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बीजेपी सांसदों की सबसे बड़ी मुश्किल, लोकसभा चुनाव से पहले आखिर कैसे शांत हो कार्यकर्ताओं का गुस्सा

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Akshay Kumar Jha

Ranchi: कार्यकर्ताओं को दरकिनार कर, नाराज कर चुनाव जीतने का उदाहरण आज तक नहीं दिखा. 2018 छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनाव को इस बात का जीता जागता सबूत माना जा रहा है. बीजेपी के सर्वे में यह बात सामने आयी थी कि जीत पार्टी की होगी. लेकिन कार्यकर्ताओं की नाराजगी की वजह से बीजेपी 34 सीट गवां कर मात्र 15 सीट ही हासिल कर सकी. कांग्रेस को इस बात का खूब फायदा हुआ. पिछले चुनाव के मुकाबले 29 से ज्यादा सीटों पर जीत दर्ज करते हुए कांग्रेस ने 68 सीटों पर जीत कर अपनी सरकार बनायी. राजनीति की परख रखनेवालों की मानें तो छत्तीसगढ़ की स्थिति कमोबेश झारखंड की ही तरह थी. हार की वजह सीधे तौर पर कार्यकर्ताओं का गुस्सा था. आम चुनाव आने से पहले झारखंड के सांसदों को यही डर सता रहा है. वो किसी भी हाल में कार्यकर्ताओं का गुस्सा शांत करने और उनमें उत्साह भरने की जुगत में हैं. इसके लिए सांसद दिल्ली में पार्टी आलाकमान से मिलकर वो मंत्र तलाशने की कोशिश कर रहे हैं, जिससे कार्यकर्ताओं में उत्साह 2014 की ही तरह जगे.

सरकार से बेवजह गुस्सा नहीं हैं कार्यकर्ता

बीजेपी के कार्यकर्ता भले ही ऑन रिकॉर्ड मीडिया के सामने आकर यह नहीं कहें कि वो सरकार से गुस्सा हैं. लेकिन ऑफ रिकॉर्ड वो नाराजगी की वजहों की झरी लगाते हैं.  उनका गुस्सा बेवजह नहीं है. 2014 में जब झारखंड में रघुवर सरकार बनी तो, कार्यकर्ता उत्साहित थे. लेकिन कुछ ही दिनों में कार्यकर्ता सत्ता शीर्ष के व्यक्तिगत व्यवहार से नाराज हो गए. कार्यकर्ताओं को किसी भी सरकारी कार्यक्रम में वो तरजीह नहीं दी जाने लगी, जिसकी उन्होंने उम्मीद पाल रखी थी. साथ ही साथ सरकार के स्तर पर कार्यकर्ताओं का काम रुकने लगा. जनता में यह संदेश जाने लगा कि फलां बीजेपी नेता (कार्यकर्ता) का दावा हर बार फर्जी साबित होता है. दूसरी तरफ देखा जाने लगा कि संगठन में सरकार का सीधा हस्तक्षेप है. जमीनी तौर से बीजेपी से जुड़े कार्यकर्ताओं को किनारा किया जाने लगा. एक ऐसी टीम बनायी गयी जिसमें कार्यकर्ताओं को जगह नहीं दी गयी. देखा जाने लगा कि पार्टी वन वे हो गयी. इन सब वजहों से कार्यकर्ता निराश हुए. अब इन निराश कार्यकर्ताओं के दम पर चुनाव लड़ा नहीं जा सकता. ऐसे में सांसद मंथन कर रहे हैं कि आखिर रास्ता क्या है.

सत्र तो बहाना है, सांसदों को तो अपना एजेंडा पार्टी तक पहुंचाना है

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संसद का शीत कालीन सत्र राफेल के मद्देनजर काफी हंगामेदार रहा. झारखंड के लिए भी यह सत्र काफी अहम माना जा रहा है. झारखंड के 12 सांसद फिलवक्त दिल्ली में हैं. सभी एक ही एजेंडे पर मंथन कर रहे हैं. पहला कि दोबारा उन्हें टिकट कैसे मिले और दूसरा टिकट मिल जाने के बाद उन्हें जीत कैसे दोबारा नसीब हो. लेकिन यह काम बिना कार्यकर्ताओं के मनोबल को हासिल किए नहीं किया जा सकता है. ऐसे में दिल्ली में पार्टी अध्यक्ष लक्ष्मण गिलुआ से लेकर दूसरे सभी सांसद झारखंड की स्थिति आला पदाधिकारियों के पास रखने का काम कर रहे हैं. उस मंत्र को तलाशने की कोशिश हो रही है, कि कैसे कार्यकर्ताओं को खुश किया जा सके. मंत्र तलाशने के लिए हो रहे हवन से निकला धुआं कई तरह की बातों और चर्चाओं का बाजार गर्म कर रहा है. चुनाव नजदीक आ रहा है, ऐसे में एक बड़े उल्टफेर की बात से इंकार भी नहीं किया जा रहा. पिछले दिनों हिंदी दैनिक “प्रभात खबर” में एक खबर छपी थी, जिसमें सांसदों ने सरकार से अपनी बेरुखी का इजहार भी किया था.

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