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क्या डीके पांडेय के कार्यकाल में ध्वस्त हो गया पुलिस विभाग का सिस्टम

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Surjit Singh

  • खूंटी से चार जवान अगवा हुए, पुलिस ने तीन बताया. जब वापस लौटे तब चार जवान थे.
  • लातेहार के बूढ़ा पहाड़ में अफसरों की गलत रणनीति की वजह से छह जवान शहीद हो गये, पुलिस मुख्यालय जांच तक नहीं करा रही.
  • बूढ़ा पहाड़ पर चल रहे अभियान की जानकारी पुलिस मुख्यालय में एडीजी अभियान और आइजी अभियान को नहीं थी.
  • राजधानी में शव उठाने के लिए दो थानों की पुलिस आठ घंटे तक लड़ती रही.
  • बकोरिया कांड में लोकसभा, विधानसभा से लेकर मीडिया में पुलिस विभाग की लगातार फजीहत होती रही है.
  • धनबाद में इंस्पेक्टर ने सीनियर अफसरों के दवाब में फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली, अब तक सभी जिम्मेदार अफसरों पर कार्रवाई नहीं हुई.
  • जामताड़ा में महिला सिपाही का यौन शोषण करने वाले पुलिसकर्मियों को वहां के एसपी और पुलिस मुख्यालय ने बचाने का प्रयास किया.

ऊपर लिखे तथ्य हाल के दिनों में मीडिया में आयी खबरों की है. ये तथ्य क्या इशारा करती है. क्या झारखंड पुलिस का सिस्टम ध्वस्त हो गया है. क्या डीजीपी डीके पांडेय के तीन साल के कार्यकाल में झारखंड पुलिस की कार्यप्रणाली और ज्यादा खराब होती चली गयी. वैसे ढ़ाई साल पहले ही दर्जन भर से अधिक अफसरों के सामने मुख्यमंत्री उन्हें सस्पेंड करने की चेतावनी दे चुके हैं. 27 जून को भी सीएम ने सबके सामने उन्हें झिड़की देते हुए कहा था कि कहानी मत बनाओ, एक्शन लो. पुलिस के सीनियर अफसर कहते हैं कि इस तरह की घटनाओं से वर्तमान डीजीपी को भलें ही फर्क नहीं पड़े, पर डिपार्टमेंट का मोरल तो डाउन होता ही है.

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पहले गर्दन में सांप लटकाकर, फिर प्रेस कांफ्रेंस में भाजपा प्रवक्ता की तरह बात करके डीजीपी आलोचना के शिकार हुए. विभाग के दूसरे अफसर कहीं कुछ बोलने के लायक नहीं रहे हैं. विपक्ष सवाल कर रहा है कि ब्यूरोक्रेट्स इस तरह किसी पार्टी का आदमी बन कर कैसे काम कर सकता. कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अजय कुमार ने तो डीजीपी पर कार्रवाई की भी मांग की है.

तीन जुलाई को हर अखबार में एक खबर थी. खबर यह है कि शहर के दो थानों की पुलिस शव उठाने के लिए आठ घंटे तक लड़ती रही. दूसरे दिन की अखबारों में पुलिस पदाधिकारी पर किसी तरह की कार्रवाई की कोई खबर नहीं दिखी. राजधानी, जहां सीएम, मुख्य सचिव से लेकर डीजीपी रहते हैं, वहां इस तरह की घटनाओं पर जब पुलिस महकमा चुप है, तो फिर राज्य के सुदूर इलाकों की स्थिति का सहज अंदाजा लगाया जा सकता है. इससे पहले भी रांची में लगातार दंगे हुए, लेकिन किसी भी घटना के बाद किसी के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की गयी.
अफसरों पर कार्रवाई करने को लेकर भी पुलिस विभाग पर सबसे गंभीर आरोप लग रहे हैं. विभाग में किसी भी अफसर या कर्मी से बात कर लीजिये. वह साफ कहता है कि अगर किसी खास जाति के हैं, तो आपकी सुनी जायेंगी, नहीं तो भगा दिया जायेगा. खास जाति के हैं, तो कोई भी गलती करके बच सकते हैं. और अगर उस जाति से नहीं हैं, तो छोटी सी गलती पर भी निलंबन की कार्रवाई हो सकती है. कई घटनाएं इसके उदाहरण हैं.

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सवाल यह कि क्या हालात एक दिन में बिगड़े. दरअसल, डीके पांडेय के डीजीपी का पद संभालने के बाद वैसे अफसरों को ही तवज्जो दी जो उनकी हां में हां मिला सके. इस वजह से अच्छे और अनुभवी अफसरों को किनारे कर दिया गया. सबसे पहले टीपीसी के खिलाफ कार्रवाई शुरु करने वाले एडीजी अनिल पाल्टा को किनारे किया गया. बकोरिया कांड के बाद तो कई अफसरों के साथ दुश्मन के जैसा सलूक किया गया. रातो रात एडीजी सीआइडी रेजी डुंगडुंग, रांची जोन के आइजी सुमन गुप्ता, पलामू प्रमंडल के डीआइजी हेमंत टोप्पो को बदल दिया गया. देखा जाये तो बकोरिया कांड की वजह से सात से आठ आइपीएस अफसर परेशान किये गये या परेशान हुए और आगे भी परेशान ही रहने की नौबत है.

शीर्ष स्तर से दुर्भावना से ग्रसित होकर काम करने, ट्रांसफर-पोस्टिंग में पूर्वाग्रह का हावी होने की वजह से भी हालात बिगड़े हैं. कई अफसरों को यह लगता है कि उन्हें बेवजह निशाना बनाया जा रहा है. जबकि कुछ अफसरों की शिकायत यह है कि वह आईपीएस हैं. अपनी बदौलत. लेकिन सिर्फ जाति की वजह से उन्हें खास अफसर का पसंदीदा मान लिया जा रहा है. इसका खामियाजा उन्हें भविष्य में भुगतना पड़ सकता है. कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि पिछले तीन सालों में पुलिस विभाग में सिस्टम की जगह व्यक्ति महत्वपूर्ण हो गया. इस कारण सिस्टम ध्वस्त हो गया है.

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