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फिल्म रिव्यू: झारखंड में सिनेमा के उज्ज्वल भविष्य की उम्मीद जगाती है दहलीज

फिल्म: दहलीज

निर्देशक: पुरुषोत्तम कुमार एनपीके

निर्माता: वाईके मिश्रा

कास्ट: आयुषी भद्रा, रौशन सौरव शर्मा, सुकंठ ठाकुर, शंकर पाठक, प्रिया मुर्मू, शीतल छाया केरकेट्टा, आरूणी झा, अशोक गोप

स्टार- 3/5

 

विवेक आर्यन

Ranchi: नागपुरी भाषा की संभवत: पहली फीचर फिल्म आज से झारखंड सहित ओड़िशा और छत्तीसगढ़ के थियेटरों में रिलीज हो रही है. पूरी तरह झारखंड में और शत प्रतिशत झारखंडी कलाकारों द्वारा बनाई गयी यह फिल्म झारखंड में सिनेमा की नवीनतम तस्वीर पेश करती है और इसके साथ ही जंगल-झाड़ से घिरे इस प्रदेश में सिनेमा के उज्ज्वल भविष्य की उम्मीद जगाती है.

दहलीज झारखंड की ही एक आम लड़की रानी की कहानी है. बचपन में ही मां को खो देने से रानी की दिमागी हालात ठीक नहीं है. अपनी सौतेली मां को वो अपनी मां की मौत का कारण मानती है और उससे नफरत करती है. पढ़ने में तेज मगर जंजीरों में कैद रहने वाली रानी के जीवन में पवन की एंट्री होती है और कहानी की परतें खुलनी शुरू होती हैं. पवन और रानी के बीच प्यार और रानी के जीवन की ट्रेजडी एक साथ दर्शकों से रू-ब-रू होती है. निर्देशक पुरुषोत्तम ने दोनों पहलुओं को बखूबी पर्दे पर उकेरा है. क्लाइमेक्स के बाद रानी के जीवन में आने वाले बदलाव का प्रेडिक्शन हालांकि पहले ही हो जाता है, लेकिन फिर भी कहानी अंत तक आपको पकड़े रखने में सक्षम होती है.

फिल्म का क्राफ्ट बड़ा है. बॉलीवुड में बन रही फिल्मों के मुकाबले यह फिल्म किसी पहलु पर कमजोर नजर नहीं आती. कैमरा, संगीत, बैकग्राउंड म्यूजिक आपको कहानी से इस कदर जोड़े रखता है कि सबकुछ स्वभाविक हो जाता है. आयुषी भद्रा का किरदार फिल्म खत्म होने के बाद भी आपके साथ रह जाता है, आपके जेहन में कई सवाल भी छोड़ जाता है. रौशन, सुकंठ, शंकर, प्रिया, शीतल और छोटी बच्ची के किरदार में आरूषी झा ने शानदार अभिनय का प्रदर्शन किया है. सभी अभिनेता बधाई के पात्र हैं.

फिल्म की शुरुआत में ही यह महसूस होता है कि फिल्म की पटकथा पर और काम किया जाना चाहिए था. फिल्म के अंत तक भी कई सवालों के जवाब नहीं मिल पाते हैं. मसलन रानी घर से बाहर बगैर जंजीरों के जाती है और उसे घर में जंजीर से बांध कर रखा जाता है. यह भी महसूस होता है कि रानी के जीवन में प्यार के पूरे भाग को जरूरत से अधिक विस्तार दिया गया है. लेकिन अभिनय और निर्देशन का कौशल इन बारिक कमियों को ढकने में कामयाब रहा है.

कुल मिलाकर मुझे ऐसी कोई वजह नजर नहीं आती जिसके कारण यह फिल्म नहीं देखी जानी चाहिए. इस बीच इसे दरकिनार नहीं किया जा सकता है कि फिल्म से जुड़े लगभग सभी कलाकार युवा हैं और यह सब बेहद सीमित संसाधनों के साथ हो सका है. यहां से नागपुरी या राज्य के अन्य भाषाओं में फिल्म बनाने वालों को बल मिलेगा. फिल्म का निर्देशन और अभिनय आपको नाराज नहीं करेगा.

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