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कितने सही साबित होंगे एग्जिट पोल के रुझान ?

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Faisal  Anurag

क्या एग्जिट पोल के नतीजे सही साबित होंगे या एक बार फिर उलटफेर के शिकार होंगे? यह सवाल ग्राउंड की सच्चाई जानने का दावा करने वाले उठा रहे हैं. एग्जिट पोल का इतिहास इस सवाल को पुख्ता बना रहा है. ओपिनियन पोल और एग्जिट पोल की मेथेडोलाजी को लेकर कोई सवाल नहीं है. वे वास्तविक परिणाम के 5 फीसद कमीबेशी से रूझान को बता तो देते ही हैं. लेकिन भारत में इस प्रक्रिया की साख को लेकर अनेक संदेह व्यक्त किए जाते रहे हैं.

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यदि 2014 के बाद से हुए विधान सभा चुनावों के ही एग्जिट पोल का इतिहास देखा जाए तो साफ है कि वे गलत साबित होते रहे हैं. उत्तर प्रदेश में जहां भाजपा को ऐतिहासिक जीत मिली उस रूझान को भी बताने में एग्जिट पोल विफल रहे थे. इसी तरह बिहार में तो उन्हें मुंह की खानी पडी जब सब के आकलन धाराशायी हो गये. गुजरात, कर्नाटक और हाल में हुए राज्यों के चुनावों के आकलन भी गलत ही साबित हुए हैं जब कि 2014 में भी एक को छोड़ कर शेष सभी आकलन वास्तविक रूझान को पकड़ने में कारगर नहीं हुए थे.

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दिल्ली विधानसभा के चुनाव में तो एग्जिट पोल की विफलता ने बता दिया था कि दिल्ली के ही लोगों के रूझान को वह पढ़ने में कारगर नहीं रहा था.

इस बार के आकलन में जिस तरह से चर्चा की जा रही है उस संदर्भ में भी अनेक सवाल उठे हैं. आमातौर पर औसत छह से सात लाख सैंपलिंग करने की बात एजेंसियां कर रही हैं. लेकिन वे यह नहीं बता रही हैं कि दलों का वोट शेयर क्या है. भारत में इस विधा के विशेषज्ञों का तर्क है कि बिना वोट शेयर के सीटों का आकलन सही रुझान का संकेत नहीं हो सकता है.

विशेषज्ञ संजय कुमार, जो सीएसडीएस की ओर से अनेक से चुनावी आकलन में विश्वसनीय भूमिका निभाते रहे हैं, का तर्क है कि वोट शेयर के आधार पर ही सीटों का आकलन किया जाता रहा है.

अभी तक किसी एजेंसी ने वोट शेयर और मेथेडोलाजी की चर्चा नहीं की है. यहां तक कि उसने यह भी नहीं जाहिर किया है उसके सैंपल में किन किन समूहों और भारत की विविधतानुसार चुनावी प्रवृति के ट्रेंड को शामिल किया गया है. इसमें कितने शहरी और कितने ग्रामीण लोग शामिल हैं. इसी तरह धार्मिक और जाति समूहों तथा जेंडर तक पहुंच का प्रतिशत क्या है. इसके बिना कोई भी सर्वेक्षण अधूरा तथ्य ही जाहिर करेगा. इसके साथ ही सात लाख सैंपलिंग का अर्थ हें कि प्रत्येक लोकसभा सीट से कम से कम 1200 से 1400 की  सैंपलिंग की गयी है. इन एजेंसियों के खर्च को लेकर भी विशेषज्ञ सवाल कर रहे हैं. इनका सवाल यह है कि एक सैंपलिंग का औसल खर्च 400 रू. से कम नहीं हो सकता है.

इसका अर्थ है कि पूरे आकलन में भारी धनराशि खर्च की गयी है. यह राशि क्या चैनल ने ही खर्च की है. या इसका आधार कहीं और भी है. इस पूरे  खर्च को यदि ओपिनियन पोल कई दौर के सर्वेक्षण से तुलना की जाये तो केवल चुनावी आकलन के लिए भारत में भारी धनराशि खर्च की जा रही है. इसलिए यह जरूरी है कि इस राशि के स्रोत को उजागर किया जाना  चाहिए ताकि सर्वे की साख बढ़े.

23 को जब एक्जैक्ट पोल सामने आएगा तो क्या उसकी दिशा का संकेत एग्जिट पोल दे चुके हैं. कई राज्यों की सीटों से जीत हार को जिस तरह एजेंसियों ने प्रस्तुत किया है, उससे जो आंकड़े सामने आते हैं वे एग्जिट पोल के साथ विरोधाभषी तस्वीर पेश कर रहे हैं.

यह बात जाहिर होने पर कुछ एजेंसियां अब कह रही हैं कि सीट आधारित उनका अनुमान एग्जिट पोल नहीं पोपुलरिटी पोल है. यानी उन्होंने आकलन के लिए क्षेत्रों में लोकप्रियता को आधार बनाया है. इस तरह के विरोधाभाषी तर्क पहले कभी नहीं दिये गये हैं. इस कारण ही एग्जिट पोल को ले कर प्रश्न किया जा रहा है.

कई देशों में इस तरह के सर्वेक्षण इस बार गलत साबित हुए हैं. इसका कारण यह है कि मतदाता के सामने वोट करने के लिए कई तरह के सोच हैं. अंतिम समय से उस पर कौन सा सोच असर करता है, इसका अनुमान स्वयं मतदाता को भी नहीं रहता है. भारत जैसे देश में तो यह जटिलता बढी ही है. 2019 के चुनाव में इस तरह की सामाजिक जटिलता को लेकर कई तरह के तर्क हैं.

चुनाव में जिस तरह हर फेज में नरेंद्र मोदी ने एजेंडा बदला है उसके असर को लेकर भी चर्चा की जा रही है. भारत की चुनाव प्रक्रिया की विचित्रता के कई उदाहरण मौजूद हैं. इन विचित्रताओं को समझने के राजनीतिक माइंडसेट के बगैर चुनावी सर्वेक्षण तथ्यात्मक रुझान को पढने में कारगर नहीं होता है. यह कहने का अर्थ यह नहीं है कि एग्जिट पोल करने वालों ने इन विचित्रताओं को नजरअंदाज किया है.

संभव है कि इन तमाम बातों को ध्यान में रखा गया हो. इसलिए पारदर्शी सर्वेक्षण के लिए जरूरी तत्व मेथेउरोलाजी और सैंपलिंग की विविधता संबंधी आंकड़े भी उजागर किये गये होते तो इस तरह के सवाल नहीं किये जाते.

राजनीतिक दलों के दोनों ही पक्षों के अपने दावों और प्रतिदावे के बीच भारत के वोटर अगले पांच साल की राजनीतिक दिशा पर दो टूक फैसला देंगे, इसे लेकर राजनीतिक दलों में चिंता है.

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