
आज से ठीक 70 साल पहले संविधान-सभा में पांचवीं अनुसूची पारित करते हुए की गयी बहस से समझा जा सकेगा कि आदिवासी अधिकारों के मुद्दे पर कौन कहां खड़ा था.
झारखंड के आदिवासी अंचलों में संवैधनिक अधिकारो की मांग के लिए अलग-अलग समय पर आंदोलन का स्वरूप नजर आता है. कभी विस्थापन को लेकर, कभी संविधान में मिले अधिकार को लेकर, कभी ग्रामसभा एवं आदिवासी उप योजना की राशि को मांग को लेकर राज्य में अवाज उठती रही है.
लेकिन राजनीतिक मुद्दा बनने से वंचित रह जाता है. खुद को आदिवासियों का हितैषी सबित करने में कोई भी दल पीछे नही रहता. लेकिन संवैधानिक अधिकारों पर बात करने से पार्टियां बचती रही हैं.
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पांचवीं अनुसूची को लेकर संविधान सभा में बहस का अंश
पांचवीं अनुसूची के नाम पर फैलाई जा रही उल-जलूल बातों का सच भी इसी बहस में छुपा है. गौर करने की बात है कि एक तरफ राष्ट्रीय नेताओं के आदिवासी मामलों पर स्थापित विचार, संविधान निर्मात्री सभा में उनके भाषण और पांचवीं अनुसूची के अंतिम पाठ के प्रावधानों में बहुत अंतर है.
अंबेडकर, ठक्कर और मुंशी के बयान दिखाते हैं कि संविधान निर्माताओं की आदिवासी-स्थिति की समझ और संवेदनशीलता कितनी उथली थी. जयपाल सिंह मुंडा ने आदिवासी की अकादमिक परिभाषा देने की चुनौती का जवाब नहीं दिया; और फिर किसी ने परवाह नहीं की. आज़ाद हिंदुस्तान में आदिवासियों के साथ हुआ यही सबसे बड़ा ‘ऐतिहासिक अत्याचार’ है.
पांचवीं अनुसूची पर संविधान-निर्मात्री सभा की बहस का हिंदी में सार (5 सितंबर, 1949)
डॉ अंबेडकर ने (फरवरी 1948 के प्रारूप-संविधान में शामिल अठारह पैरा वाली पांचवीं अनुसूची से अलग) पांचवीं अनुसूची का नया मसौदा पेश करते हुए इसकी खास बातों पर रोशनी डाली.
संविधान में जनजाति सलाहकार परिषद की व्यवस्था सिर्फ अनुसूचित क्षेत्रों में की जा रही है, जबकि इन क्षेत्रों से बाहर रहने वाली अनुसूचित जनजातियों के लिए राष्ट्रपति बाद में ज.स.प. गठन की अनुमति दे सकेंगे.
पैरा 5(1) के तहत शांति और सुशासन के लिए अधिसूचनाएं जारी करने में अब जनजाति सलाहकार परिषद की कोई भूमिका नहीं होगी. पैरा 6 के तहत अनुसूचित क्षेत्र तय करना राष्ट्रपति के ऊपर छोड़ा जा रहा है, क्योंकि अभी इस संविधान में यह कह पाना कठिन है कि ये क्षेत्र कौन से होंगे.
पैरा 7 इसलिए दिया गया है ताकि संसद आगे चलकर इस पांचवीं अनुसूची को समाप्त कर सके. वैसे भी हमेशा के लिए राज्यों के भीतर राज्य बनाने का कोई तुक नहीं है. प्रस्तुत संशोधनों के विषय में सभी सहभागियों और विषय-विद्वान श्रीमान ठक्कर से मशविरा कर लिया गया है.
नज़ीरूद्दीन अहमद ने कहा कि जनजाति सलाहकार परिषद का काम राज्यपाल को सलाह देना होना चाहिए और इसीलिए इसके सभी बीस सदस्यों की नियुक्ति राज्यपाल ही करें. किसी अधिनियम को निरस्त करने का नहीं, राज्यपाल को सि़र्फ यह तय करने का अधिकार होना चाहिए कि कौन सा अधिनियम लागू नहीं होगा.
पैरा 5(5) से विनियमों को ‘तत्काल’ राष्ट्रपति के अनुमोदन को भेजने की बाध्यता हटा दें, इस हड़बड़ी की ज़रूरत नहीं. शिड्यूल कास्ट में जैसे ‘एस’ और ‘सी’ को कैपिटल केस किया मायने बड़ा लिखा है वैसे ही शिड्यूल ट्राईब में भी करें.
जयपाल सिंह ने कहा कि हर स्थान पर अनुसूचित क्षेत्र और अनुसूचित जनजाति को साथ-साथ लिखना चाहिए ताकि सारे आदिवासी इसमें शामिल हो जाएं. अनावश्यक उलझनें हटा कर स्पष्ट कर दीजिए कि राज्यपाल की रिपोर्ट वार्षिक होगी. लेकिन आदिवासी अंचलों में आज तक पांचवी अनुसूची के बारे में सही ढ़ग से विमर्श में भी नहीं लाया गया.
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विधानसभा चुनाव में अदिवासी समाज के साथ पार्टियों के समक्ष भी है यह चुनौती
विधानसभा चुनाव में सवाल उठता है कि क्या राजनीतिक दलों ने आदिवासी इलाके के लोगों को संविधान में मिले आधिकारों को चुनाव में लागू करने का भरोसा दिलाया?
क्या समता जजमेंट को बहाल करने का भरोसा आदिवासी अंचल के लोगों को 2019 के विधानसभा चुनाव में मिलेगा?
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