
Faisal Anurag
इंसानियत के अवसान के दृश्य मध्यवर्ग में अपूर्व तरीके से दिख रहे हैं. सोलह मजदूरों के मालगाड़ी से कटने के बाद सोशल मीडिया ऐसी प्रतिक्रियाओं से भरा हुआ है. जिसमें नफरत है. और है श्रमिकों के प्रति हिकारत. खास कर ट्वीटर पर जिस तरह की बातें दो दिनों में हुई हैं, वह मरते हुए भारतीय मध्यवर्ग की कहानी है. मौत के लिए श्रमिकों को ही दोषी ठहराने का नफरती विचार आखिर आता कहां से है. जो सरकार की नीतियों को नजरअंदाज कर देता है.
औरंगाबाद हादसे के पहले तक केवल 350 लोगों की मृत्यु या तो भूख से या अवसाद से या कारोना के आतंक के कारण हुई. जिस तरह का व्यवहार कोरोना वायरस के संदिग्धों के साथ हो रहा है उसकी पीड़ा तो अलग ही है. मरीज को अपराधी समझता यह समाज दरअसल क्या बताना चाहता है? इसके लिए तल्ख शब्द प्रयोग में लाए जा रहे हैं. यह प्रवृति कोई अचानक पैदा नहीं हुई है. इसकी तो सामाजिक जड़ें पहले से मौजूद रही हैं.
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इतिहास के मध्यकाल में भी मजूदरों के साथ जो सामंती क्रूरता हुई, उसे फिर से दुहराया जा रहा है. दंतकथा है कि नायाब भवनों के निर्माता मजदूरों के हाथ काट लिए जाते थे. इसी भारत में. श्रमिकों के बगैर किसी भी समाज की प्रगति असंभव है. बावजूद इन मेहनती और हुनरमंद श्रमिकों को सम्मान के नजरिए से नहीं देखा जाता. प्रवासी श्रमिकों को घर लाने की मांग जब जोर पकड़ रही थी, तब कई राज्य सरकारें कह रहीं थीं कि उनके आने से कोविड 19 की महामारी का विस्तार होगा. लेकिन यह कहते हुए इस हकीकत को झुठलाया जा रहा था कि वे जहां हैं और जिन हालातों में हैं वहां भी वे संक्रमित हो सकते हैं.
झारखंड के गढ़वा में 20 कोविड मरीज की पुष्टि हुई है. वे सभी सूरत से आए थे. इससे सरकारों की जांच करने और राज्यों में श्रमिक प्रबंधन के तमाम दावों का भी पर्दाफाश होता है. सूरत में किन हालातों में मजदूरों को रखा गया और गुजरात सरकार की इसमें क्या लापरवाही रही है, उस पर विचार किए जाने की जरूरत है.
यदि तुलना कर देखा जाए तो मध्यपूर्व से लाये जा रहे लोगों के लिए क्वारेंटाइन के लिए होटल का प्रबंध किया जा रहा है. लेकिन भारत के विभिन्न राज्यों के प्रवासी मजदूरों के लिए रहने का जो प्रबंध किया गया उसमें तो शायद जानवर भी रहना न पसंद करें. मजूदर तो अपनी पीड़ा बता रहे हैं कि उन्हें किस तरह का खाना दिया गया और किस तरह रहने के लिए दिया गया. इतने बड़े देश में सरकार ने जिस योजनारहित लॉकडाउन को लागू किया उससे सरकार की किरकिरी ही हो रही है.
नरेंद्र मोदी सरकार की प्रवृति हो गयी है कि तमाम बड़े फैसले जिस तरह किये जा रहे हैं उससे आमलोगों की परेशानी बढ़ती है. चाहे लॉकडाउन हो या जीएसटी या नोटबंदी. इन तीनों ने लोगों के बीच जिस तरह का डर पैदा किया उस पर अलग से चर्चा की जरूरत है.
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अपने राज्य वापस लौटे मजदूरों को ले कर मध्यवर्ग जिस तरह की बातें कर रहा है. उससे तो 21वीं सदी को भी शर्मसार होना पड़ रहा है. इसके सामाजिक सांस्कृतिक कारणों पर तो बाद में बात होनी चाहिए. अब चुनौती राज्य सरकारों की है कि वह इन श्रमिकों के पुनर्वास के लिए किस तरह का पहल करती है. और उसे अमली जामा पहनाती है.
ताकि भरेसा फिर से पैदा हो सके. पूंजी के बढते दौर में श्रम की महत्ता को नजरअंदाज करने का नतीजा दुनिया देख रही है. बड़े लोगों को राहत और गरीबों को तकलीफ का यह दौर लंबा नहीं चल सकता है. सुप्रीम कोर्ट से रिटायर हुए जज दीपक गुप्ता ने अपने अंतिम संबोधन में जो कुछ कहा उसे गंभीरता से लेना चाहिए. उन्होंने सामाजिक और कानूनी वर्गविभेद के सवाल को रेखांकित कर उस खामोशी को स्वर दिया जिसकी आज सबसे ज्यादा जरूरत है.
दुनिया के महान कवि ब्रतोल्त ब्रेख्त की एक कविता है. जो बताती है कि इतिहास के तमाम दौरों में श्रमिकों के साथ क्या किया गया है. वह भारत में 21वीं सदी में भी जारी है.
जर्मनी के सबसे बड़े कवि ब्रेख्त की कविता है :
किसने बनाया सात द्वारों वाला थीब?
किताबों में लिखे हैं सम्राटों के नाम
क्या सम्राट पत्थर ढो-ढोकर लाये?
और बार-बार विनष्ट बैबीलोन
किसने उसे हर बार फिर से बनाया?
किन घरों में रहते थे सोना जैसे चमकते लीमा के मजूरे?
कहां बिताई शाम, जब चीन की दीवार बनकर ख़त्मी हुई, उसके राजगीरों ने?
महान रोम भरा पड़ा है विजय तोरणों से.
किसने उन्हें खड़ा किया?
किस पर हासिल की सीजरों ने जीत?
चारणगीत समृद्ध बैंजटियम में क्या महल ही महल थे वहां रहनेवालों के लिए?
दन्तगकथा के अटलाण्टिस में भी
उस राज, जब समन्दरर उसे निगल गया, चीखें होंगे डूबनेवाले अपने गुलामों की खातिर.
नौजवान सिकन्दर ने भारत जीता.
अकेले उसने?
सीज़र ने गालों को मात दी.
क्या उसके साथ एक रसोइया तक न था?
स्पेरन का फिलिप रोता रहा, जब उसका बेड़ा तहस-नहस हो गया.
और कोई नहीं रोया?
सातसाला जंग में फ्रेडरिख द्वितीय की जीत हुई.
जीता कौन उसके अलावा?
हर पन्नें पर एक जीत.
किसने पकाए जीत के भोज?
हर दस साल पर एक महान पुरुष.
किसने चुकाए उनके हिसाब?
इतनी सारी रपटें
इतने सारे सवाल.
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