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लेबर कोर्ट पहुंचा इंडिकोन-वेस्टफालिया की बिक्री का मामला

Ranchi : राजधानी के टाटीसिलवे स्थित इंडिकोन वेस्टफालिया के बेचे जाने का मामला अब श्रम न्यायालय में पहुंच गया है. यहां कार्यरत अनिल यादव नाम के कर्मचारी ने कंपनी के बेचे जाने के बाद दिये जा रहे मुआवजे के विरोध में न्यायालय की शरण ली है. अपने आवेदन में उन्होंने कहा कि वे लंबे समय से कंपनी में कार्य कर रहे थे. घाटे में नहीं होने के बावजूद प्रबंधन ने कंपनी को बेच दिया. उन्होंने अपने आवेदन में कंपनी के उस दावे को गलत करार दिया है, जिसमें कंपनी ने कहा है कि झारखंड सरकार की नीति के आधार पर कर्मचारियों को मुआवजा देने की घोषणा की गयी थी. रीट्रेंचमेंट नीति के अनुरूप कई कर्मियों को भुगतान किया गया. इनमें से दो स्थायी और एक अस्थायी कर्मचारी ने अब तक कंपनी से भुगतान की राशि नहीं ली है.

डिविजन में कोई घाटा नहीं हो रहा था

आवेदक श्री यादव ने श्रम न्यायालय से मांग की है कि कंपनी को उनकी सैलरी का 10 गुना मुआवजा देने का आदेश दे. इधर कंपनी के अन्य मजदूरों का कहना है कि कंपनी का कंटेनेर डिविजन सलाना एक करोड़ से कुछ अधिक के घाटे पर था. लेकिन माइनिंग डिविजन में किसी तरह का कोई घाटा नहीं हो रहा था. प्रबंधन ने जानबूझ कर माइनिंग डिविजन को मिले 25 करोड़ का कार्यादेश नहीं लिया और घाटा दिखाया. 24 मई 2018 को विधायक राम कुमार पाहन, 20 सूत्री उपाध्यक्ष जैलेंद्र कुमार ने इंडिकोन के कर्मचारियों के समर्थन में धरना-कार्यक्रम में हिस्सा भी लिया था. कंपनी के कर्मचारी फैक्टरी के गेट के समक्ष तालाबंदी कर धरना दे रहे थे.

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अनिल यादव ने श्रम न्यायालय में जो आवेदन दिया है, उसमें आरोप लगाया है कि कंपनी के बिजनेस हेड संदीप चौधरी और इलिका इस्टेट्स के पार्टनर आकाश आडुकिया ने मिलकर ठीक-ठाक चल रही (वर्किंग) कंपनी को बेचे जाने की योजना बनायी. इसके लिए दो वर्षों से साजिश की जा रही थी. आरोप लगाया है कि कंपनी के वित्तीय प्रमुख मनोज जैन ने इसके लिए इंडिकोन को घाटे में दिखाने का गलत बैलेंस शीट तैयार करवाया.

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इलिका इस्टेट्स भी है घाटे में

सूत्रों का कहना है कि संतोष जैन की कंपनी इलिका इस्टेट्स प्राइवेट लिमिटेड भी घाटे में चल रही है. 10 वर्ष पुरानी कंपनी को रियल इस्टेट का कोई अनुभव नहीं है. बताया जाता है कि इंडिकोन वेस्टफालिया कंपनी को खरीदने के पहले इलिका इस्टेट्स के संचालकों को उनके नजदीकियों ने मना भी किया था. पर नामकुम में चल रहे प्रोजेक्ट की वजह से इंडिकोन की जमीन ली गयी. इलिका इस्टेट्स का पहला प्रोजेक्ट नामकुम में चल रहा है. जिसका नक्शा विवादित है. आरआरडीए न्यायाधीकरण में मामला लंबित है. इतना ही नहीं इलिका इस्टेट्स मुख्यत: जमीन की खरीद-बिक्री से संबंधित कार्य ही अब तक करती रही है. डील फाइनल होने पर उसे राजधानी के प्रमुख रीयल इस्टेट डेवलपर कंपनी के साथ डेवलपर एग्रीमेंट कर जमीन दे दिया जाता है. इतना ही नहीं इलिका इस्टेट्स की तरफ से प्रोजेक्ट फायनांस भी किया जाता है. ताकि प्रोजेक्ट को शुरू करने में किसी तरह की दिक्कत ना हो.

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