
Jamshedpur : आदिवासी सेंगेल अभियान ने झारखंड हाईकोर्ट के उरांव जनजाति की महिलाओं को पैतृक संपत्ति में अधिकार संबंधी फैसले का स्वागत किया है. अभियान के राष्ट्रीय अध्यक्ष सालखन मुर्मू ने कहा कि यह संविधानसम्मत होने के साथ-साथ स्त्री -पुरुष के बीच भेदभाव को समाप्त करता है. इससे आदिवासी समाज के अन्य सभी जनजातियों यथा संताल, मुंडा, हो, भूमिज आदि के बीच भी इसको लागू करने का रास्ता साफ होता है. परंतु कतिपय आदिवासी संगठन प्रथा, परंपरा या कस्टम आदि के नाम पर संविधान- कानून विरोधी कुछ एक प्राचीन क्रियाकलापों को जीवित रखने की वकालत कर समाज को अन्याय, अत्याचार, शोषण के दलदल में धकेलने का प्रयास करते हैं जो गलत है.
सालखन ने कहा कि कस्टम या परंपरा के नाम पर आदिवासी समाज में नशापान, अंधविश्वास, डायन प्रथा, अंधभक्ति, राजनीतिक कुपोषण, आदिवासी महिला विरोधी मानसिकता, ईर्ष्या- द्वेष आदि चालू है. इसको समाप्त करने के अभियान में सेंगेल प्रयासरत है. इसकी जड़ में अधिकांश आदिवासी स्वशासन व्यवस्था द्वारा कस्टम के नाम पर चालू अनेक प्रथाएं हैं. वस्तुतः स्वशासन स्वशोषण बन गया है बन गया है इसमें त्वरित सुधार के लिए सेंगेल ने भारत के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री आदि को पत्र भेजा है जिसका संज्ञान लिया जा रहा है. झारखंड के अलावे बंगाल, बिहार, ओडिशा और असम राज्यों में रह रहे झारखंडी आदिवासी समाज में संविधानसम्मत सुधार के लिए सेंगेल की तरफ से एक पुस्तक का विमोचन 30 अप्रैल को रांची में आयोजित संताली राजभाषा रैली के दौरान किया जाएगा जो समाज- सुधार के क्षेत्र में मील का पत्थर साबित हो सकता है.




