Jamshedpur

गुड़ाबांदा के किसानों को सिंचाई के लिए पानी नहीं मिला तो हेमंत सरकार के खिलाफ हुड़का जाम आंदोलन करेंगे : सांसद

Ghatshila : मुसाबनी और गुड़ाबांदा प्रखंड के किसानों को सिंचाई का पानी नहीं मिलेगा तो भारतीय जनता पार्टी स्वर्णरेखा बहुद्देश्यीय परियोजना (एसएमपी) से ओड़िशा जाने वाला पानी रोक देगी. एसएमपी प्रशासन के खिलाफ हुड़का जाम आंदोलन करेंगे. सांसद विद्युत वरण महतो ने पत्रकारों के साथ बातचीत के क्रम में गालूडीह बराज पर कही. सांसद ने कहा कि ओड़िशा के किसानों को सिंचाई का पानी दिए जाने से कोई परेशानी नहीं है, लेकिन झारखंड के पूर्वी सिंहभूम जिला के जिन किसानों की जमीन नहर निर्माण के लिए वर्षों पहले अधिग्रहित की गई और एसएमपी ने किसानों को सिंचाई के लिए पानी देने का बकायदा एग्रीमेंट साईन किया, उनकी खेतों को पानी नहीं मिलता है. गुड़ाबांदा प्रखंड के 74 गांवों के पांच सौ से भी अधिक किसानों ने सिंचाई के लिए पानी उपलब्ध कराने की गुहार लगाई है. इसके लिए केंद्र सरकार ने 14 सौ करोड़ रुपए दिया है. अब शाखा नहर के लिए राज्य सरकार नाबार्ड से फंड लेकर काम शुरू करवाए. पटमदा, बोड़ाम और कटिंन उचाई पर अवस्थित है.  वहां चांडिल डैम से पाईप लाइन के जरिए सिंचाई का पानी मुहैया कराया जा सकता है. अभी पटमदा-बोड़ाम के किसान जमशेदपुर एवं आसपास वालों सब्जी खिलाते हैं. सिंचाई की सहूलियत हासिल हो जाए तो यहां के किसान झारखंड के साथ-साथ सीमावर्ती बंगाल एवं उड़ीसा को भी सब्जी की आपूर्ति करने लगेंगे.

जमीन के बदले  सिंचाई केलिए पानी नहीं दिया

स्वर्णरेखा बहुद्देश्यीय परियोजना (एसएमपी) पर केंद्र के साथ-साथ झारखंड एवं ओड़िशा सरकार अब तक अरबों रुपए खर्च कर चुकी है किंतु अस्सी के दशक में शुरू हुआ नहर अब तक पूरा नहीं हो पाया है. नहर निर्माण अब भी जारी है. इस क्रम में गौर करने वाली बात यह भी है कि जहां तक नहर बन चुकी है, नदी का पानी छोड़े जाने पर आसपास के खेतों में पानी बहने लगता है. नहर में दरार पड़ चुके हैं. गालुडीह से दायीं नहर की लंबाई 56 किलोमीटर और बायीं नहर की लंबाई 65 किमी है. बायीं नहर से सिंचाई का पानी घाटशिला, बहरागोड़ा होते बंगाल तक जाता है तोदायीं नहर से मुसाबनी, गुड़ाबांदा से गुजरता हुआ उड़ीसा की खेतों तक पहुंचता है. इस क्रम में दुखद यह भी है कि दायीं नहर भले ही गालूडीह से मुसाबनी एवं गुड़ाबांदा के रास्ते नहर में बहता है, लेकिन यहां की खेतों को पानी एक बुंद भी नहीं मिलती.

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