
New Delhi: पंजाब के 17वें मुख्यमंत्री के तौर दलित नेता चरणजीत सिंह चन्नी आज शपथग्रहण करेंगे. बीती शाम साढ़े छह बजे चन्नी ने राज्यपाल से मुलाकात कर सरकार बनाने का दावा किया है. मुख्यमंत्री के साथ ही दो उपमुख्यमंत्री बनाये जाने की चर्चा भी है. हालांकि, इसकी पुष्टी नहीं हुई है. बताया जा रहा है मुख्यमंत्री की रेस में सबसे आगे चल रहे वरिष्ठ नेता सुनील जाखड़ ने उपमुख्यमंत्री का पद ठुकरा दिया है.
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चन्नी के मुख्यमंत्री चुने जाने के पहले करीब आधा दर्जन नामों पर चर्चा हुई थी. सबसे आगे सुनील जाखड़ थे, इनके नाम की घोषणा भी हो गई थी. तब किसी सिख को मुख्यमंत्री बनाने के साथ कुछ कांग्रेसियों ने जाखड़ का विरोध किया था. जिसके बाद सुखजिंदर सिंह रंधावा, अंबिका सोनी, नवजोत सिंह सिद्धू समेत कुछ अन्य के नाम इस पद के लिये चर्चा में आया था. कांग्रेस नेतृत्व ने चन्नी के नाम पर मुहर लगाते हुए अगले विस चुनाव पर निशाना साधा है. पंजाब में पहली बार दलित को मुख्यमंत्री बनाया जा रहा है. जाहिर है राज्य में करीब 32 फीसद आबादी दलित की है. इस आबादी को रिझाने के लिये चन्नी को आगे किया गया है.
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सिद्धू बोले-ऐतिहासिक…
पंजाब में अंत में सामने आए सियासी परिणा को सिद्धू ने ऐतिहासिक बताया है. पंजाब कांग्रेस के अध्यक्ष सिद्धू ने कहा-ऐतिहासिक, पंजाब का पहला दलित मुख्यमंत्री नामित करने का फैसला इतिहास में सुनहरे अक्षरों में लिखा जाएगा. यह संविधान और कांग्रेस की भावना का सम्मान है. मालूम हो कि कैप्टन अमरिंदर सिंह के खिलाफ बगावत करने वालों में नवजोत सिंह सिद्धू के साथ चन्नी भी आगे थे.
कैप्टन के खिलाफ की थी बगावत, पार्षद से की थी शुरुआत
कैप्टन सरकार में तकनीकी शिक्षा मंत्री रहे चन्नी उनके धुर राजनीतिक विरोधी रहे हैं. अगस्त में चन्नी के नेतृत्व में ही विधायकों ने अमरिंदर के खिलाफ बगावत की थी. तब उन्होंने साफ कहा था, हमें कैप्टन पर भरोसा नहीं है. रविदासिया समुदाय के चन्नी दलित-सिख हैं. राहुल के नजदीकी हैं. बतौर पार्षद राजनीतिक कॅरिअर की शुरुआत की. दो बार खरड़ नगरपालिका के प्रधान रहे. चमकौर साहिब विधानसभा क्षेत्र से तीसरी बार विधायक चुने गये हैं. हालांकि, कुछ दिनों के लिये अकाली दल में भी रहे थे. पहली बार चमकौर साहिब से निर्दलीय विधायक चुनकर विधानसभा पहुंचे थे. हालांकि, तब इन्होंने कांग्रेस पार्टी से टिकट की मांग की थी, लेकिन टिकट नहीं मिला था. जिसके निर्दलीय चुनाव मैदान में उतरे थे. फिर अकाली दल में शामिल हुए थे. लेकिन अकाली दल में उनकी नहीं बनी और फिर से कांग्रेस का दामन थाम लिया.




