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मुख्यमंत्री का गुस्सा और कंफ्यूज सिस्टम

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Surjit Singh

क्या झारखंड सरकार में सब ठीक नहीं चल रहा है. मुख्यमंत्री रघुवर दास गुस्से में हैं और उनके अधिकारी कंफ्यूज हो गये हैं ? क्या सिस्टम में पावरफुल लोग कुछ भी कर सकते हैं. तालाब में पार्किंग बना सकते हैं. क्या मुख्यमंत्री कुछ भी कह या कर सकते हैं ? किसी को लटका भी सकते हैं ? किसी को भी ब्लैक लिस्टेड कर सकते हैं ? वैसे हमें नहीं पता कि सरकार में लटकाने का भी कोई प्रोविजन है क्या ? खाली इंजीनियर ही दोषी हैं. आईएएस लोगों का कोई दोष नहीं.

सुबह-सुबह अखबारों में पहले पन्ने पर छपी उंगली दिखाते मुख्यमंत्री की तस्वीर देखने और उससे जुड़ी खबरें पढ़ने के बाद किसी को भी यही महसूस हो रहा होगा. राज्य का मुखिया बहुत गुस्से में है और उनका सिस्टम कंफ्यूज है. आखिर सिर्फ साढ़े तीन साल में यह सिस्टम कंफ्यूज हो गया या पहले से ही था. पहले से ही था तो इसे ठीक करने की जिम्मेदारी तो आप ही की थी और है मुख्यमंत्री जी.

 

हिंदी दैनिक प्रभात खबर में पहले पन्ने पर खबर के साथ मुख्यमंत्री जी एक तस्वीर छपी है. उंगली दिखाते. चेहरा गुस्से से तमतमाया हुआ.

मुख्यमंत्री का बयान हैः

जनवरी तक काम नहीं हुआ, तो यहीं लटका देंगे.

यह लटकाना क्या होता है सर ? इसका मतलब क्या होता है ? यह क्या कोई नया कानूनी शब्द है ? आपकी सरकार में ऐसा करने का कोई नियम भी है क्या ? लटकाने का कोई प्रोविजन है क्या ? इस शब्द का मतलब हम जो समझते हैं, उसका लोकतंत्र में जगह ही नहीं है.

दैनिक भाष्कर में पहले पन्ने पर खबर है, तालाब में क्यों किया निर्माण. सब तोड़ो. कमाल है. पिछले छह माह से निर्माण चल रहा था, लोग विरोध कर रहें थे. सरकार चुप थी. अफसर चुप थे. अब मुख्यमंत्री कह रहे हैं कि सब तोड़ो. जो खर्च हो गये सो गया पानी में. अब तो तोड़ने में भी खर्चा लगेगा. कौन भरेगा. सरकार या ठेकेदार. आखिर करमटोली तालाब में सौंदर्यीकरण के नाम पर यह सब कौन करा रहा था ? क्या इंजीनियर -ठेकेदार अपने मन से यह काम करा रहे थे ? नहीं. किसी ने सलाह दी होगी. किसी ने डीपीआर बनाया होगा. जिसे इंजीनियरों ने पास किया होगा. विभाग के सचिव, मंत्री और संभव है कैबिनेट के समक्ष भी फाइल रखी गयी होगी. तब क्यों सब चुप रहे. क्या आपकी सरकार में इंजीनियर-अफसर कंफ्यूज हो गये हैं. उन्हें समझ नहीं आ रहा है कि क्या करना है. कैसे करना है.

अखबारों में एक खबर लाईन टैंक रोड स्थित बिरसा मुंडा स्मृति पार्क की भी है. कल भी कुछ छपी थी. चारदीवारी तोड़ दो. चारदीवारी पर ग्रील लगाओ. बाहर के लोग भी पार्क को देख सकें. कमाल है. यह सब पहले क्यों नहीं तय किया गया. जिस चारदीवारी के निर्माण पर करोड़ों खर्च हुए हैं, अब वह टूटेगा तो और खर्च बढ़ेगा. कौन देगा. कहां से देगा. प्रभात खबर में पेज दो पर खबर है कि हेमंत सोरेन की सरकार के वक्त वहां पार्क बनाने में सात करोड़ खर्च हुए थे. हमें भी याद है बच्चे पार्क में घूमने भी जाते थे. आपकी सरकार आयी और वहां नये सिरे से निर्माण शुरू कर दिया. पहले की सरकार के द्वारा खर्च किए गए सात करोड़ रुपये बर्बाद हो गए. वह सात करोड़ ना तो हेमंत सोरेन जी की थी ना ही आपकी. वह जनता की थी. सरकारी सिस्टम ने बर्बाद कर दिया. एक बार सोचियेगा जरूर या किसी अफसर से पूछ लीजियेगा. उस सात करोड़ से कितने गरीबों का मकान बन जाता.

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मुख्यमंत्री जी का एक और बयान सभी अखबारों में है. वह यह कि बिरसा स्मृति पार्क में संघाई रेस्टोरेंट बनाओ. रिवॉल्विंग रेस्टोरेंट. वह भी इतनी उंचाई पर, जहां बैठ कर लोग समोसा व आलू चाैप खाये और घुमते हुए पूरे शहर को देखें. ठीक है. आपने कहीं ऐसा देखा होगा. यह जरूरी थोड़े है कि हम भी वैसा ही बना लें. लोग भूले नहीं हैं. जब आप नगर विकास मंत्री थे, तब अफसरों के साथ संघाई देशों के दौड़े पर गये थे.

लौट कर आये, तो बोले थेः

रांची को संघाई-सिंगापुर बना देंगे. अब तक कुछ हुआ क्या. तब तो आप मंत्री थे, नहीं बना सके. अब तो मुख्यमंत्री हैं. साढ़े तीन साल से. रांची में कुछ बदला भी है क्या ? मुख्यमंत्री का गुस्सा और कंफ्यूज सिस्टम

हो सकता है संघाई-सिंगापुर वाली बात आपको याद ना हो. पर स्मार्ट सड़क तो याद होगा ही. हाल-हाल तक इसकी बात करते रहें हैं. प्रभात खबर में पेज दो पर एक खबर है. वह यह कि रांची शहर की सड़कों को स्मार्ट बनाने की योजना का काम रुक गया है. इसके लिए होने वाली जमीन अधिग्रहण पर आपके स्तर से रोक लगा दी गयी है. इसे क्या समझा जाये. रांची के लोगों को अब चौड़ी सड़क नहीं मिलेगी. स्मार्ट सड़क का सपना, सपना ही रह गया. इतने दिनों तक तो लोग आपकी बातों में आकर बेकार के ही सपने देख रहे थे.

एक खबर रिम्स के मल्टी स्टोरीज पार्किंग की भी है. 21 करोड़ की लागत से बने इस पार्किंग का उदघाटन एक साल पहले आपने ही किया था. अब तक इसका इस्तेमाल नहीं हो रहा. अब इसे क्या समझा जाये. क्या सरकार के अफसर-इंजीन‍ियर सिर्फ बिल्डिंग बनाने पर ध्यान देते हैं ? क्योंकि वहां बजट होता है, फंड होता है. इसलिए. उसके इस्तेमाल पर नहीं.

एक और खबर, जो बोकारो के लोगों के सपने को तोड़ रहा है. वह यह कि वर्ष 2016 के बजट में आपने बोकारो में जो मेडिकल कॉलेज खोलने की घोषणा की थी, वह अब तक नहीं बना है. काम रुक भी सकता है. क्योंकि अब उस पर वित्त आयोग फैसला लेगा. मतलब यह कि दो साल से फाइल घूम ही रही है. फिर बनेगा कब ?

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