
Faisal Anurag
कोटा से छात्रों को झारखंड लाने के सवाल पर भाजपा नेताओं के बयान का स्वर समस्या के निदान पर कम और राज्य सरकार को कठघरे में खड़ा करने वाले ज्यादा हैं. कोरोना वायरस जैसी महामारी के वक्त राजनीतिक एजेंडे को लेकर भाजपा नेताओ का समूह मैदान में उतर आया है. सोशल मीडिया पर आईटी सेल औऱ भाजपा के समर्थक भी सक्रिय हैं. देखा जाये तो राज्यहित की चिंता के बदले छात्रों के बहाने झारखंड में राजनीतिक विवाद को खड़ा करने की कोशिश की जा रही है.
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भाजपा नेताओं ने मध्यवर्ग की संवेदना को अपने पक्ष में करने के लिए यह तरीका तरीका अपनाया है. हाल ही में भाजपा में शामिल हुए बाबूलाल मरांडी राजनीतिक हमलो का नेतृत्व कर रहे हैं. पर, यही भाजपा पैदल ही घर लौट रहे झारखंडी मजदूरों पर जब दिल्ली, यूपी और महाराष्ट्र में लॉकडाउन का पालन कराने के बहाने जुल्म किया जा रहा था, तब चुप्पी साधे बैठे थे. वह मजदूरों को वापस लाने की मांग नहीं कर रहे.
झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से कोटा में फंसे हुए झारखंड के छात्रों के सवाल पर बात की है. प्रधानमंत्री ने बात तो सुनी, लेकिन कोई भरोसा नहीं दिया है. हेमंत सोरेन ने प्रधानमंत्री से कहा कि दूसरे राज्य लॉकडाउन का उल्लंधन कर रहे हैं. उन्होंने प्रधानमंत्री से राज्यों के लिए अलग-अलग आचरण का सवाल उठाया है.
हेमंत सोरेन ने गंभीर सवाल उरठाया है. क्योंकि कई ऐसे मामले आ चुके हैं जिसमें राज्यों के साथ अलग-अलग व्यवहार हो रहा है. यह सारा विवाद तब गहराया जब उत्तर प्रदेश सरकार ने कोटा से अपने राज्य के छात्रो को वापस बुलाने का फैसला किया और बस भेज दिया.
कोटा में छात्र बेहद परेशान हैं. इन छात्रो के घर के लोग भी परेशान हैं. झारखंड सरकार पर इस बात का दबाव बढ रहा है कि वह अपने राज्य के छात्रो की वापसी का प्रयास करे. राज्य सरकार के घटक दल कांगेस के मंत्रियों ने भी इस मांग पर जोर दिया है.
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छात्रों को ले कर जो बेचैनी राजनैतिक दल दिखा रहे हैं, वह तो अच्छी बात है. लेकिन राज्य के बाहर फंसे मजदूरों के बारे में इन नेताओं की चुप्पी भी रहस्यमय है. झारखंड के लगभग 9 लाख श्रमिक विभिन्न राज्यों में हैं. उन श्रमिकों की भी समस्या गंभीर है. उनके परिवार को भी चिंता है. वोट बैंक के नजरिये से देखें, तो यह संख्या छात्रों की संख्या से बहुत ज्यादा है. लेकिन मजदूरों की चिंता नेताओं को नहीं है. कोरोना संकट ने साबित कर दिया है कि भाजपा के नेताओं को सिर्फ मिडिल क्लास से मतलब रह गया है.
बाबूलाल मंरांडी ने छात्रों की वापसी की मांग की है और इसके साथ यह भी जोड़ा है कि सभी लोगों को वापस लाया जाए. पर, मजदूरों का नाम नहीं लिया. लेकिन लॉकडाउन को ले कर केंद्र सरकार की गाइडलाइन इसकी इजाज नहीं दे रही है. केंद्र सरकार में एक ठोस और सभी राज्यों के हितों का ध्यान रखने वाली नीति का अभाव है. इस कारण राज्य सरकारों के लिए एक बड़ी चुनौती पैदा हो गयी है. क्योंकि राजनीतिक तौर पर छात्रों का सवाल बेहद संवेदनशील है.
सांसद निशिकांत दूबे ने झारखंड को एक अमीर राज्य बता कर हेमंत सरकार को निशाने पर लिया है. और छात्रों के सवाल पर राजनीति करने का आरोप लगाया है. हालांकि मुख्यमंत्री ने अपनी आर्थिक परेशानियों की कई बार चर्चा की है और बजट सत्र के दौरान राज्य के आर्थिक हालत पर श्वेत पत्र भी जारी किया है. भाजपा के नेता राजनीतिक इस्तेमाल का जो आरोप हेमंत सरकार पर लगा रहे हैं, हो सकता है उसमें कुछ सच्चाई हो, लेकिन मामला अंतरराज्यीय है. और केंद्र की भी इसमें भुमिका है. इसे पूरी तरह नजरअंदाज किया जा रहा है.
छात्रों को संकट से बाहर लाने का दायित्व से इंकार नहीं किया जा सकता. लेकिन इसके लिए केंद्र व राज्य सरकार मिल कर ही कोई रास्ता निकाल सकती हैं. लॉकडाउन में जो जहां है, वहीं रहे पर जोर केंद्र सरकार देती रही है. बावजूद इसके एक राज्य से दूसरे राज्य में जाने वालों की संख्या कम नहीं है. प्रभावी लोग अपने घरो तक पहुंचाए गए हैं. लेकिन श्रमिकों और छात्रों के लिए कोई ऐसी नीति नहीं बनायी जा सकी है. विदेशों से छात्रों को इसी दौरान चार्टर्ड फलाइट से वापस लाया गया.
लॉकडाउन के बावजूद तो कोटा या अन्य जगहो पर फंसे छात्रों को उनके घर जाने के अधिकार से वंचित नहीं किया जाना चाहिए. कोटा में ही कई राज्यों के छात्र हैं. बिहार के मुख्यमंत्री ने तो उत्तर प्रदेश की पहल पर एक तरह की नारजगी भी दिखायी. लेकिन उनके ही समर्थक विधायक को संतान की वापसी का रास्ता सहज किया. इस तरह के दोहरे मानदंड बताते हैं कि लॉकडाउन का भी एक वर्गचरित्र बन गया है. मजूदर जब अपने घर परिवार के पास वापसी की मांग करते हैं तो उन्हें सख्ती से रोका जाता है. और मध्यवर्ग की प्रतिक्रिया उनके खिलाफ सोशल मीडिया पर वायरल होने लगती है.
अपने बंद डब्बे से बाहर आए बिना न तो इस कोरोना संकट से निपटने सामूहिक पहल दिखेगी और न ही सामाजिक तानाबाना सुरक्षित रहेगा. भाजपा के ही एक सांसद हैं समीर उरांव. उन्होंने राज्य सरकार पर तुष्टीकरण का आरोप लगाया है. इसका मतलब साफ है कि वे समाज में धर्म के सवाल को ही उठा रहे हैं. जबकि प्रधानमंत्री तक कह रहे हैं कि कोरोना वायरस का संबंध धर्म या जाति से नहीं है. बावजूद इसके भाजपा के नेता अपने उसी अभियान में लगे हुए हैं जो उनकी राजनीतिक पूंजी में इजाफा करता आया है.
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