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प्रवासी मजदूरों से घर वापसी के लिए अधिक किराया वसूलने के पीछे कौन सा गणित और रणनीति काम रही है, इसे समझिये

Faisal Anurag

कोरोना वायरस के इस भयावह दौर में राजनीति परवान पर है. लेकिन यह राजनीति विरोधियों को निशाने पर लेने की है. भारत में पिछले छह सालों में देखा गया है कि तमाम सवाल विपक्ष से ही पूछे जा रहे हैं. और सत्तापक्ष की गलतियों को भी उसके मास्टर स्ट्रोक के रूप में पेश किया जा रहा है. मुख्यधारा की मीडिया के बड़े तबके और सत्तापक्ष के निशाने पर न केवल विपक्षी दलों की सरकारें हैं बल्कि विपक्ष के नेताओं के सुझाव भी हैं. असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों की घरवापसी के सवाल पर भी झारखंड सहित कई प्रदेशों की घटनाएं बताती हैं कि भारतीय जनता पार्टी के नेता श्रेय लेने की प्रतिस्पर्धा में उतर आए हैं. उन सवालों को दरकिनाकर कर जिससे श्रमिक लॉकडाउन के बाद से ही झेल रहे हैं.

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सोनिया गांधी ने मजदूरों की घरवापसी के लिए किराया देने की बात क्या की कि भाजपा आईटी सेल उबल पड़ा है. आखिर रेल मंत्रालय इस संकट के समय इन मजदूरों से किराया वह भी अतरिक्त दर पर क्यों वसूलने की बात कर रहा है. भिवंडी से उत्तर प्रदेश के लिए खुली एक ट्रेन में 90 स्थान खाली रह गए. क्योंकिे मजूदरों के पास पैसे नहीं थे. और स्टेशन आ कर उन्हें निराश लौटना पड़ा है. इससे सवाल उठ रहे हैं कि क्या केंद्र सरकार ने मजूदरों की वापसी की इजाजत बेमन से दी है. सोशल मीडिया पर इसे ले कर कड़ी प्रतिक्रिया वायरल हो रही है.

युवा पत्रकार श्याम मीरा सिंह ने फेसबुक पोस्ट में लिखा है : सोनिया ने कहा है कि “जब सरकार, गुजरात के एक कार्यक्रम भर में खाने-पीने और ट्रांसपोर्ट पर 100 करोड़ रुपए खर्च कर सकती है, जब रेल मंत्रालय प्रधानमंत्री कोरोना फंड में 150 करोड़ रुपए जमा कर करवा सकती है तो मजदूरों के ट्रांसपोर्ट पर खर्च क्यों नहीं किया जा रहा?”

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क्विंट की एक रिपोर्ट के अनुसार, भिवंडी से उत्तरप्रदेश के गोरखपुर के लिए श्रमिक स्पेशल ट्रेन चलाई गई थी. लेकिन इसमें करीब 90 सीटें खाली रह गईं. किसी तरह अपने घर लौटने की आस में स्टेशन पहुंचे 100 से ज्यादा मजदूरों को वापस लौटना पड़ा. इन मजदूरों के पास टिकट खरीदने के पैसे नहीं थे.

टाइम्स ऑफ इंडिया में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक करीब 64 फीसदी मजदूरों के पास अब 100 रुपये से भी कम पैसे बचे हैं, अखबार ने ये आंकड़ा ‘स्ट्रैंडेड वर्कर्स एक्शन नेटवर्क (SWAN)’ नाम की एक रिपोर्ट के हवाले से दिए हैं. इस रिपोर्ट को बनाने में 32 दिनों की मेहनती लगी है जिसमें करीब 16,863 मजदूरों से बात की गयी.

अब बात ये है कि रोज कमाने, रोज खाने वाले संकट में फंसी हुई बेचारी गरीब जनता पर आपकी पैसेंजर ट्रेनों के टिकटों के लिए हजार-हजार रुपए चुकाने के लिए कहां से आएं?  यदि किसी परिवार में 6-7 सदस्य हुए तो वे तो वहीं मर जायेंगे!

आप कर्ज में फंसे हुए उद्योगपतियों के पैसे चुका सकते हैं, मजदूरों के क्यों नहीं? क्या इस देश की आर्थिकी में उनका कोई योगदान नहीं है?

मुकेश असीम अर्थशास्त्र के जानकार हैं. उन्होने पीएम केयर फंड पर सवाल उठाते हुए लिखा है : 1200 यात्री दो हजार किमी का औसत लें तो एक ट्रेन पर रेलवे को मजदूरों से भाड़ा वसूली कर मिलेगा – 10 लाख रुपया.

रेलवे ने PM-Cares में दिये 151 करोड़ रुपये. इतने में 1510 गाडियां चलाकर 18 लाख मजदूरों को घर पहुंचाया जा सकता था, बिना कोई भाड़ा वसूले.

लेकिन PM Cares for fund and capitalists, not workers. और ये पूंजीपति क्या चाहते हैं? मजदूरों को शहरों से न जाने देना! क्यों? मजदूर जितने अधिक भूख तकलीफ में रहेंगे, कर्ज सिर पर चढ़ेगा, बाद में और भी कम मजदूरी में अधिक से अधिक घंटे काम करने को उतने ही मजबूर किए जा सकेंगे.

जाहिर है कि पीएम केयर फंड को ले कर सोनिया गांधी ने कुछ सवाल उठाया था. औऱ नरेंद्र मोदी को सुझाव दिया था कि पीएम केयर फंड में आए तमाम धन को पीएम राहत कोष का हिस्सा बनाया जाए. जिसकी निगरानी और ऑडिट सीएजी वैधानिक तरीके से करती है. जबकि केयर फंड को सीएजी के दायरे से बाहर रखा गया है. उसकी पूरी व्यवस्था एक प्राइवेट फंड की तरह है. यह सवाल उठते ही भाजपा आगबबूला हो गयी.

और उसके कई मंत्री कांग्रेस और सोनिया गांधी पर हमला वर हो गये. श्रमिक ट्रेन के विवाद के बाद पीएम केयर फंड को ले कर काफी सवाल उठाए जा रहे हैं. और भाजपा इस अवसर को अपनी राजनीति के लिए इस्तेमाल करते हुए कांग्रेस को निशाना बना रही है. अमरीका में जिस तरह ट्रंप ने चीन को दुशमन बना कर अपनी राजनीति तेज कर दी है,  ठीक उसी तरह भारत में भाजपा कांग्रेस और विपक्ष को निशाने पर ले रही है. केरल  सरकार के मॉडल से सीखने के बजाय केंद्र की राजनीति केरल को न केवल नजरअंदाज करने की है, बल्कि उसके निर्णयों को प्रभावित करने पर भी है.

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