
NewDelhi : अमेरिका तथा चीन के बीच जारी ट्रेड वार का सर्वाधिक फायदा दुनिया की सबसे तेज रफ्तार से बढ़ने वाली भारतीय अर्थव्यवस्था को होना चाहिए था, लेकिन वास्तव में ऐसा नहीं हो रहा. ट्रेड वॉर से भारत के लाखों युवाओं व सस्ते मजदूरों को अवसर मिलने चाहिए थे, जबकि आंकड़े कुछ और बयां कर रहे हैं. हालत यह है कि पिछले कुछ महीनों में देश के प्रत्यक्ष विदेशी निवेश में बढ़ोतरी के बजाय गिरावट दर्ज की गयी है.
ब्लूमबर्ग की एक रिपोर्ट के मुताबिक, प्रत्यक्ष विदेशी निवेश में आई इस गिरावट के लिए कुछ हद तक लोकसभा चुनाव के कारण निवेशकों का एहतियात भरा रवैया हो सकता है, क्योंकि केंद्र में सत्तासीन नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार ने विपक्ष से आ रही चुनौतियों से निपटने के लिए निवेशकों को किनारे लगा दिया. इसके अलावा कई और कारण हैं, जिनमें निवेश की राह में स्थानीय विपक्षी पार्टियां और राजनीति से प्रेरित संरक्षणवादी रवैया शामिल हैं.
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नये कानून से ई-कॉमर्स कंपनियों की लागत बढ़ गयी
इसी साल फरवरी में केंद्र सरकार ने एफडीआई का नया कानून लागू कर दिया, जिससे दिग्गज ई-कॉमर्स कंपनियों ऐमजॉन और वॉलमार्ट इंक के स्वामित्व वाली कंपनी फ्लिपकार्ट को भारी झटके का सामना करना पड़ा. मोदी सरकार द्वारा संरक्षणवादी रवैये के तहत लागू किये गये इस कानून से ई-कॉमर्स कंपनियों की लागत बढ़ गयी. इसी महीने, सऊदी अरब द्वारा समर्थित 44 अरब डॉलर की लागत वाली प्रस्तावित ऑयल रिफाइनरी को दूसरी जगह शिफ्ट करना बड़ा, क्योंकि स्थानीय किसानों ने इस परियोजना का विरोध किया और इसके लिए जमीन देने से इनकार कर दिया.
निवेश की राह में हालांकि कुछ सफलताएं भी हाथ लगी हैं, जिनमें फॉक्सकॉन टेक्नॉलजी ग्रुप ने हाल में व्यापक पैमाने पर एपल के स्मार्टफोन बनाने की योजना का खुलासा किया है। लालफीताशाही के कारण ही भारत में निवेश परवान नहीं चढ़ पाया है.
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पश्चिमी देशों की कंपनियां भारत के लिए चीन का विकल्प बन सकती हैं
सिलिकॉन वैली स्थित कार्नेजी मेलॉन यूनिवर्सिटी के कॉलेज ऑफ इंजिनियरिंग में फेलो एवं प्रोफेसर विवेक वाधवा कहते हैं, भारत को मैन्युफैक्चरिंग एवं अन्य क्षेत्रों में निवेश आकर्षित करने की बेहद जरूरत है. इस राह में असीम संभावनाएं हैं. पश्चिमी देशों की कंपनियां भारत के लिए चीन का विकल्प बन सकती हैं. अगर भारत ने विकल्प दिया होता तो इससे उसे बड़ा फायदा होता.
सिंगापुर के एपेक्स एवलॉन कंसल्टिंग पीटीई की चेयरमैन और टीसीएस की पूर्व सीईओ ने कहा कि अगर भारत को दहाई आंकड़े में विकास दर चाहिए तो उसे निवेश और जीडीपी के अनुपात को 30 फीसदी से बढ़ाकर 40 फीसदी करने की जरूरत है. उन्होंने कहा, इस तरह के निवेश स्तर को पाकर हमने चीन तथा पूर्वी एशियाई अर्थव्यवस्थाओं को बेहद तेज गति से आगे बढ़ते हुए देखा है. उल्लेखनीय है कि साल दर साल आधार पर बीते दिसंबर तक नौ महीनों में एफडीआई सात फीसदी गिरकर 33.5 अरब डॉलर पर पहुंच गया है.
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