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प्रचार वार में जेएमएम पिछड़ा,  लोकसभा चुनाव नतीजा ही तय करेगा हेमंत का राजनीतिक भविष्य

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Ranchi:  भले ही इस बार का लोकसभा चुनाव मुद्दा विहीन हो. लेकिन हमेशा की तरह इस बार भी चुनावी प्रचार जोर-शोर से हो रहा है. झारखंड का लगभग हर शहर पोस्टर और बैनरों से पटा पड़ा है. विज्ञापन के लिए कई तरह के प्लेटफार्म अपनाये रहे हैं.

सोशल मीडिया से लेकर मेन स्ट्रीम मीडिया तक सभी चुनावी रंग में रंगे नजर आ रहे हैं. प्रचार के इस दौर में,  जिसे चुनाव का पहला दौर कहा जाता है,  में झारखंड की मुख्य विपक्षी पार्टी जेएमएम फिसड्डी साबित हो रही है. बैनर, पोस्टर से लेकर मेन स्ट्रीम मीडिया या फिर सोशल मीडिया में जेएमएम न के बराबर नजर आ रहा है.

जिस तरह का कैनवास चुनाव के दौरान दूसरी पार्टियां बना रही हैं, उसमें जेएमएम बहुत पीछे चला गया है. जेएमएम के लोग इसके लिए हेमंत के करीब रहने वाले दो-तीन लोगों को जिम्मेदार बताते हैं. चुनावी पंडितों का कहना है कि ऐसे में जेएमएम को नुकसान भी हो सकता है.

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अगर लोकसभा चुनाव के नतीजे जेएमएम के अनुकुल नहीं आये,  तो विधानसभा चुनाव में इसकी कीमत हेमंत सोरेन को चुकानी पड़ सकती है. फायदा किसे होगा, यह कहना मुश्किल है, पर हेमंत सोरेन का सत्ता शीर्ष तक पहुंचना मुश्किल हो जायेगा.

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मिली हैं चार सीटें, तीन पर जीत जरूरी

महागठबंधन के सीट शेयरिंग में जेएमएम के हिस्से में चार सीट आयीं हैं. गिरिडीह, जमशेदपुर, दुमका और राजमहल. इन चारों सीट में से दो सीट दुमका औऱ राजमहल पहले से जेएमएम के खाते में हैं.

दुमका जेएमएम के लिए पुश्तैनी सीट मानी जाती है. हेमंत सोरेने के पिता शिबू सोरेन यहां से आठ बार चुनाव जीत चुके हैं. इस बार अगर वो चुनाव जीतते हैं,  तो वो झारखंड में सबसे ज्यादा बार लोकसभा चुनाव जीतने का रिकॉर्ड बनायेंगे.

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लेकिन लोगों के जेहन में यह भी है कि पिछले विधानसभा चुनाव में दुमका से ही बीजेपी की तरफ से लुईस मरांडी ने हेमंत सोरेन को मात दी थी. प्रचार-प्रसार की बात करें तो, जेएमएम दुमका और राजमहल के अलावा गिरिडीह और जमशेदपुर में उस तरीके का प्रचार-प्रसार नहीं कर रहा है, जिस तरीके से दूसरी बड़ी पार्टियां कर रही हैं.

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कार्यकर्ताओं में बढ़ रही है नाराजगी

लोकसभा क्षेत्रों में हर पार्टी गेट टूगेदर के नाम पर रोजाना कोई न कोई कार्यक्रम आयोजित कर रही हैं. कभी लिट्टी चोखा, तो कभी मुर्गा पार्टी का दौर आम है.

चुनाव में कार्यकर्ताओं का एक मात्र स्कोप ऐसे ही आयोजन को लेकर होता है. दिए गए खर्च में थोड़ा तीन-पांच हो ही जाता है. कार्यकर्ताओं की इस सोच से सभी पार्टियां वाकिफ हैं.

लिहाजा चुनाव के दौरान सब कुछ जानने के बाद भी पार्टी ऐसे खर्चों के लिए मना नहीं करती. इस काम में वही पार्टी सबसे आगे है, जो बाकी सभी राजनीतिक हथकंडों में आगे है. जो पार्टी ऐसे आयोजनों से बच रही है,  उसके कार्यकर्ताओं में नाराजगी बढ़ रही है.

हेमंत का राजनीतिक भविष्य दांव पर

निश्चित तौर पर महागठबंधन का स्वरूप बनने के दौरान जेएमएम ने विधानसभा चुनाव को देखते हुए हामी भरी थी. लोकसभा में कांग्रेस को सबसे ज्यादा सीट देने का मकसद ही विधानसभा में लीड पार्टी बनने का था.

लेकिन जेएमएम को मिली चार सीटों में से तीन सीट जेएमएम नहीं निकाल पाती है  और कांग्रेस सात में चार तक निकाल लेती है, तो कांग्रेस का प्रेशर महागठबंधन पर बढ़ जायेगा.

फिर जेएमएम की वैसी नहीं चलने वाली जैसा उसने विधानसभा के लिए सोच रखा है. ऐसे में लोकसभा चुनाव के नतीजों के बारे कहा जा रहा है कि ये नतीजे ही हेमंत सोरेन का राजनीतिक भविष्य तय करेंगे.

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