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झारखंड भाजपा के लिए फरवरी का महीना अहम, प्रदेश अध्यक्ष व विधायक दल के नेता पर हो सकता है फैसला

Sunil Singh

Ranchi: फरवरी का महीना झारखंड भाजपा के लिए महत्वपूर्ण होगा. संगठनात्मक चुनाव को लेकर हलचल बढ़ रही है. दिल्ली विधानसभा चुनाव परिणाम के बाद केंद्रीय नेतृत्व झारखंड पर ध्यान देगा. भाजपा का पूरा फोकस अभी दिल्ली विधानसभा चुनाव पर है. झारखंड में नए प्रदेश अध्यक्ष और विधायक दल के नेता का चयन होना है. पूर्व मुख्यमंत्री रघुवर दास की भूमिका भी तय होगी. पार्टी के लिए दोनों पद महत्वपूर्ण हैं. विधायक दल के नेता के चयन का मामला अटका हुआ है. सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बावजूद पार्टी नेता का नाम तय नहीं कर पाई. सुप्रीम कोर्ट ने दो हफ्ते का समय दिया था. लेकिन यहां तो एक माह बीत गया. मामला इतना उलझा हुआ है कि सुप्रीम कोर्ट का निर्देश भी बेअसर हो गया.

दरअसल, विधानसभा चुनाव में मिली करारी हार के बाद भाजपा झारखंड में अब नई रणनीति के साथ आगे बढ़ना चाहती है. भाजपा का आदिवासियों से मोह भंग हो चुका है. इसलिए वह अब कोर वोटरों पर फोकस करना चाहती है. ओबीसी, दलित व जनरल वर्ग को आगे लाकर राजनीति करेगी. उन्हें मौका देगी. ओडिशा के राज्यपाल रहे रघुवर दास की सक्रिय राजनीति में वापसी भी इस रणनीति का हिस्सा है.

विधायक दल के नेता का चयन पार्टी के लिए कठिन हो गया है. इस पद के दो प्रमुख दावेदार हैं. प्रदेश अध्यक्ष बाबूलाल मरांडी व वरीय विधायक सीपी सिंह. हालांकि कुछ और भी नाम हैं. बाबूलाल मरांडी के पास भी राजनीति का लंबा अनुभव है. लेकिन सीपी सिंह को संसदीय मामलों की अधिक जानकारी है. सिंह विधानसभा अध्यक्ष भी रह चुके हैं. सदन में बोलने व सरकार को घेरने के मामले में मरांडी की तुलना में सीपी सिंह अधिक कारगर होंगे. लेकिन बाबूलाल मरांडी के कद को देखते हुए पार्टी मरांडी के नाम पर भी विचार कर रही है. सीपी सिंह व मरांडी के बीच ही मामला उलझा हुआ है.

भाजपा ने आदिवासियों को अपने पाले में लाने के उद्देश्य से बाबूलाल मरांडी को काफी तरजीह दी. पार्टी में शामिल कराने के बाद उन्हें प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया. विधानसभा का चुनाव भी मरांडी के नेतृत्व में ही लड़ा गया. धनवार से मरांडी की जीत सुनिश्चित कराने को लेकर निर्दलीय चुनाव लड़ रहे निरंजन राय को पूरी ताकत लगाकर समर्थन में बैठाया गया. बाबूलाल तो चुनाव जीत गए. लेकिन आदिवासियों ने भाजपा का साथ नहीं दिया. आदिवासी वोटर झामुमो व इंडिया गठबंधन के साथ चले गए. यानि बाबूलाल मरांडी, चंपाई सोरेन, अर्जुन मुंडा सहित सभी बड़े नेताओं को आदिवासियों ने खारिज कर दिया. ऐसे में फिर से यदि बाबूलाल को विधायक दल का नेता बनाया जाता है तो राजनीतिक रूप से बहुत लाभ की उम्मीद नहीं है. इन तमाम पहलुओं पर पार्टी का शीर्ष नेतृत्व विचार कर रहा है. चयन में देर इसलिए भी हो रही है.

इधर, रघुवर दास की भूमिका भी तय होगी. पार्टी यदि किसी ओबीसी को प्रदेश अध्यक्ष बनाती है तो फिर रघुवर दास को जिम्मेदारी दी जा सकती है. क्योंकि रघुवर दास से बड़ा ओबीसी चेहरा भाजपा में अभी कोई नहीं है. रघुवर दास भी झारखंड में ही राजनीति करना चाहते हैं. उन्होंने कई अवसरों पर इसके साफ संकेत भी दिए हैं. प्रदेश अध्यक्ष व विधायक दल के नेता का फैसला इस महीने के अंत तक हो सकता है. प्रदेश अध्यक्ष के चयन में यदि विलंब हुआ तो नेता प्रतिपक्ष का नाम तय हो जाएगा. दोनों प्रमुख पदों पर अलग-अलग वर्ग से आने वाले नेताओं को जिम्मेदारी दी जाएगी. इस बार संगठन में भी काफी बदलाव देखने को मिलेगा. गणेश परिक्रमा करने वाले व जनाधारविहीन नेता संगठन से आउट हो सकते हैं. नए चेहरों को अवसर मिलेगा. पार्टी राजनीतिक नफा-नुकसान पर मंथन कर रही है.

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