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छत्तीसगढ़-पं बंगाल की स्थितियों से सबक लेंगे आईएएस-आईपीएस

राजनेता से नजदीकी संबंध होने पर कुछ ब्यूरोक्रेट्स यह भूल जाते हैं कि वह सर्विस रुल से बंधे हैं.

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Surjit Singh

हाल की तीन घटनाएं और कांग्रेसी नेता कपिल सिब्बल का बयान झारखंड ही नहीं देशभर के ब्यूरोक्रेट्स के लिये सबक की तरह है. पावर के क्षणिक सुख और भ्रष्टाचार की थोड़ी राशि के लिये कुछ वरिष्ठ आईएएस-आईपीएस अफसरों का राजनीतिक दलों के सदस्य की तरह काम करने की घटनाएं बढ़ी हैं. राजनेता से नजदीकी संबंध होने पर कुछ ब्यूरोक्रेट्स यह भूल जाते हैं कि वह सर्विस रुल से बंधे हैं. उन्हें कायदे-कानून के हिसाब से काम करना है. वह राजनेताओं की तरफ सिर्फ पांच साल के लिए पावर में नहीं आये हैं.

हाल की तीन घटनाओं ने इस ओर लोगों का ध्यान खींचा है. सीबीआई में निदेशक आलोक वर्मा-विशेष निदेशक राकेश अस्थाना विवाद, पश्चिम बंगाल में सीबीआई के अंतरिम निदेशक नागेश्वर राव-पुलिस कमिश्नर राजीव कुमार का विवाद और छत्तीसगढ़ में स्पेशल डीजी मुकेश गुप्ता व एसपी रजनीश सिंह का निलंबन का आदेश. मुकेश गुप्ता पर फोन टैपिंग का आरोप है.

ये घटनाएं क्या साबित करती हैं. इन अफसरों का सत्ताधारी दल का पसंदीदा होना, सिर्फ उनकी काबिलियत भर था या है. क्या वह पद पर रहकर अफसर की तरह काम कर रहे थे. या सत्ताधारी दल के कार्यकर्ता की तरह. क्या राजनेता के नजदीकी होने की वजह से मिले पद पर रहकर उन्होंने नजायज काम किये. वजह चाहे जो भी हो. सत्ताधारी दल के पक्ष में काम करने की वजह से सरकार बदलते ही उनपर हो रही कार्रवाईयां ऐसे ब्यूरोक्रेट्स के लिये सबक के सामान हैं.

ऐसे माहौल में कपिल सिब्बल का एक बयान काबिले गौर है. 11 फरवरी को कपिल सिब्बल ने कहा : जो भी अधिकारी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से वफादारी दिखाने की कोशिश कर रहे हैं. उनपर नजर रखी जा रही है. अधिकारियों को पता होना चाहिए कि सरकारें आती-जाती रहती हैं. कभी हम सत्ता में होते हैं, तो कभी विपक्ष में. संविधान सर्वोच्च है. कपिल सिब्बल के इस बयान के दो मायने निकलते हैं. पहली तो यह कि अधिकारी को संविधान के तहत काम करना चाहिए. नियम-कानून के दायरे में रह कर रिपोर्ट बनानी चाहिए और कार्रवाई करनी चाहिए. दूसरा यह बयान धमकी भरा भी है. राजनीतिक दलों के कार्यकर्ता की तरह काम करने वाले ब्यूरोक्रेट्स के लिये यह एक संदेश भी है. संदेश यह कि सरकार बदलने पर उनके साथ अफसर जैसा नहीं, बल्कि राजनीतिक दल के कार्यकर्ता जैसे ही व्यवहार होंगे.

बात झारखंड की करें, तो करीब दो साल पहले झारखंड के एक वरिष्ठ आईएएस ने निजी बातचीत के दौरान कहा था : यहां के कुछ अफसर राजनीतिक कार्यकर्ता की तरह काम कर रहे हैं. राजनीतिक आकाओं को खुश रखने के लिये भ्रष्टाचार कर रहे हैं. ऐसे अफसरों को लगता है कि वह जिस राजनीतिक दल के लिये काम कर रहे हैं, वही दल 2019 में होने वाले लोकसभा और विधानसभा चुनावों में सरकार बना लेगी. तब हालात अलग थे. तब आज जैसे माहौल नहीं थे. तब यही लगता था कि सच में केंद्र औऱ राज्य में सरकार नहीं बदलेंगी. पर आज इसकी संभावना बढ़ गयी है. ऐसे में यह कहना जल्दबाजी नहीं होगी कि आने वाले समय में झारखंड के कुछ ब्यूरोक्रेट्स के लिये अच्छे दिन नहीं होने वाले हैं.

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