कानूनी रूप से पॉवर ऑफ अटार्नी प्रदान की, लेकिन 1984 में उन्होंने शीला पर अनैतिक कृत्यों में लिप्त होने जैसे आरोप लगाए.
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महंगी जीवनशैली
कहा जाता है कि उस समय आचार्य रजनीश की सेवा में 93 रॉल्स रॉयस गाड़ियां रहती थीं. वे. महंगी स्विस धड़ियों के भी शौकीन थे. उनके इस अत्याधिक महंगी जीवनशैली ने भी उन्हें हर समय विवादों के साये में रखा. भारत में तो ओशो रजनीश अपने सिद्धांतों की वजह से विवादों में रहते ही थे लेकिन ओरेगन में रहते हुए वे अमेरिकी सरकार के लिए भी खतरा बन चुके थे.
अमेरिका में गिरफ्तार हुए
अमेरिका की सरकार ने उन पर जालसाजी करने, अमेरिका की नागरिकता हासिल करने के उद्देश्य से अपने अनुयायियों को यहां विवाह करने के लिए प्रेरित करने, जैसे करीब 35 आरोप लगाकर उन्हें गिरफ्तार कर लिया. उन्हें 4 लाख अमेरिकी डॉलर की पेनाल्टी भुगतनी पड़ी साथ ही साथ उन्हें देश छोड़ने और 5 साल तक वापस ना आने की भी सजा हुई.
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पुणे में आकर बसे
अमेरिका से लौटकर आचार्य रजनीश दोबारा पुणे आ गए. यहां आकर उन्होंने ‘ओशो’ नाम ग्रहण किया. उन्होंने नेपाल के काठमांडू और ग्रीस की यात्रा की, लेकिन किसी भी देश ने उन्हें रहने की अनुमति नहीं दी. वर्ष 1986 में ओशो रजनीश पुणे में ही बस गए, जहां रहते हुए उन्होंने अपने आश्रमों और सिद्धांतों का प्रचार-प्रसार किया.
अंतिम समय
19 जनवरी, वर्ष 1990 में ओशो रजनीश ने हार्ट अटैक की वजह से अपनी अंतिम सांस ली. जब उनकी देह का परीक्षण हुआ तो यह बात सामने आई कि अमेरिकी जेल में रहते हुए उन्हें थैलिसियम का इंजेक्शन दिया गया और उन्हें रेडियोधर्मी तरंगों से लैस चटाई पर सुलाया गया. जिसकी वजह से धीरे-धीरे ही सही वे मृत्यु के नजदीक जाते रहे. खैर इस बात का अभी तक कोई ठोस प्रमाण उपलब्ध नहीं हुआ है लेकिन ओशो रजनीश के अनुयायी तत्कालीन अमेरिकी सरकार को ही उनकी मृत्यु का कारण मानते हैं.
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सत्य के लिए आंतरिक यात्रा
ओशो का कहना था कि जब तक भीतर से आवाज ना आए, किसी भी व्यक्ति की आज्ञा का पालन ना करो. स्वयं के अलावा दूसरा कोई ईश्वर अस्तित्व नहीं रखता. सत्य की खोज बाहर नहीं, अपने भीतर करो. प्रेम ही प्रार्थना का दूसरा नाम है.
होश पूर्ण जीवन जिओ
शून्य हो जाना ही सत्य का मार्ग है.
जीवन यहीं और अभी है.
प्रत्येक पल मरो, ताकि हर दूसरा क्षण नया जीवन जी सको.
तैरो नहीं बह जाओ
जो यहीं है, उसे ढूंढ़ने की जरूरत नहीं है, रुको और देखो.
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