
Kumar Gaurav
Ranchi: झामुमो की सरकार का खाका लगभग तैयार है. हेमंत सोरेन रविवार 29 दिसंबर को अपने मंत्रिमंडल के सहयोगियों के साथ मोरहाबादी मैदान में शपथ लेंगे. हेमंत सोरेन की सरकार शपथ ग्रहण के बाद पूरी तरह से एक्शन में आ जाएगी.
हेमंत सोरेन की पार्टी और उनके गठबंधन के सहयोगी कांग्रेस, राजद और बिना शर्त समर्थन दे चुकी पार्टी झारखंड विकास मोर्चा ने चुनाव में जाने से पहले जिन मुद्दों के तहत रघुवर दास की सरकार को घेरा था, उन मुद्दों ने भी गठबंधन को चुनाव में प्रचंड बहुमत दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है.
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वादों को पूरा करने में फिलहाल हेमंत सोरेन की इस सरकार को कई बड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा. यह जानना जरुरी है कि किन उलझे मुद्दों को सुलझाने में काफी मशक्कत झेलनी पड़ेगी.
इनमें राज्य के खाली खजाने को भरना, समान काम के बदले समान वेतन की मांग को पूरा करना साथ ही अनुबंधकर्मियों को स्थायी करने का मसला सुलझाना आसान नहीं होगा.
राज्य के खाली खजाने को भरना
हेमंत सरकार के लिए आनेवाले समय में जो सबसे बड़ी चुनौती होगी वो है राज्य का खाली खजाना. राजस्व की भारी कमी को झेल रहे झारखंड राज्य में ट्रेजरी की स्थिति चौंकाने वाली है.
वेतन देने तक के पैसे नहीं हैं. झारखंड ने केंद्र सरकार से 1800 करोड़ का लोन लेकर ट्रेजरी में 1925 करोड़ रुपये जुटाए हैं, ऐसे में राज्य में राजस्व के हालात सुधरना हेमंत सरकार के लिए आसान नहीं होगा.
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राज्य का खजाना खाली होने के पीछे अनुमान के अनुरूप राजस्व की प्राप्ति नहीं होना बड़ा कारण माना जा रहा है. महिलाओें को एक रुपए के टोकन मनी पर जमीन रजिस्ट्री का लाभ देने से, जमीन रजिस्ट्री के तौर पर आनेवाले राजस्व में कमी आयी.
इसके अलावे शराब बिक्री में सरकार के शामिल होने और व्यवस्था में बदलाव करने से भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ा. साथ ही केंद्र से जीएसटी का पैसा नहीं आने से भी सरकारी खजाना खाली पड़ा है.
पारा शिक्षकों की मांगों को पूरा करना
हेमंत सोरेन ने विपक्ष में रहते हुए सरकार को पारा शिक्षकों के आंदोलन को लेकर बहुत घेरा था. 67 हजार की संख्या में पारा शिक्षक अपने विभिन्न मांगों को लेकर लगातार आंदोलनरत रहे. इन सभी पारा शिक्षकों को स्थायीकरण का भरोसा दिलाया गया था.
इन सभी पारा शिक्षकों की न्यूनतम मांग वेतनमान के साथ स्थायीकरण है. सरकार के सिस्टम के अनुसार, देखा जाये तो इतनी बड़ी संख्या में लोगों को एकसाथ स्थायी करना इस सरकार के लिए टेढ़ी खीर साबित होगी.
आंगनबाड़ी सेविका-सहायिका की मांगों को पूरा करना
रघुवर दास की सरकार को आंगनबाड़ी सेविका-सहायिका की मांग को पूरा नहीं करने और इनकी सरकार की खिलाफ गोलबंदी का बड़ा खामियाजा भुगतना पड़ा है. ज्ञात हो कि आंगनबाड़ी सेविका सहायिका की मांग न्यूनतम 12 हजार मानदेय है, साथ ही ये मेडिकल जैसी सुविधाओं की मांग भी कर रही हैं.
आंगनबाड़ी सेविका सहायिकाओं की संख्या भी लगभग 80 हजार के आसपास है. फिलहाल आंगनबाड़ी सेविकाओं को सरकार अधिकतम 62 हजार देती है. इनकी मांगों को मानने का मतलब 80 हजार आंगनबाड़ी सेविकाओं के मानदेय को दोगुना करना पड़ेगा.
राज्य सरकार के कोष की स्थिति को देखते हुए यह कर पाना हेमंत सोरेन की सरकार के लिए बड़ी चुनौती होगी.
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बंद पड़े स्कूलों को खुलवाना
रघुवर दास की सरकार में सबसे विवादास्पद फैसलों में से एक विद्यालय विलय के कारण बंद हुए स्कूलों को खुलवाने की बात हेमंत सोरेन लगातार करते रहे हैं. हेमंत सोरेन की पार्टी झामुमो ने बंद हुए स्कूलों को खुलवाने की बात अपने घोषणापत्र में भी शामिल की है.
विद्यालय विलय के मामले को लेकर विपक्ष की सभी पार्टियों ने रघुवर दास सरकार को बहुत घेरा था. राज्य में करीब 6200 स्कूल विद्यालय विलय के कारण बंद हो चुके हैं. इन्हें फिर से चालू करा पाना हेमंत सोरेने के सरकार के लिए सरल नहीं होगा.
राज्य के करीब 10 लाख बेरोजगारों को बेरोजगारी भत्ता
हेमंत सोरेन बेरोजगारी के मुद्दों को लेकर भी रघुवर सरकार के विरुद्ध चुनावी मैदान में गये थे. उन्होंने बेरोजगारी को भुनाने क लिए बेरोजगारों को बेरोजगारी भत्ता देने तक की बात की है.
राज्य में करीब 10 लाख से अधिक रजिस्टर्ड बेरोजगार हैं. और इन्हें कम से कम 5000 देने की बात कही गयी है. अपने इस वादे को भी पूरा करने में सरकार को बड़ी समस्या का सामना करना पड़ेगा.
जेपीएससी छठी सिविल सेवा परीक्षा पर निर्णय
रघुवर दास की सरकार में जेपीएससी सिविल सेवा परीक्षा को नहीं करा पाना बड़ी नाकामयाबियों में से एक रही. इसको लेकर युवाओं में बड़ी नाराजगी देखने को भी मिली. जेपीएससी सिविल सेवा परीक्षा को लेकर भी हेमंत सोरेन सरकार को बहुत घेर चुके थे.
उन्होंने कहा था कि जेपीएससी भ्रष्टाचार में लिप्त है. इस परीक्षा को कैंसिल करने की भी बात कही थी. यह देखना मजेदार होगा कि वे छठी सिविल सेवा परीक्षा का क्या करते हैं.
इसके अलावा हेमंत सोरेन ने कहा कि उनकी सरकार प्रति वर्ष सिविल सेवा परीक्षा का आयोजन करेगी. ऐसा कर पाना भी सरकार के लिए बड़ी चुनौती होगी.
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