Opinion

पीएम हाउस में बैठक के बाद कितनी बदलेगी कश्मीर की तस्वीर !

सुनील बादल

प्रधानमंत्री निवास में केंद्र सरकार के साथ जम्मू कश्मीर की आठ पार्टियों के 14 नेताओं की बैठक अनिश्चितता के माहौल में ऐतिहासिक रही. फिर से राज्य का दर्जा जैसी बातें छनकर आ रही हैं. क्या ये सब कुछ इतना आसान है या बोतल से जिन्न बाहर आएगा ? चर्चा चुनाव की भी है पर पहले केंद्र सरकार जम्मू और कश्मीर में परिसीमन तेजी से करना चाहती है और उमर अब्दुल्ला इसे गैर जरूरी बता रहे हैं.

जम्मू और कश्मीर में परिसीमन हुआ तो राज्य के तीन अलग हिस्सों जम्मू, कश्मीर और लद्दाख की विधानसभा की सीटों में बदलाव के साथ जम्मू और कश्मीर की राजनीति में भी बदलाव हो जाएगा. क्या बैठक के बाद की परिस्थितियों में परिसीमन संभव होता दिख रहा है?

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जम्मू और कश्मीर का 58 प्रतिशत भू-भाग बौद्ध बहुल लद्दाख है, जहां आतंकवाद जीरो है. राज्य में 26 प्रतिशत भू-भाग जम्मू का है, जो कि हिन्दू बहुल है. यहां पर भी कोई आतंकवाद नहीं है. अब बच जाती है कश्मीर घाटी जहां का क्षेत्रफल सिर्फ 16 प्रतिशत है और यह मुस्लिम बहुल क्षेत्र है.

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जम्मू और लद्दाख को मिला दें तो 84 प्रतिशत क्षेत्र हिन्दू और बौद्ध बहुल है, जबकि 16 प्रतिशत क्षेत्र मुस्लिम बहुल है. भाजपा का मानना है कि संपूर्ण राज्य की राजनीति पर अब तक 16 प्रतिशत क्षेत्र के राजनीतिज्ञों का ही कब्जा रहा है.

कश्मीर घाटी में 10 जिले हैं जिनमें से 4 जिले ऐसे हैं जहां अलगाववादी और आतंकवादी सक्रिय हैं. ये जिले हैं सोपियां, पुलवामा, कुलगांव और अनंतनाग. इन चार जिलों को छोड़ दें तो संपूर्ण घाटी और जम्मू आतंकवाद और अलगाववाद से मुक्त हैं. जबकि आम धारणा है कि संपूर्ण जम्मू और कश्मीर आतंकी गतिविधियों से त्रस्त है.

2002 के विधानसभा चुनाव के आंकड़े बताते हैं कि कश्मीर घाटी और जम्मू के बीच मतदाताओं की संख्‍या में सिर्फ 2 लाख का फर्क था. जम्मू में 31 लाख वोटर रजिस्टर्ड थे और कश्मीर एवं लद्दाख को मिलाकर 29 लाख रजिस्टर्ड वोटर थे.चर्चा है कि कश्मीर और लद्दाख को मिलाकर जब जम्मू में ज्यादा वोटर थे तो फिर भी कश्मीर के हिस्से में ज्यादा विधानसभा सीटें क्यों हैं?

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सभी को प्रतिनिधित्व देने के लिए परिसीमन का आधार ही जनसंख्‍या होती है. ज्यादा जनसंख्या वाले क्षेत्र में ज्यादा विधानसभा सीटें होनी चाहिए थीं. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. केंद्र सरकार चाहती है कि संविधान में प्रत्येक 10 वर्ष में परिसीमन करने के प्रावधान को लागू किया जाए .

यदि ऐसा होता तो जम्मू के खाते में ज्यादा सीटें होंगी. मतलब जम्मू का व्यक्ति मुख्यमंत्री बन सकता है . अभी तक ज्यादातर समय राज्य की राजनीति पर अब्दुल्ला और मुफ्ती परिवार का कब्जा रहा.

जम्मू और कश्मीर में कुल 111 विधानसभा सीटें हैं. वर्तमान में जम्मू और कश्मीर की विधानसभा में कुल 87 सीटों पर चुनाव होता है, जिसमें से 46 सीटें कश्मीर में, 37 सीटें जम्मू में और 4 सीटें लद्दाख में हैं. 24 सीटें वह हैं जो पाक अधिकृत जम्मू और कश्मीर में हैं, जहां चुनाव नहीं होता है. वर्तमान में 87 विधानसभा सीटों में से बहुमत के लिए 44 सीटों की जरूरत होती है. कश्मीर में 46 सीटें हैं जहां से ही बहुमत पूर्ण हो जाता है.

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संविधान के सेक्शन 47 के मुताबिक 24 सीटें खाली रखी जाती हैं. दरअसल, खाली 24 सीटें पाक अधिकृत कश्मीर के लिए छोड़ी गईं थीं. जम्मूवासी चाहते हैं कि ये 24 सीटें जम्मू में जोड़ दी जाएं. 2014 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी यहां कुल 37 में से 25 सीटें जीत चुकी है.

वर्ष 1947 में जम्मी और कश्मीर का भारत में कानूनी रूप से विलय हुआ था. उस समय जम्मू और कश्मीर में महाराजा हरिसिंह का शासन था. दूसरी ओर कश्मीर घाटी में मुस्लिमों के बीच उस वक्त शेख अब्दुल्ला की लोकप्रियता थी.

जबकि महाराजा हरिसिंह की जम्मू और लद्दाख में लोकप्रियता थी. लेकिन शेख अब्दुल्ला पर जवाहरलाल नेहरू का वरदहस्त था इसीलिए नेहरू ने राजा हरिसिंह की जगह शेख अब्दुल्ला को जम्मू और कश्मीर का प्रधानमंत्री बना दिया.

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वर्ष 1948 में शेख अब्दुल्ला को जम्मू और कश्मीर का प्रधानमंत्री बनाए जाने के बाद राजा हरिसिंह की शक्तियों को समाप्त कर दिया गया. इसके बाद शेख अब्दुल्ला ने राज्य में अपनी पकड़ मजबूत की .

1951 में जब जम्मू और कश्मीर की विधानसभा के गठन की प्रक्रिया शुरु हुई तो शेख अब्दुल्ला ने कश्मीर घाटी को 43 विधानसभा सीटें दी, जम्मू को 30 विधानसभा सीटें दी और लद्दाख को सिर्फ 2 विधानसभा सीटें दी गईं. मतलब कश्मीर को जम्मू से 13 विधानसभा सीटें ज्यादा मिली. वर्ष 1995 तक जम्मू और कश्मीर…

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