
New delhi : चीन के साथ लद्दाख में चल रही तनातनी के बीच भारतीय सेना लगातार अपनी तैयारियों को मजबूत कर रही है. इसके तहत सेना अपने एक तीन साल पुरानी योजना को अमलीजामा पहनाने जा रही है. योजना के मुताबिक अब लद्दाख के बर्फीले पहाड़ी क्षेत्रों पर भारतीय सैनिक ऊंट पर गश्त लगाते नजर आयेंगे. ये ऊंट रेगिस्तानी क्षेत्रों से नहीं होंगे बल्कि ये दो-कूबड़ वाले बैक्ट्रियन प्रजाति के ऊंट होंगे. ये ऊंट इन पहाड़ी क्षेत्रों में ही पाए जाते हैं. इनसे सैनिकों को गश्त करने में काफी आसानी होगी.
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इन ऊंटों से ही होता था सिल्क रूट का व्यापार
गौरतलब है कि एक जमाने में बैक्ट्रियन कैमल पर ही पर सिल्क रूट का पूरा व्यापार होता था. पहाड़ी और बर्फीले क्षेत्रों से अनुकूलता की वजह से ही सेना ने इनके इस्तेमाल का निर्णय लिया. जानकारी के अनुसार इन बैक्ट्रियन कैमल को देप्सांग और दौलत बेग ओल्डी (डीबीओ) में तैनात किया जा सकता है. यह क्षेत्र लगभग 17 हजार फीट की ऊंचाई पर है. यहां पर पैदल गश्त करना इतना आसान नहीं है. यह वही इलाका है जहां पिछले 4 महीने से भारत और चीन के बीच तनाव बना हुआ है.
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लद्दाख के हालात के अनुकूल
बैक्ट्रियन कैमल लद्दाख के मुश्किल हालात के अनुकूल है. यह जानवर नुब्रा घाटी और लद्दाख के पर्यावरण में आसानी ढल जाते हैं. इनसे न सिर्फ गश्त किया जा सकेगा बल्कि जरूरत पड़ने पर ये ऊंट सेना के लिए ट्रांसपोर्टर के तौर पर काम आ सकेंगे. ऐसे दुर्गम क्षेत्र जहां वाहनों की आवाजाही नहीं हो पाती है वहां भी ये आसानी से पहुंच सकते हैं. इन ऊंटों की काबिलियत के बारे में लेह स्थित डिफेंस इंस्टीट्यूट ने पूरा अध्ययन किया है. इसके बाद इन ऊंटों को विशेष तरह की ट्रेनिंग दी जा रही है. लेह में इनकी ब्रीडिंग चल रही है ताकि सेना को जरूरत के हिसाब से ऐसे ऊंटों की सप्लाई की जा सके. सूत्रों के मुताबिक, फिलहाल सेना के 50 बैक्ट्रियन कैमल की जरूरत है. हालांकि परेशानी यह है कि लद्दाख में बैक्ट्रियन कैमल की संख्या काफी कम है. इनकी पूरी आबादी हगभग 400 तक है. इसे देखते हुए सेना इनकी ब्रीडिंग पर खास ध्यान रख रही है, ताकि जरूरत के हिसाब से इनकी तादाद बढ़ाई जा सके.
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