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हटाये जायेंगे सीबीआइ प्रमुख, मिल सकती है राकेश अस्थाना को नई जिम्मेदारी !

सीबीआइ की आंतरिक निगरानी जांच रिपोर्ट के आधार पर होगी कार्रवाई

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deepak

Ranchi : सेंट्रल ब्यूरो ऑफ इनवेस्टिगेशन (सीबीआइ) के दो वरिष्ठ अधिकारियों की लड़ाई जल्द ही खत्म हो सकती है. सत्ता के गलियारे में यह बातें चल रही हैं कि सीबीआइ प्रमुख को जल्द ही निदेशक के पद से हटाया जायेगा. इनकी जगह विशेष निदेशक राकेश अस्थाना को नयी जवाबदेही दी जा सकती है. सीबीआइ की आंतरिक निगरानी समिति (विजिलेंस) की रिपोर्ट आने के बाद यह कार्रवाई की जायेगी. इसका पूरा खाका तैयार कर लिया गया है.

सीबीआइ प्रमुख आलोक वर्मा पर कांग्रेस समर्थक होने की बातें हवा में चल रही है. इसका खुलासा अस्थाना ने केंद्रीय कैबिनेट सचिव को लिखे शिकायती पत्र में भी किया है. प्रधानमंत्री कार्यालय और अन्य जगहों पर यह बातें की जा रही हैं कि केंद्र की मोदी सरकार को गिराने के लिए यह सब कुछ किया गया है और आनन फानन में सीबीआइ प्रमुख ने अपने ही विभाग के अधिकारी के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कराने की अनुमति 15 अक्तूबर को दी. सीबीआइ में आंतरिक कलह और दो शीर्ष अधिकारियों के बीच आरोप प्रत्यारोप को लेकर सनसनीखेज खुलासा हुआ है.

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सत्ता के गलियारों में आलोक वर्मा के कांग्रेस समर्थक होने की चर्चा

सत्ता के गलियारों में यह बातें चल रही हैं कि आलोक वर्मा की तरफ से पीएमओ पर ही छापा मारने की कार्रवाई करने की तैयारी की जा रही थी. दरअसल वे पीएमओ (भास्कर खुलबे और पीके मिश्रा) से टकराने का मन बना चुके थे. जिस प्रकार दिल्ली के मुख्यमंत्री कार्यालय (राजेंद्र कुमार) पर रेड डाला गया था. उनकी योजना पीएमओ में रेड डालने की थी. खुलासे के मुताबिक एक खास राजनीतिक दल के इशारे पर आलोक वर्मा 2019 में होने वाले लोकसभा चुनाव से पहले मोदी सरकार को संकट में फंसाने की साजिश कर रहे थे. खबर है कि आलोक वर्मा प्रधानमंत्री कार्यालय पर सीबीआइ का छापा मारकर पीएम नरेंद्र मोदी को बदनाम करने की साजिश में जुटे थे ! सीबीआइ प्रमुख पर राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल के बेटे शौर्य डोभाल का फोन टैप करवाने की कड़ी इस योजना का हिस्सा थी.

इसकी वजह से ही कांग्रेस तथा अन्य दलों के बड़े नेताओं पर चल रहे भ्रष्टाचार के केस को जानबूझ कर लटकाया जा रहा था. राजनीतिक गलियारों में यह कहा जा रहा है कि आलोक वर्मा को पूर्व केंद्रीय मंत्री पी चिदंबरम का साथ मिला हुआ है. जबकि राकेश अस्थाना का नाम कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अहमद पटेल के साथ जोड़ा जा रहा है. यूपीए-2 में प्रणब मुखर्जी की जासूसी कराने में पहले ही उनका नाम सामने आ चुका है. उनका पूरा गिरोह है, जिसमें वकीलों से लेकर पुलिस व सीबीआइ अधिकारी, सरकारी अमले में बैठे बड़े आला अफसर से लेकर न्यायपालिका में बैठे कई जज तक शामिल बताये जा रहे हैं.

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अजीत डोभाल के आने से साजिश नाकाम !

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि प्रधानमंत्री ने आलोक वर्मा और राकेश अस्थाना, दोनों पर एक साथ सर्जिकल स्ट्राइक कर विपक्ष के प्रहार को कम किया है. श्री वर्मा पर सीबीआइ की गोपनीय फाइलें विपक्ष के धाकड़ नेताओं तक पहुंचाने का भी आरोप लग रहा है. ये बातें भी सामने आयी है कि सीबीआइ द्वारा कांग्रेसियों के केसों की फाइलों में मौजूद गोपनीय जानकारियां कोर्ट से पहले एक बड़े मंत्री की मेज पर पहुंचा दी जाती थी.

यहां तक कि राहुल गांधी तक को सीबीआइ की आंतरिक जानकारियां पहुंचाई जाती थीं, यही कारण है कि आलोक वर्मा के सहयोग से राफेल सौदी की सारी बातें कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को पहले से ही पता थीं. राहुल गांधी खुद ही ट्वीट करके फंस गए. राहुल ने ट्वीट करके कहा कि, ”सीबीआइ चीफ आलोक वर्मा राफेल घोटाले के कागजात इकट्ठा कर रहे थे. उन्हें जबरदस्ती छुट्टी पर भेज दिया गया. प्रधानमंत्री का मैसेज एकदम साफ है जो भी राफेल के ईद गिर्द आएगा- हटा दिया जाएगा, मिटा दिया जाएगा”. जिससे तुरंत राहुल पकड़े गए कि एक वरिष्ठ सीबीआइ अधिकारी क्या काम कर रहा था, इसकी जानकारी उन तक कैसे पहुंच गयी?

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दागदार रहे हैं आलोक वर्मा

आलोक वर्मा पर अगस्ता वेस्टलैंड मामले में अभी तक चार्जशीट न दाखिल करने का आरोप लग चुका है. दुबई में गिरफ्तार मुख्य आरोपी मिशेल के प्रत्यर्पण के मामले को लटकाना भी इसमें शामिल है. सीबीआइ और ईडी के संयुक्त प्रयास की वजह से दुबई की अदालत ने उसके प्रत्यर्पण की भी मंजूरी दे दी थी. लेकिन अंत में उसका प्रत्यर्पण नहीं हो पाया. जबकि मिशेल ने भारतीय अधिकारियों के सामने स्पष्ट रूप से सोनिया गांधी का नाम लिया था.

लेकिन अंत में उसका प्रत्यर्पण नहीं हो पाया. आरोप है कि कांग्रेस के दबाव के कारण ही आलोक वर्मा ने उनका प्रत्यर्पण नहीं होने दिया. पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम के खिलाफ एयरसेल-मैक्सिस घोटाला मामले में चार्जशीट न दाखिल करने की बात हो या उनके बेटे कार्ति चिदंबरम को आइएनएक्स मीडिया के मनी लॉन्ड्रिंग मामले में कार्रवाई को सुस्त करने में भी इन्हीं का हाथ रहा है. जबकि ईडी और सीबीआइ जांच के बाद यह करीब-करीब साबित हो चुका है एयरसेल मैक्सिस कंपनी को अवैध तरीके 3,500 करोड़ रुपये के लिए एफआइपीबी की मंजूरी दी थी, जबकि यह काम आर्थिक मामले की कैबिनेट कमेटी का है.

लेकिन चिदंबरम ने उसकी सहमति के बगैर ही मंजूरी दे दी थी. इसके बाद भी अभी तक सीबीआइ चार्जशीट दाखिल नहीं कर पाई है.

लालू प्रसाद यादव के आइआरसीटीसी (रेलवे होटल) घोटाला मामले में विशेष निदेशक राकेश अस्थाना को जांच करने से रोकना हो या फिर बीकानेर जमीन घोटाले में राबर्ट वाड्रा की जांच रोकने का मामला हो. इन सारे मामलों में आलोक वर्मा पर सोनिया गांधी से लेकर उनके संबंधियों या उनके नजदीकी सहयोगियों को बचाने का आरोप है.

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