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जानिए चे ग्वेरा की कहानी, जिनकी मौत के 53 साल बाद भी खौफ खाती हैं साम्राज्यवादी ताकतें

आज है इस क्रांतिकारी नायक का जन्मदिन

News Wing Desk

जिस चे ग्वेरा की तस्वीरों वाली टी-शर्ट दुनिया भर के युवा खूब पहनते हैं, उनके बारे में वो कितना जानते हैं? दुनिया भर के क्रांतिकारी नायकों में संभवतः सबसे लोकप्रिय नाम है- अर्नेस्टो चे ग्वेरा.

निरंकुश हुकूमत के खिलाफ क्रांति की राह में महज 39 साल की उम्र में साल 1967 में आज ही की तारीख यानी 9 अक्टूबर को शहीद हुए चे ग्वेरा की शख्सियत ही कुछ ऐसी रही कि उनका नाम सामने आते ही नस-नस में एक अजीबोगरीब जोश की लहर दौड़ पड़ती है.

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अर्जेंटीना में जन्मे इस शख्स ने अपने मुल्क की सरहदों के बाहर दुनिया के कई देशों में निरंकुश और जनविरोधी हुकूमतों के खिलाफ क्रांति की जो लहरें पैदा कीं, उसकी कोई मिसाल नहीं मिलती.

इस अकेले युवा ने अमेरिकी साम्राज्यवाद की चूलें हिला दीं. क्यूबा के बाद वोलोबिया में क्रांति की तैयारी करते अमेरिकी एजेंसी सीआईए के हाथों शहीद हुआ. वह अकेले अमेरिकी साम्राज्यवाद के लिए सबसे बड़े खौफ बन गये.

उन्हें मारने के लिए अमेरिका ने पूरी ताकत झोंक दी थी. चे ग्वेरा को गोलियों से छलनी कर दिया गया, लेकिन उनकी क्रांतिकारिता एक ओर आज भी निरंकुश हुकूमतों को डराती हैं, तो दूसरी ओर दुनिया भर के युवाओं में अन्याय के खिलाफ बगावत की प्रेरणा देती है.

अर्जेंटीना के रोसरियो में 14 जून 1928 को पैदा हुए ग्वेरा का पूरा नाम अर्नेस्टो ग्वेरा डी ला सैरना था. विद्रोह उनका जन्मजात स्वभाव था. उनके पिता कहते थे कि मेरे बेटे की रगों में आयरिश विद्रोहियों का खून बहता रहता है.

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ब्यूनस आयर्स से मेडिकल की पढ़ाई कर डॉक्टर बनने से पहले ही बहुत कम उम्र में उन्होंने करीब 3 हजार किताबें पढ़ डाली थीं. पाब्लो नेरूदा और जॉन किट्स उनके प्रिय कवि थे. रूयार्ड किपलिंग उनके पसंदीदा लेखकों में शामिल थे.

कार्ल मार्क्स और लेनिन के साथ बुद्ध, अरस्तू और वर्ट्रेड रसेल उनके प्रिय दार्शनिक और चिंतक थे. खुद चे एक अच्छे लेखक थे. वह नियमित डायरी लिखते थे. उन्होंने पूरे लैटिन अमेरिका की अकेले अपनी मोटरसाइकिल से यात्रा की.

इस यात्रा पर आधारित उनकी एक डायरी है, जो बाद में किताब के रूप में प्रकाशित हुई. चे के पिता स्पेन के खिलाफ पूरे दक्षिण अमेरिका में चल रहे संघर्षों के समर्थक थे. चे को अपने देश और अपने महाद्वीप के लोगों की गरीबी बेचैन कर देती थी.

होश संभालते ही उनके दिलो-दिमाग में यह प्रश्न उठता था कि आखिर प्राकृतिक संसाधनों से संपन्न और कड़ी मेहनत करनेवाले मेरे देश और मेरे महाद्वीप के लोग इतने गरीब, लाचार, बेबस और गुलाम क्यों हैं? क्यों और कैसे स्पेन और बाद में अमेरिका ने हमारे महाद्वीप पर कब्जा कर लिया और यहां की संपदा को लूटा.

यूं तो चे ग्वेरा पूरी दुनिया में क्रांतिकारिता के बेमिसाल चेहरे हैं, लेकिन उन्होंने क्यूबा में जो क्रांति की, उसकी कहानी अद्भुत है. इन्होंने क्यूबा में फिदेल कास्त्रो से हाथ मिला लिया. ये जल्द ही फिदेल कास्त्रो के सैन्य सलाहकार बन गये और बतिस्ता सेना के खिलाफ गुरिल्ला युद्ध शुरू कर दिया.

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जब 1959 में फिदेल कास्त्रो क्यूबा की सत्ता में आये, तो ग्वेरा ही सैन्य ऑपरेशंस के मुखिया रहे. माना जाता है कि इसी समय ग्वेरा के आदेशों पर 150 से 550 लोगों को मौत की सजा दी गयी.

सरकार के गठन के बाद राष्ट्रपति फिदेल कास्त्रो ने उन्हें तीसरी दुनिया के देशों से संबंध कायम करने का जिम्मा सौंपा. क्यूबा की क्रांति के दूत बनकर चे ने कई देशों की यात्रा की. भारत सरकार से उन्हें खास बुलावा था, जिसने फिदेल कास्त्रो की सरकार को फौरन मान्यता दी थी. मिस्र होते हुए चे गेवारा भारत आये थे.

बाद में कास्त्रो की सरकार ने इन्हें क्यूबा राष्ट्रीय बैंक का अध्यक्ष बना दिया गया, जिसके बाद इन्होंने अमेरिका से क्यूबा के आर्थिक लेनदेन और व्यापार संबंधों को लगभग समाप्त कर सोवियत संघ के साथ स्थापित कर लिए. इसके तीन साल बाद इन्हें उद्योग मंत्री बना दिया गया, हालांकि 1965 में इन्होंने इस पद से इस्तीफा दे दिया.

यही समय था, जब ग्वेरा क्यूबा क्रांति की धारणा को पूरे विश्व में फैलाना चाहते थे. 1966 में इन्होंने बोलिविया के लोगों को अपनी सरकार के खिलाफ भड़काया, हालांकि उन्हें इसमें ज्यादा सफलता नहीं मिली. इन्होंने उन लोगों की एक छोटी गुरिल्ला टुकड़ी से भी मदद करनी चाही, लेकिन इन्हें सेना ने पकड़ लिया.

पकड़े जाने के बाद सैनिक जब ग्वेरा को गोलियों से भूनने के लिए आगे बढ़े, तो उन्होंने कहा था– Do not shoot! I am Che Guevara and I am worth more to you alive than dead.” आखिरकार, 9 अक्टूबर 1967 को इनकी गोली मारकर हत्या कर दी गयी. चे ग्वेरा नहीं हैं, लेकिन करोड़ों दिलों में वे जिंदा हैं, जिंदा रहेंगे.

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