
Ranchi: झारखंड विधानसभा के शीतकालीन सत्र में एक बार फिर से स्थानीयता परिभाषित करने संबंधी विधेयक सदन के पटल पर रखा गया. इससे पहले यह विधेयक सदन में ध्वनिमत से पारित हुआ था. लेकिन राज्यपाल में इस विधेयक में कुछ त्रुटियों का हवाला देते हुए इसे सरकार को वापस कर दिया था. लेकिन सरकार की तरफ से राज्यपाल के सुझाव को नहीं माना गया और विधेयक को दोबारा से सदन में रखा गया. विधेयक को सदन के पटल पर रखते हुए सीएम हेमंत सोरेन ने एक लंबी स्पीच दी. उस स्पीच को हु-ब-हू न्यूज विंग पाठकों के लिए लिख रहा है. पढ़िए सीएम हेमंत की पूरी स्पीच.
अपनी स्पीच की शुरुआत करते हुए सीएम हेमंत सोरेन ने कहा कि राज्यपाल के संदेश के आलोक में स्थानीयता परिभाषित करने संबंधी विधेयक पर चर्चा कर रहे हैं.
1932 खतियान आधारित स्थानीयता मूलवासी की स्मिता
1932 खतियान आधारित स्थानीयता इस राज्य के करोड़ों आदिवासी और मूलवासी की स्मिता एवं पहचान जुड़ी हुई है एवं उनकी यह बहुप्रतीक्षित मांग रही है. उनकी भावना एवं आकांक्षा के अनुरूप पिछले वर्ष 11 नवम्बर को इस सदन ने ध्वनिमत से पारित कर इसे राज्यपाल के पास स्वीकृति के लिये भेजा था. दिशोम गुरू शिबू सोरेन ने जब अलग राज्य की लम्बी लड़ाई लड़ी तो उस वक्त भी यहां के स्थानीय व्यक्तियों का झारखंड राज्य की संपदा और नौकरियों पर हक रहे, इसी जन भावना से वह लंबी लड़ाई लड़ी थी. परन्तु दुर्भाग्य की बात है कि झारखंड बनने के बीस वर्षों तक इस दिशा में कोई पहल नहीं की गयी.
राज्यपाल ने अपने संदेश के साथ अटॉर्नी जनरल का वैधिक परामर्श भी संलग्न किया है एवं तद्नुसार विधेयक पर पुनर्विचार करने का निर्देश दिया है. अटॉर्नी जनरल ने अपने परामर्श में स्थानीयता की परिभाषा एवं उसके आधार पर सुविधाएं उपलब्ध कराने को पूरी तरह से जायज ठहराया है एवं राज्य के प्रयास की सराहना की है.
परन्तु विधेयक की धारा 6 पर परामर्श हेतु विद्वान अटॉर्नी जनरल ने जिस cheeblu leele prasad rao बनाम आंध्रप्रदेश तथा सत्यजित कुमार बनाम झारखंड राज्य में सर्वाेच्च न्यायालय के आदेश को अपना आधार बनाया है. उस संबंध में सदन को बताना चाहूंगा की ये दोनों ही फैसले वर्तमान विधेयक के परिप्रेक्ष्य में प्रासंगिक नहीं है.
राज्यपाल को नहीं है संविधान की पांचवीं अनुसूची में कानून बनाने व संशोधन का अधिकार
उक्त दोनों आदेश में सर्वाेच्च न्यायालय ने यह व्यवस्था दी है कि संविधान की पांचवीं अनुसूची में राज्यपाल को कानून बनाने अथवा उसमें संशोधन करने का अधिकार प्राप्त नहीं है. संविधान के अनुच्छेद 309 के तहत नियम बनाने की यह शक्ति राज्य की विधान सभा को प्राप्त है. इसी कारण विधेयक बनाने और इस पर विधान सभा की सहमति प्राप्त करने का एवं उसे नौवीं अनुसूची में शामिल करने का निर्णय लिया.
इसी प्रकार अटॉर्नी जनरल द्वारा जिन अन्य आदेशों का उल्लेख किया गया है उनमें से Indira Shawney Vs Union of India का संबंध पिछड़े वर्ग को आरक्षण उपलब्ध कराने से है. General Manager दक्षिण रेलवे बनाम रंगाचार का संबंध ST/ SC को प्रोन्नति मंल आरक्षण उपलब्ध कराने से है. अखिल भारतीय शोषित कर्मचारी संघ (रेलवे) बनाम भारत सरकार का संबंध ST/ SC वर्ग के लिए आरक्षित पदों की रिक्ति को आगामी वर्षों में Carry Forward करने से है एवं State of Kerala vs N.M. Thomas का संबंध ST/ SC श्रेणी के लोगों को प्रोन्नति देने से है. जबकि इसके विपरित वर्तमान विधेयक का उद्देश्य स्थानीयता परिभाषित करना एवं उसके आधार पर स्थानीय को रोजगार सहित अन्य लाभ प्रदान करना है. इस प्रकार इन सभी मामलों में पारित आदेश का वर्तमान विधेयक से किसी प्रकार का संबंध स्थापित नहीं होता है. यहां उल्लेखनीय है कि अटॉर्नी जनरल ने अपने परामर्श में यह भी उल्लेख नहीं किया है कि कई राज्यों के द्वारा विभिन्न वर्गों को 50 प्रतिशत से अधिक आरक्षण उपलब्ध कराने का प्रावधान भी नौवीं अनुसूची में शामिल कर लिए जाने के फलस्वरूप Judicial Review से सुरक्षित हो चुका है.
सरकार ने भी एसटी एससी एवं पिछड़े श्रेणी के लोगों का आरक्षण 50 प्रतिशत से बढ़ाकर 67 प्रतिशत करने से संबंधित विधेयक विधान सभा से पास कराकर राज्यपाल महोदय के पास भेजा हुआ है. मैं, पूरे सदन की ओर से आरक्षण बढ़ाने से संबंधित उक्त विधेयक पर भी शीघ्रताशीघ्र सहमति प्रदान करने का राज्यपाल से आग्रह करता हूं.
अटॉर्नी जनरल ने अपने परामर्श में वर्ग 4 के लिए तो विधेयक के प्रावधान को संवैधानिक प्रावधानों के अनुकूल पाया है. परंतु वर्ग 3 के मामलों में उनकी राय ऐसी नहीं है. जबकि वस्तुस्थिति यह है कि सभी प्रांतों में और राष्ट्रीय स्तर पर भी सामान्यत वर्ग 3 और वर्ग 4 की श्रेणी के नौकरियों को एक श्रेणी में रखा जाता है.
सरकार ने वर्तमान स्थानीयता संबंधित विधेयक को नौवीं अनुसूची में शामिल करने का प्रावधान भी विधेयक में किया हुआ है. जिससे की इसे Judicial Review के विरूद्ध सुरक्षा कवच उपलब्ध हो सके. आश्चर्य की बात है कि अटॉर्नी जनरल ने इस तथ्य को अपना परामर्श प्रदान करने में कहीं भी संज्ञान में नहीं लिया है. उपरोक्त सभी तथ्यों से ऐसा प्रतीत होता है कि विद्वान अटॉर्नी जनरल द्वारा दिया गया परामर्श युक्तिसंगत एवं तर्कसंगत नहीं है.
विधेयक में किसी तरह के परिवर्तन की आवश्यकता नहीं- सीएम
सदन को बताना चाहता हूं कि राज्य सरकार ने झारखंड राज्य के विद्वान महाधिवक्ता से इस विषय पर परामर्श प्राप्त किया. जिसमें उन्होंने स्पष्ट रूप से परामर्श दिया है कि विधान सभा द्वारा पारित विधेयक को संसद के द्वारा नौंवी अनुसूची में शामिल कराया जा सकता है एवं तत्पश्चात् संविधान के अनुच्छेद 31(बी) के अन्तर्गत उस विधेयक को संविधान के पार्ट 3 अथवा यदि वह किसी न्यायालय के आदेश के प्रतिकुल भी हो तो भी उसे सुरक्षित रखा जा सकता है.
उपरोक्त के आलोक में वर्तमान विधेयक में किसी तरह के परिवर्तन की आवश्यकता नहीं है और इसे वर्तमान स्वरूप में ही पुनः पारित कराने का आग्रह करता हूं.
झारखंड पदों एवं सेवाओं की रिक्तियों में आरक्षण और शाईन नेशनल यूनिवर्सिटी विधेयक भी सदन में बहुमत से पास कर दिया गया. इसके अलावा प्रज्ञान इंटरनेशनल यूनिवर्सिटी से संबंधित विधेयक को प्रवर समिति में भेजने की घोषणा स्पीकर ने की.
विधानसभा में इन विधेयकों पर रही चर्चा और इन्हें किया गया पारित
झारखंड विधानसभा के शीतकालीन सत्र में बुधवार को कुल 4 विधेयक लाए गए. इनमें से एक झारखंड स्थानीय व्यक्तियों की परिभाषा और परिणामी सामाजिक, सांस्कृतिक और अन्य लाभों को ऐसे स्थानीय व्यक्तियों तक विस्तारित करने के लिए विधेयक 2022 को बगैर किसी संशोधन के फिर से सदन से पारित कर दिया गया. 15 दिसम्बर 2023 को जब शीतकालीन सत्र प्रारंभ हुआ था तो इस विधेयक के संबंध में राज्यपाल के संदेश को भी पढा गया था. इसमें राज्यपाल ने परिवर्तन के लिए कुछ सुझाव भी दिए थे. पर सीएम ने सदन में इसमें किसी परिवर्तन से इंकार कर दिया. दूसरा विधेयक प्रज्ञान इंटरनेशनल यूनिवर्सिटी (निरसन) 2023 का था. इसे भी सदन में ध्वनिमत से पारित किया गया. झारखंड पदों एवं सेवाओं की रिक्तियों में आरक्षण (संशोधन) विधेयक 2023 और शाईन नेशनल यूनिवर्सिटी विधेयक 2023 भी सदन में पारित किया गया.
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