Opinion

खतरनाक हालातः एक तरफ मजदूरों की बिछती लाशें और दूसरी तरफ डूबती अर्थव्यवस्था

Soumitra Roy

वैश्विक क्रेडिट रेटिंग एजेंसी मूडीज इन्वेस्टर्स सर्विस ने शुक्रवार को कहा कि वित्त वर्ष 2020-21 में भारत की आर्थिक वृद्धि शून्य रह सकती है. क्रेडिट रेटिंग का इस स्थिति तक पहुंचना भारत के लिए चिंता का विषय है. इससे हमारी सिर्फ आर्थिक स्थिति ही नहीं, हर स्तर पर आम लोगों पर खऱाब असर डालने वाली स्थिति बनेगी.

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ऐसा क्यों है?

–     भारत की क्रेडिट रेटिंग एकदम ज़मीन पर आ चुकी है. यानी देश में अब निवेश का कोई वातावरण नहीं है.

–     आर्थिक व संस्थागत दिक्कतों को दूर करने के मामले में मोदी सरकार नीतिगत रूप से कमजोर है.

–     निकट भविष्य में इसमें बेहतरी की संभावना भी नहीं है. क्योंकि रेटिंग एजेंसी ने कहा है कि कोरोना वायरस महामारी के कारण ऊंचे सरकारी ऋण,  कमजोर सामाजिक व भौतिक बुनियादी ढांचा तथा नाजुक वित्तीय क्षेत्र को आगे और दबाव का सामना करना पड़ सकता है.

आगे क्या असर होगा ?

– मूडीज ने कहा कि भारत की क्रेडिट रेटिंग के नकारात्मक परिदृश्य से पता चलता है कि जीडीपी की वृद्धि दर पहले की तुलना में काफी कम रहने वाली है.

– भारत में पहले से ही काफी उच्च स्तर का ऋण दबाव है. यह और बढ़ सकता है.

– कोरोना वायरस महामारी से लगा झटका आर्थिक वृद्धि में पहले से ही कायम नरमी को और बढ़ा देगा. इसने राजकोषीय घाटे को कम करने की संभावनाओं को पहले ही कमजोर कर दिया है.

मूडीज की स्थानीय इकाई इक्रा ने इस महामारी के कारण वृद्धि दर में दो प्रतिशत की गिरावट की आशंका व्यक्त की है. एक तरफ देश में प्रवासी मज़दूरों की बिछती लाशें और उधर डूबती अर्थव्यवस्था. ऐसी स्थिति में एक ऐसी सरकार की जरुरत हो जो आर्थिक मुद्दे पर दूर दृष्टि रखने वाला है.

उसके सलाहकार मंडली में वैसे लोग हों, जो देश की आर्थिक हालात को ठीक करने के लिये कदम उठाये. ना कि सिर्फ एक व्यक्ति के इशारे पर. नोटबंदी, गैरनियोजित तरीके से लागू की गई जीएसटी और अब बिना सोंचे समझे लागू किया गया लॉकडाउन यह साबित करने के लिये काफी है कि मोदी सरकार में जो लोग काम कर रहे हैं, वह अदूरदर्शी हैं और वह सिर्फ एक व्यक्ति के इशारे पर काम कर रहे हैं.

डिस्क्लेमर : ये लेखक के निजी विचार हैं

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