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हेमंत की शिकायतों पर केंद्र गंभीर- नीति आयोग, कोयला, ऊर्जा और जल शक्ति मंत्रालय से होगी वार्ता, 7 अक्टूबर तक मांगा प्रपोजल

Akshay Kumar Jha

Ranchi: डीवीसी-झारखंड विवाद, कोयले की रॉयल्टी, झारखंड स्थित केंद्रीय कंपनियों पर राज्य सरकार का बकाया सहित अन्य विषयों पर झारखंड और केंद्र सरकार के आपसी ग्रिवांस को सुलझाने के लिए जल्द ही उच्च स्तरीय त्रिपक्षीय बैठक आयोजित होगी. नीति आयोग ने यह पहल की है. विगत 15 सितंबर को नीति आयोग की टीम जब झारखंड आयी थी, तब राज्य की हेमंत सोरेन सरकार ने इन विषयों पर अपना पक्ष रखा था.

हेमंत सोरेन ने झारखंड को केंद्र से वाजिब हक दिलाने की गुहार लगायी थी. अब नीति आयोग ने राज्य सरकार को सात अक्टूबर तक इन विषयों पर प्रपोजल तैयार कर भेजने को कहा है.

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राज्य सरकार की तरफ से भेजे जानेवाले प्रपोजल के आधार पर नीति आयोग की मध्यस्थता में केंद्र के कोयला मंत्रालय, ऊर्जा मंत्रालय, जल शक्ति मंत्रालय के साथ राज्य सरकार की बैठक होगी.

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झारखंड-केंद्र के रिश्तों में तल्खी की वजहें क्या हैं

पिछले डेढ़-दो वर्षों के दौरान झारखंड और केंद्र सरकार के रिश्ते तल्ख रहे हैं. केंद्र सरकार के आदेश पर आरबीआइ झारखंड पर डीवीसी के बकाया के एवज में राज्य सरकार के खाते से बार-बार राशि काट रहा है. डीवीसी को लेकर केंद्र, राज्य सरकार और आरबीआइ के बीच जो त्रिपक्षीय करार है, उसमें उल्लिखित शर्तों की वजह से आरबीआइ के पास राशि कटौती का अधिकार है.

राज्य सरकार चाहकर भी इस करार से अलग नहीं हो सकती, लेकिन केंद्र की इस कार्रवाई पर उसका सख्त एतराज है. सूबे के मुखिया हेमंत सोरेन ने झारखंड के खाते से राशि काटे जाने पर कई बार विरोध दर्ज कराया, लेकिन केंद्र पर इसका कोई असर नहीं पड़ा.

उन्होंने पीएम नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर राज्य में कोयला खनन के एवज में बकाया रॉयल्टी देने का आग्रह किया था, लेकिन कुछ नहीं हुआ. अब नीति आयोग की मध्यस्थता में होनेवाली बैठक में इन मुद्दों पर गतिरोध दूर करने की कोशिश होगी.

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ऊर्जा विभाग के साथ क्या है राज्य सरकार की परेशानी

राज्य सरकार डीवीसी को लेकर ऊर्जा विभाग के साथ अपनी बात रखना चाहती है. राज्य सरकार का कहना है कि डीवीसी के मुताबिक राज्य सरकार पर कुल 5608 करोड़ का बकाया है.

जबकि जेबीवीएनएल का कहना है कि बकाया 3919 करोड़ का है. अभी तक त्रिपक्षीय करार की वजह से तीन बार आरबीआइ से बिना राज्य सरकार की मर्जी के 2845.50 करोड़ रुपए काटे जा चुके हैं.

वहीं सितंबर और दिसंबर में भी 112.845 करोड़ की दो किस्त कटनी है. (सितंबर की किस्त अब तक नहीं कटी है). राज्य सरकार इस समस्या का हल चाहती है.

वहीं राज्य सरकार का कहना है कि केंद्र सरकार के विभाग और आनुषंगिक इकाइयों के पास राज्य सरकार का बिजली बकाया 1386.76 करोड़ का है, जिसका भुगतान केंद्र सरकार नहीं कर रही है.

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कोल मंत्रालय के साथ क्या है राज्य सरकार की परेशानी

राज्य सरकार का कहना है कि केंद्र सरकार की कोल कंपनियों सीसीएल, बीसीसीएल और ईसीएल ने मिल कर करीब 53,064 एकड़ जमीन का अधिग्रहण किया. अधिग्रहण करने के एवज में मिलने वाली राशि का करीब 8000 करोड़ का बकाया काफी दिनों से इन कोल कंपनियों के पास है, जिसका भुगतान नहीं किया जाता.

इन कोल कंपनियों को कोयला खनन के एवज में टैक्स के अलावा राज्य सरकार को कोयले की कीमत का 14 फीसदी भुगतान करना होता है, जो कि नहीं होता और साथ में कोल कपनियां यह भी नहीं बतातीं कि वो कोयला किस दर पर बेच रही हैं ताकि राज्य सरकार 14 फीसदी की दर से इन कोल कंपनियों से भुगतान करने को कह सके. साथ ही 2014 के बाद से ही कोल कंपनियों की तरफ से कोयले की कीमतों में बढ़ाया नहीं गया है.

सीसीएल और बीसीसीएल ने वाश्ड कोल खनन के एवज में मिलने वाली रॉयल्टी का भुगतान भी नहीं किया है, जो कि बढ़ कर 2200 करोड़ हो चुका है.

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शक्ति मंत्रालय के साथ क्या है राज्य सरकार की परेशानी

राज्य सरकार का कहना है कि स्वर्णरेखा मल्टीपरपस प्रोजेक्ट के तहत सिंचाई व्यवस्था दुरुस्त करने के लिए केंद्र सरकार को 4263.68 करोड़ रुपये राज्य को देने थे. 2011-12 से लेकर 2019-20 तक 1889.61 करोड़ रुपये केंद्र सरकार की तरफ से दिये गये हैं. खर्च का सारा ब्योरा मंत्रालय को दिया जा चुका है.

बावजूद इसके मंत्रालय की तरफ से बाकी राशि का भुगतान नहीं किया जा रहा है. 200 करोड़ रुपये की राशि का भुगतान करने के लिए हेमंत सोरेन की तरफ से मंत्रालय को पत्र भी लिखा गया. लेकिन भुगतान नहीं किया गया. पलामू और मेदनीनगर में भी सिंचाई व्यव्सथा को दुरुस्त करने के लिए राज्य सरकार बार-बार केंद्र को लिख रहा है.

नमामी गंगे परियोजना के तहत दामोदर नदी में भी गंगा की तरफ सफाई अभियान चलाने की डिमांड है. इसे लेकर हेमंत सोरने की तरफ से मंत्रालय को चिट्ठी भी लिखी गयी. निती आयोग को 2015 में ही धनबाद, फुसरो और रामगढ़ में सफाई अभियान चलाने के लिए 1478 करोड़ का प्रपोजल भेजा गया.

2016 में मंत्रालय ने राज्य सरकार के इस मांग को मान भी लिया, लेकिन अभी तक मंत्रालय की तरफ से कोई राशि राज्य सरकार को नहीं दी गयी है. जबकि राज्य सरकार ने डीपीआर तक मंत्रालय में जमा करा दिया है.

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