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झारखंड : छह महीनों में 42 नवजात बरामद, 27 की हो गयी मौत

Ranchi : झारखंड में नवजात के मिलने के मामले लगातार बढ़ रहे हैं. इस बात का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि साल 2019 में महज 6 महीने के अंदर 42 परित्यक्त नवजात मिले हैं. जिसमें 15 शिशु ही जीवित हैं और 27 की मौत हो चुकी है. मृत बच्चों में सात की पहचान नहीं हो सकी है क्योंकि उनमें से कुछ भ्रूण थे और कुछ के शरीर को जानवरों द्वारा क्षत-विक्षत कर दिया गया था.

आश्रयणी फाउंडेशन के अंतर्गत काम करने वाली संस्था पालोना ने एक आंकड़ा पेश करते हुए नवजात को छोड़े जाने के मामले को गंभीर बताया है. पालोना की संस्थापक आर्य मोनिका ने कहा कि झारखंड में महज छह महीने के भीतर 42 परित्यक्त बच्चे मिले हैं, जो कि काफी चिंताजनक है.

हर महीने फेंके जा रहे हैं सात बच्चे

आंकड़ों के मुताबिक, हर महीने कम से कम 7 बच्चे फेंके जा रहे है. जिनमें से अधिकतर की मौत हो जाती है. वर्ष 2019 के आंकड़ों पर गौर करें तो जनवरी से लेकर जून तक 42 नवजात को फेंका गया. जिनमें 16 लड़की और 19 लड़के मिले हैं. 7 बच्चों के लिंग की पहचान नहीं हो पायी है क्योंकि उनमें से कुछ भ्रूण थे और कुछ के शरीर को जानवरों द्वारा क्षत-विक्षत कर दिया गया था

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नवजात का होता है पोस्टमार्टम लेकिन मौत की वजह का नहीं होता खुलासा

शिशु की मिलने की सूचना पर स्थानीय पुलिस मौके पर पहुंचकर जीवित बच्चे को किसी संगठन को सौंप देती है और मृत बच्चे को पोस्टमार्टम के लिए भेज देती है. नवजात का पोस्टमार्टम तो कराया जाता है लेकिन रिपोर्ट का खुलासा पुलिस के द्वारा नहीं किया जाता है और न ही बताया जाता है कि बच्चे की मौत किस वजह से हुई है.

इस तरह के मामलों में अक्सर पुलिस कोताही बरतती है. इन मामलों की जांच नहीं की जाती है. जिसका नतीजा यह होता है कि बच्चों को फेंकने वालों की पहचान नहीं हो पाती है. शायद इसी वजह से बच्चों को फेंके जाने के मामले में इजाफा हो रहा है. लोगों के मन में डर नहीं है क्योंकि उन्हें पता है कि कार्रवाई नहीं की जायेगी.

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बच्चों के मामले में पुलिस को करना चाहिए खुलासा : आर्य मोनिका

आश्रयणी फाउंडेशन के तहत काम करने वाली पालोना की संस्थापक आर्य मोनिका ने कहा कि पुलिस और सीआइडी को इस तरह के मामलों का पूरी तरह से खुलासा करना चाहिए ताकि जो संस्था बच्चों के लिए काम कर रही हैं उन्हें मदद मिल सके.

उन्होंने कहा कि जिस तरह से दूसरे मामलों में पुलिस पीसी करती है और उन अपराधों के साल भर के आंकड़े पेश करती है उसी तरह राज्य में कितने बच्चे मिले और उसमें कितने जीवित और मृत पाये गये इसका भी खुलासा किया जाना चाहिये.

साथ ही बच्चों की मौत के पीछे की वजह का भी खुलासा किया जाना चाहिये. इससे शिशुओं पर जो संस्था रिसर्च कर रही है उसको सहायता मिलेगी. बड़ी संख्या में नवजातों को फेंका जा रहा है. छोटे-छोटे बच्चों के सौदे हो रहे हैं, लेकिन झारखंड सरकार इस दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठा रही है. अगर बाकी अपराधों की तरह ही शिशुओं के मामले में भी पुलिस आंकड़े देगी तो यह आंकड़े सरकारी विभागों को जगाने के लिए काफी होंगे.

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