
Amit Jha
Ranchi : पूर्व आइजी अरुण उरांव ने रात्रि पाठशाला की दिलचस्प मुहिम चलायी है. इससे जुड़ कर 36 गांवों में हजारों बच्चे अब बुलंदियों पर जाने का सपना पालने लगे हैं. बता दें कि श्री उरांव सियासत में भी हैं.
भाजपा के राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति मोर्चा की राष्ट्रीय समिति में विशेष सदस्य के तौर पर जुड़े हुए हैं. पर अखड़ा, धुमकुड़िया संस्कृति से अब भी उनका जुड़ाव देखते बनता है.

यही वजह है कि इस संस्कृति को आगे बढ़ाने, बचाने के लिए 36 रात्रि पाठशाला के जरिये आंदोलन छेड़ रखा है. इसे शुरू हुए तकरीबन सात साल हो गये. इस पाठशाला के जरिये बच्चों के ख्वाब अब बड़े होने लगे हैं.
कल तक टीचर, सिपाही भर की नौकरी की ख्वाहिश रखनेवाले बच्चे अब फर्राटेदार अंग्रेजी बोल रहे हैं. कलेक्टर, डॉक्टर, अफसर बनने का भरोसा उनमें अब पैदा होने लगा है.
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विरासत को आगे ले जाने का मिशन
अरूण उरांव कहते हैं कि वे अपने परिवार की विरासत को आगे ले जाने की ही छोटी सी कोशिश कर रहे हैं. ससुर कार्तिक उरांव, पिता बंदी उरांव सरकारी सेवा में बड़े ओहदे पर थे. समय से पहले वीआरएस लेकर समाज, राज्य हित में पहल की.
शिक्षा को सबसे बड़ा जरिया बनाया. यही वजह रही कि उन्होंने भी आठ साल पहले अपनी नौकरी से वीआरएस लिया. 2014 में झारखंड लौटे. बेड़ो, इटकी, मांडर और आसपास के ग्रामीण इलाकों में बच्चों के बीच शिक्षा के गिरते स्तर को लेकर बेचैनी महसूस की. इसके बाद रात्रि पाठशाला का कंसेप्ट आया औऱ इस पर काम शुरू किया.

गांवों में अखड़ा, धुमकुड़िया की समृद्ध परंपरा रही है. लोग इस बहाने एक साथ जुटते आये हैं. एक दूसरे के सुख दुख को जान समझ कर आपसी सहभागिता के साथ आगे बढ़ते रहे. यही वजह रही कि थाना, कचहरी की नौबत जनजाति समाज में गांवों में नहीं दिखती थी.
पर समय के साथ इसमें हल्कापन आया. नशापान, डायन बिसाही औऱ अन्य सामाजिक बुराइयां बढ़ीं. ऐसे में यही महसूस हुआ कि बच्चों को शिक्षित करने के बहाने गांवों को चेतनामय, जागरूक बनाया जाये. सामाजिक बदलाव का माध्यम शिक्षा ही हो सकता है.
सबसे बड़ा हथियार भी. इसके बाद सप्ताह में एक-दो दफा मांडर (रांची) के कुछ बच्चों को निःशुल्क पढ़ाने की पहल खुद से शुरू की. बच्चों की बढ़ती संख्या और रुचि देख कर बाबा कार्तिक उरांव द्वारा स्थापिक अखिल भारतीय आदिवासी विकास परिषद के बैनर तले रात्रि पाठशाला को अमलीजामा पहनाना 2014 से ही शुरू किया.
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3 जिलों में चल रही मुहिम
रात्रि पाठशाला के लिए मांडर, रांची से पहल शुरू की गयी, बिना किसी सरकारी मदद के. दिनभर की व्यस्तता, कामकाज के बाद ग्रामीण बच्चे इन कक्षाओं में शामिल होते हैं. शाम 6 बजे से रात के 8.30 बजे तक यह क्लास चलती है.
गणित, अंग्रेजी और विज्ञान विषयों में बच्चों को बेहतर बनाने का प्रयास होता है. पहली से लेकर दसवीं तक के बच्चों के लिए विषयवार, कक्षावार क्लास लगती है. कॉलेज जानेवाले औऱ गांवों के ही स्टूडेंट्स की मदद से छोटे-छोटे बच्चों को पढ़ाया जाता है.
हालांकि इसके एवज में अभी किसी को कुछ भी पारिश्रमिक नहीं दिया जाता. किताब कॉपी की जरूरतों को पूरा करने को स्थानीय पंचायत प्रतिनिधि, जनप्रतिनिधियों से सहयोग मिल रहा.

हर पाठशाला में एक-एक ब्लैक बोर्ड, इमर्जेंसी लाइट औऱ 2 दरी मुहैया करायी जाती है. पिछले पांच-छह सालों में साल दर साल लगातार बच्चों की शैक्षणिक गुणवत्ता बढ़ी है. वे अब बिरसा मुंडा, कार्तिक उऱांव, महात्मा गांधी और देश, राज्य के महानायकों के बारे में धड़ल्ले से अंग्रेजी में बात करने लगे हैं.
रात्रि पाठशाला की लोकप्रियता का आलम यह है कि अब रांची (बेड़ो, चान्हो, मांडर, इटकी), गुमला (घाघरा, भरनो), और लोहरदगा (सेन्हा) के गांवों में कुल 36 पाठशाला चल रही.
हर पाठशाला में 150-200 तक बच्चे हैं औऱ 5 से 10 शिक्षक. 200 शिक्षकों के जरिये तकरीबन 25 सौ बच्चों का चमकदार भविष्य तैयार किया जा रहा है.
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क्या है चैलेंज
पूर्व आइजी कहते हैं कि फिलहाल समस्या क्वालिटी एजुकेशन दिये जाने की है. कोशिश है कि पढ़ाने वाले शिक्षकों की टीचिंग स्किल कैसे और बेहतर किया जाये. उन तरीकों की खोज भी जारी रहती है अंग्रेजी, हिन्दी औऱ संस्कृत में बच्चे संतुलन कैसे बना सकें.
पढ़ाई में बच्चों की रुचि और दिलचस्पी कैसे बढ़ायी जा सके. पढ़ाई के रोचक तरीकों की खोज चलती रहती है. इसमें अलग-अलग पेशों से जुड़े साथियों से भी मदद ली जा रही है. गांव वाले स्कूल तैयार करने को निःशुल्क जमीन देने को तैयार हो रहे.

सांसदों, विधायकों से भी मदद के ऑफर हैं. उम्मीद है कि रात्रि पाठशाला के बहाने से गांवों की सकारात्मक तस्वीर बदलने की मुहिम सफल होगी.
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