
Ranchi: हेमंत सरकार ने तत्कालीन रघुवर सरकार के दौरान राज्य की वित्तीय स्थिति को स्पष्ट करने के लिए विधानसभा में श्वेत पत्र जारी किया है. हेमंत सरकार के बनते ही हेमंत सोरेन और गठबंधन के नेता लगातार झारखंड की वित्तीय स्थिति को लेकर चिंता जाहिर कर रहे थे. पूर्व मंत्री सरयू राय ने वित्तीय स्थिति को स्पष्ट करने के लिए सरकार से श्वेत पत्र जारी करने को कहा था. इस मांग को हेमंत सोरेन ने स्वीकारा था.
श्वेत पत्र जारी होने के बाद सत्ता पक्ष और विपक्ष की अपनी-अपनी दलीलें हैं. विपक्ष श्वेत पत्र को एक राजनीतिक स्टंट मान रहा है, तो सत्ता पक्ष इसे रघुवर काल का वित्तीय काला सच कह रहा है. 17 पन्ने के श्वेत पत्र को न्यूज विंग कुछ शब्दों में आपके सामने रख रहा है. कोशिश की गयी है कि श्वेत पत्र के सारे पहलू आ जाएं.
हेमंत सरकार का श्वेत पत्र पर विचार
राज्य का पिछला पांच साल वित्तीय संकट का काल रहा है. साल 2014-15 से 2018-19 की अवधि में राज्य को केंद्र से पर्याप्त राशि मिलती रही. लेकिन राज्य सरकार अपने ही आंतरिक स्रोतों से क्षमता से कम राजस्व संग्रहण के कारण और बिना अध्ययन कर अनावश्यक और अनुपयोगी योजना की वजह से वित्तीय संकट से गुजरता रहा.
इस श्वेत पत्र का उद्देश्य राज्य की जनता को पारदर्शिता के साथ राज्य की वित्तीय स्थिति से अवगत कराना है. इस परिस्थिति से राज्य को बाहर लाने के लिए कई छोटे और बड़े प्रयास करने होंगे.
पिछले पांच साल में बिना अध्ययन किये कई विभागों ने योजनाओं की स्वीकृति दी. जिसके फलस्वरूप ऐसी योजनाएं भी काफी संख्या में आये, जो सही साबित नहीं हो सकीं. इन योजनाओं के दायित्व का बड़ा भाग सरकारी राजकोष पर आ पड़ा है.
ऐसे में राज्य की जनता ने ऐसी सरकार का चुनाव किया है, जिसपर जनता को भरोसा है. जनता जानती है कि यह सरकार उनकी अधूरी मांगों और आकांक्षाओं पर खरा उतरेगी. युवा और ऊर्जावान मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के नेतृत्व वाले मंत्रिमंडल ना सिर्फ राज्य के समुचित विकास की आवश्यकताओं और लोगों की आकांक्षाओं को समझती है. बल्कि उसे पूर्ण निष्ठा और लगन के साथ पूरा करने के लिए प्रतिबंध है.
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रघुवर सरकार के पांच साल की वित्तीय स्थिति
– 2015 से लेकर 2019 तक राज्य का औसत वार्षिक वृद्धि दर मात्र 5.7 फीसदी था.
– राज्य की विकास दर स्थिर मूल्य 2014-15 में 12.05% था जो 2015-16 में 6.2% कम हो गया
– पांच साल में राज्य ने कर संग्रहण में 10% से कम की वृद्धि रही
– 2016-17 की तुलना में 2017-18 में वाणिज्य कर में 6.5%, उत्पाद कर में 12.6% और निबंधन में 22.7% और भू-राजस्व के कर में 35.1% की कमी आयी.
– खुद शराब बेचने के सरकारी फैसले से राज्य को करीब 1000 करोड़ का नुकसान हुआ. कालाबाजारी बढ़ने के साथ सरकार के वैध शराब कारोबार पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा.
– हर साल तत्कालीन सरकार ने बजट में खर्च को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया . जिसका नतीजा ये हुआ कि 2018-19 में योजना के वास्तविक खर्च और आंकलित खर्च के बीच का अंतर 10,437.47 करोड़ रुपया हो गया. ज्यादातर वित्तीय वर्षों में पीएल खाते में राशि रख खर्च दिखाया जाता रहा.
– पिछले पांच सालों में सीमा से ज्यादा लोन सरकार ने केंद्र सरकार से लिया. सिर्फ उदय कार्यक्रम के अंतर्गत 5,534 करोड़ रुपए लोन लिए गए. लोन डीवीसी को दी जाने के लिए ली गयी थी. बावजूद इसके बिजली की स्थिति राज्य में दुरुस्त नहीं हो सकी. वहीं दूसरी तरफ बिजली के क्षेत्र में कर्ज का बोझ बढ़कर 21000 करोड़ रुपए हो गया.
– कर्ज की वजह से राज्य में वित्तीय संकट खड़ा हो गया. इस कर्ज पर हर साल 18% का चक्रवृद्धि ब्याज सरकार को देना होता है. 2014-15 में राज्य का कर्ज राज्य के जीडीपी का 20% था. जो 2018-19 में बढ़कर 27.2% हो गया. इसपर केंद्रीय वित्त आयोग ने भी चिंता जाहिर की थी और सलाह दिया था कि इसे घटाकर 25% से कम किया जाए.
– 2014-15 में राज्य के हर व्यक्ति पर जहां 12000 कर्ज था, वो 2018-19 में बढ़कर 22,000 रुपए हो गया. 2019-20 में यह कर्ज बढ़कर 24,000 होने का अनुमान है.
– जीएसटी लागू होने के बाद वाणिज्य कर से संबंधित ज्यादातर कर को खत्म कर दिया गया. इससे सरकार को काफी घाटा हुआ. केंद्र सरकार भी राज्य को समय पर जीएसटी की वजह से करों में आयी कमी की भरपायी नहीं कर रही है. इससे राज्य आर्थिक रूप से कमजोर हो रहा है.
– केंद्र ने राज्य को दिये जाने वाले अनुदानों में काफी कमी लायी है. जिससे वित्तीय संकट गहराया.
– केंद्र सरकार दूसरे राज्यों में बिना उनपर किसी तरह का वित्तीय बोझ डाले रेलवे के प्रोजेक्ट्स पर काम कर रही है. लेकिन झारखंड में पूरी लागत का दो तिहाई भाग और बाद में आधा भाग राज्य से लिया.
– पूर्वी क्षेत्रीय परिषद की बैठक में यह साफ हुआ कि बैंकिंग सेक्टर में झारखंड पूर्ववर्ती राज्यों में सबसे पीछे है. पब्लिक सेक्टर के बैंक राज्य से डिपोजिट तो लेते हैं. लेकिन क्रेडिट नहीं देते.
– साफ तौर से पिछली सरकार ने राज्य से ज्यादा केंद्र को फायदा पहुंचाने का काम किया है. पांच सालों में बिजली की उत्पादन क्षमता बढ़ने के बजाय कम हुई है.
– बिना किसी टेंडर के पतरातू थर्मल पावर को ज्वाइंट वेंचर बनाकर एनटीपीसी को दे दिया. जबकि हमारे पास जमीन जलाशय और कोयला तीनों थे. टीवीएनएल के लिए आवंटित कोल ब्लॉक को शुरू कराने की कोशिश नहीं की गयी. जिसकी वजह से राज्य का करोड़ों रुपया केंद्र ने जब्त कर लिया.
राज्य सरकार ने केंद्र सरकार की कोल कंपनियों से बकाया लीज रेंट नहीं वसूला, जो बढ़कर आज 65,000 करोड़ रुपए हो गयी है. कोल कंपनी के अलावा सेल से भी लीज रेंट नहीं वसूला गया. जबकि राज्य सरकार सेल को खनिज भी उपलब्ध कराती है.
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