Opinion

इतिहास से टकराते सत्तापक्ष की भविष्य पर खामोशी अंतिम चरण में भी जारी

Faisal Anurag

आर्थिक सवालों को लेकर सत्तापक्ष की खामोशी इस चुनाव का मुख्य ट्रेंड है. एक ओर जहां आर्थिक तंत्र का गतिरोध ग्रामीण और अर्द्धशहरी इलाकों में अपना असर दिखाने लगा है, वहीं चुनावी विमर्श में इसे गौण करने में सत्तापक्ष पक्ष की भूमिका को हल्के में नहीं देखा जाना चाहिए.

इस चुनाव का आर्थिक सवालों से परे नरेटिव विकसित करने में भाजपा और उसके प्रचार तंत्र ने खूब मेहनत की है. विपक्ष के कुछ दलों ने आर्थिक हालात की चर्चा अपने अभियान में जरूर की है लेकिन वह चुनावी विमर्श में दिख नहीं रहा है. इसका यह अर्थ नहीं लगाया जा सकता है कि वोट में मतदाताओं के दिलोदिमाग में यह सवाल काम ही नहीं कर रहा है.

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इस बार के चुनाव में वोटरों की खामोशी की खूब चर्चा हो रही है. बावजूद एक मुखर तबका खुल कर प्रचार माध्यमों से अपने एजेंडे को फोकस करता रहा है. 2019 का चुनाव पूरे अभियान में कई मामलों में खास दिखता है.

यह पहला चुनाव है जिसमें सत्ता पक्ष के दल ने भविष्य के बारे में बात करने के बजाय इतिहास को खंगाला है. उस ने इतिहास के उन व्यक्तियों को निशाने पर लिया है जो दुनिया से कब का विदा ले चुके हैं.

भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के निशाने पर जवाहर लाल नेहरू शुरू से ही रहे हैं. नेहरू एक ओर जहां आजाद भारत के मुख्य आर्किटैक्ट माने जाते हैं, वहीं उन्होंने सेकुलर नजरिये के साथ लोकतंत्र की जड़ को मजबूत बनाने का प्रयास किया है.

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उन्होंने न केवल जड़ता के खिलाफ वैज्ञानिक नजरिये  और तर्कशीलता को महत्व दिया बल्कि बेहद कम संसाधनों के बाद भी भारत को विश्व ताकतों के बीच महत्वपूर्ण भूमिका में खड़ा कर तीसरी दुनिया के तीन प्रमुख नायकों में सबसे लोकप्रिय बने. अफ्रीका और भारत के बाद आजाद हुए देशों के लिए नेहरू की वैचारिक धारा का खासा महत्व रहा है. नेहरू के इस नजरिये के खिलाफ जनसंघ ने अपनी स्थापना काल से विरोध किया है. और नेहरू को लेकर अनेक भ्रम खड़े किये हैं.

भारतीय जनता पार्टी के भी नेताओं की शिक्षा इसी नेहरू नफरत की पाठशाला में हुई है. बावजूद इसके नेहरू पर पिछले पांच सालों पर जो प्रहार नरेंद्र मोदी ने किए हैं वह अभूतपूर्व हैं. मोदी ने नेहरू को न केवल एक बड़े  खलनायक के रूप में पेश किया बल्कि आज भी अपने राह की बाधा साबित कर रहे हैं.

इस सिलसिले की कड़ी के रूप में वे इंदिरा गांधी और राजीव गांधी को भी खड़ा करते हैं. उनके भाषणों से यह धारणा मोदी ने बनाने की कोशिश की है कि नेहरू अपनी मृत्यु के आधी सदी के बाद भी उन्हें काम करने से रोक रहे हैं.

जब मोदी ने राष्ट्रवाद का नरेटिव 2019 में खड़ा किया तो उन्होंने इंदिरा गांधी को निशाने पर लेना शुरू किया. क्योंकि इंदिरा गांधी के प्रयास से ही बंगला देश बना और पाकिस्तान दो भागों में विभाजित हुआ. इंदिरा गांधी और उनकी सरकार की इसमें भूमिका थी. रफाल के मामले को बोफोर्स से रोकने के लिए मोदी ने राजीव गांधी पर तब हमला शुरू किया जब पंजाब के चुनाव नजदीक आये.

आमतौर पर इतिहास कई बार पूरी क्रूरता से अपना निर्णय सुनाता है और बुमरेंग भी करता है. 23 मई को ही पता चलेगा कि इतिहास ने मोदी के प्रचार के बारे में क्या निर्णय  दिया. इतिहास के तथ्यों के साथ इसके पहले भारत के चुनावों में कभी इतना खिलवाड़ नहीं किया गया है.

वैसे नेहरू के अंधविरोधी इतिहास के तथ्यों को पलट कर उसे अपने अनुकूल अवधारणाओं का जखीरा बनाने के लिए लंबे समय से प्रयास करते रहे हैं. लेकिन भारत के सामूहिक विवके और चेतना उसे खारिज करती रही है.

भारत के चुनावों में अब तक जो भी सत्ता में रहे हैं, उन्हें अपने कार्यकाल को लेकर उठे सवालों से घेरा जाता रहा है. भारत की मीडिया ने इसमें 2019 के पहले तमाम आम चुनावों में अपनी इस भूमिका का निर्वाह किया है. भारत की मीडिया के चुनावी कवरेज को लेकर काफी बातें की जाती रही हैं.

लेकिन 2019 में मीडिया भी सवालों के घेरे में है. क्योंकि उसने अपनी जनपक्षधरता को पूरी तरह से नजरअंदाज ही नहीं किया है, जानबूझकर उन तथ्यों को ओझल करने में भूमिका निभायी है जिससे मोदी मिथक पर प्रहार होता है. इसमें सबसे बड़ा पहलू आर्थिक प्रगति को लेकर है.

भारत सरोकार के आंकड़ों को लेकर अब हर तरफ सवाल किये  जा रहे हैं. ग्रामीण अर्थव्यवस्था में जहां तेजी से गतिरोध बढ़ रहा है. वहीं औद्योगिक विकास के आंकड़े भी डर पैदा कर रहे हैं. ताजा आंकड़े बता रहे हैं कि मार्च के बाद भारत का औद्योगिक इंडेक्स मात्र 0.1 प्रतिशत पर सिमट गया है. बाजार क्रय शक्ति के अभाव का संकट महसूस करने लगा है.

ऑटोमाबाइल उद्योग इसका बड़ा शिकार हो रहा है. जहां उसके उत्पादों की बिक्री चिंताजनक गिरावट की ओर है. इसे इस तरह से देखा जा रहा है कि ग्रामीण क्षेत्रों में भी क्रयशक्ति प्रभावित हो रही है. और बाजार सुस्त है. यह सारी बातें आकड़ों में मौजूद हैं. प्रधानमंत्री आर्थिक परिषद के प्रमुख सदस्य रथिन राय ने तो यह कह कर सबको चौंका दिया है कि भारत एक गहरे आर्थिक संकट की ओर अग्रसर है.

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