Opinion

मर रहे हैं किसान और सियासत बेशर्म होकर विधायक खरीद-फरोख्त में मगन

Krishna Kant

जो लोग हजारों करोड़ का खजाना लुटाकर सरकार खरीद लेते हों, विधायक और सांसद खरीद लेते हों, उनकी समझ में यह कभी नहीं आएगा कि दो-चार हजार की फसल बर्बाद होने पर किसान आत्महत्या क्यों कर लेते हैं. इसीलिए यह देश किसान आत्महत्या पर चर्चा नहीं करता.

मिर्जापुर के हेमंत सिंह जिस लुंगी से अपना तन ढंककर इज्ज़त बचाते थे, उसी लुंगी से फांसी लगा ली. हेमंत सिंह को आप नहीं जानते, क्योंकि हेमंत सिंह न तो प्रधानमंत्री की पीठ पर अंबानी की तरह हाथ रख सकते हैं, न ही वे हजारों करोड़ में विधायक खरीद कर सरकार बना सकते थे. हेमंत सिंह किसान थे और भारत जो कभी कृषि प्रधान देश था, अब किसानों की कब्रगाह बन गया है.

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आपने हेमंत सिंह के बारे में इसलिए भी नहीं सुना होगा, क्योंकि जब उन्होंने फांसी लगायी, तब बारिश से बर्बाद हुई फसलों और बर्बाद हुए किसानों की कोई चर्चा नहीं थी. देश की सियासत बेशर्म होकर विधायक बेचने-खरीदने में मगन है.

हेमंत सिंह ऐसे अकेले नहीं हैं. कल हुई बेमौसम बारिश के बाद खबर आयी है कि उत्तर प्रदेश के फिरोजाबाद में कर्ज में डूबे उमेश चंद्र ने आत्महत्या कर ली.

झांसी के संतराम ने फसल बर्बाद होने के चलते आत्महत्या कर ली. अलीगढ़ में फसल खराब होने की चिंता में दो किसानों को हार्ट अटैक आ गया और उनकी मौत हो गयी.

राजस्थान के भरतपुर में रामेश्वर ने अपनी बर्बाद फसल देखी, तो उन्हें हर्ट अटैक आ गया और उनकी मौत हो गयी. श्रीगंगानगर के बुधराम को सदमा लगा और उनकी मौत हो गयी.

भरतपुर में ही ओलावृष्टि के बाद गुलाब सिंह और सुरेश ने आत्महत्या कर ली है. सुरेश के पास सिर्फ एक बीघा खेत है. उसने 7 बीघा बटाई पर लेकर सरसो बोई थी, सब बर्बाद हो गयी. क्या बटाईदार को देता, क्या अपने लिए रखता. यह कहानी लाखों सुरेशों की है.

लाखों कहानियां एक जैसी हों तो उसमें लोगों की दिलचस्पी खत्म हो जाती है. लाखों किसानों की मौत अब ऐसी घटनाएं हैं, जिनपर चर्चा करने में किसी की दिलचस्पी नहीं है.

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जब हमारी राष्ट्रीय चिंता मूत्रपान करके कोरोना भगाने और चुनावी खतरे में आया हिंदू बचाने की हो गयी है, तब यह तय हो गया है कि न हम कोरोना का निदान खोज सकने की कुव्वत रखते हैं और न हिंदू बचाने की. ये जितने किसानों के नाम ऊपर लिखे हैं, ये सभी हिंदू ही हैं.

पिछले सालों में किसान आत्महत्या की दर में 45 फीसदी की वृद्धि आयी है. ये मरने वाले किसान मध्यकाल वाले बाबर और चंगेज खान नहीं हैं, यह सब आम भारतीय हिंदू हैं. नेहरू के शब्दों में यही सब हमारी भारत माता हैं. अगर आपके पास दृष्टि है, तो आप रोज तमाम भारत माताओं को मरते हुए देख सकते हैं.

क्या आपने कभी यह सोचा है कि आपकी सरकार किसान आत्महत्या का आंकड़ा क्यों दबा रही है? क्योंकि उसकी भयावहता झेलने की ताकत इन सरकारों में नहीं है. किसानों को मरने के लिए छोड़ दिया गया है.

दुख के साथ कहना चाहता हूं कि 10 साल पहले जिन मसलों पर बातचीत करते हुए हम लोग पत्रकारिता सीख रहे थे, अब उन मुद्दों पर बातचीत होना बंद हो गयी है. अब सरकार की ओर से जरूरी मसलों के आंकड़े छुपाये जा रहे हैं और आलोचनाओं को दबा दिया गया है.

मनमोहन सिंह सरकार थी, तो मीडिया का बड़ा वर्ग किसान आत्महत्या पर खूब चर्चा करता था. इसके लिए मनमोहन सिंह को सीधे तौर पर जिम्मेदार ठहराया जाता था कि उनकी उदारवादी अर्थव्यवस्था ने 3 लाख किसानों की जान ले ली है. सरकार कम से कम यह दिखाने की कोशिश करती थी कि वह इस मसले पर संवेदनशील है.

तब जो लोग इन मुद्दों को लगातार उठाते थे, अब वे अर्बन नक्सल घोषित हो गये हैं. सबसे बुरा तो यह है कि अब उन इलाकों और प्रदेशों में भी किसान आत्महत्या कर रहे हैं, जहां अभी तक ऐसा नहीं हो रहा था.

पहले किसानों की आत्महत्या के लिए मुख्यतः महाराष्ट्र, ओडिशा, तेलंगाना, आंध्रप्रदेश, मध्य प्रदेश बदनाम थे. पिछले दो तीन सालों में उत्तर प्रदेश के विभिन्न इलाकों से खबरें आनी शुरू हुई हैं.

क्या हम अभी इतने मनुष्य नहीं हो पाये हैं कि अपनी मरती हुई जनता के लिए, गरीबों के लिए, किसानों के लिए दुखी हो सकें?

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