
Ranjan Jha
मैं हूं धनबाद..देश की कोयला राजधानी भी मेरा नाम किसी ने दिया…राजधानी मतलब हर तरह की सुविधाओं से संपन्न एक शहर…अगर आपके दिमाग में ऐसी बात है तो इसे निकाल दें… यहां तो सांस लेने के लिए शुद्ध हवा भी नहीं मिलेगी, यहां पानी की कमी, बिजली की किल्लत शहर की पहचान है. एक तरफ से यहां करोड़ों खर्चकर सड़कें बनाई जाती है, तो दूसरी तरफ से गड्ढे नमूदार होने लगते हैं…तब ही देश के जननायक कहे गये पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने कहा था कि यहां सड़क पर गड्ढे हैं कि गड्ढों की सड़क है. हालांकि, उन्होंने जब यह कहा था तब कांग्रेस का शासन था. अब उनकी ही पार्टी के शासन में 24 करोड़ रुपये की लागत से बनी धनबाद-झरिया-सिंदरी सड़क पर बड़े-बड़े गड्ढे उभर गये हैं. धनबाद के हृदय स्थल गया पुल पर बड़ा गड्ढा बन गया है. इस गड्ढे के कारण सड़क जाम रोज की बात हो गयी है.
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यहां वसूली, माफियागिरी दस्तूर बन गया है. हालांकि सीबीआइ और निगरानी विभाग की शाखा यहां की शोभा बढ़ाती है. अपराधियों का शहर, चोरों का शहर, कोयला चोरों का शहर यह तो स्वाभाविक है. यह यहां की खास पहचान है. इन दिनों आउटसोर्सिंग कंपनियां खास महत्व वाली हो गयी हैं. एक आउटसोर्सिंग कंपनी से दस-बीस लाख महीना मिलना सफेदपोशों के लिए मामूली बात है. कोयला लोडिंग से सौ करोड़ रुपये से अधिक महीने की कमाई किसी सफेदपोश की, ये बात बाहर के लोगों को भले मजाक लगे पर यह सच है. जीटी रोड़ पर मामूली सिपाही की कमाई किसी साहब की कमाई से बहुत ज्यादा है. यहां रोज विकास-विकास का शोर होता है. किधर से आ रहा है विकास लोग देखते हैं. फिर कहते हैं, धत्त…इ तो कमीशन का धंधा है..
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आपको बताएं इस शहर की बिजली व्यवस्था ठीक करने यानी तार पोल ट्रांसफार्मर आदि बदलने का ठेका एक बड़ी कंपनी को दिया गया. उसी कंपनी ने धनबाद को पानी से लबालब करने के लिए नयी पाइप बिछाई. इसके बाद भी यहां की बड़ी आबादी पीने के पानी के लिए हर मौसम में परेशान रहती है. गर्मी में समस्या थोड़ी ज्यादा बढ़ जाती है.
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आपको जानकर हैरानी होगी कि शहर के हजारों लोगों के घरों में इस बरसात के मौसम में नाला का पानी भरा है. रास्ता कीचड़ से भरा होने के कारण आना-जाना कठिन है. लेकिन धनबाद नगर निगम अपनी उपलब्धि पर फूले नहीं समा रहा है. लोगों को समस्याओं में लथपथ छोड़कर निगम जनता के टैक्स के पैसे को अनाप-शनाप काम के नाम पर लुटा रहा है.
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अभी लूबी सर्कुलर रोड पर फुटपाथ और फूलों का बगान बनाने का काम युद्धस्तर पर चल रहा है. बता दें कि निगम ने शहर में कुछ दिन पहले ही हजारों कचरा पेटियां लगाई थी. इसे लगाने में लाखों का वारा न्यारा किया गया. अब उनमें से कितनी कचरा पेटी बची है यह जांच और खोज का विषय है. आपको पता होना चाहिए कि धनबाद के विकास और यहां के आवाम के कल्याण के नाम पर लगातार करोड़ों रुपये के खर्च से सरकारी योजनाएं चल रही है. पर कोई यह देखनेवाला नहीं कि योजनाओं का हर्ष क्या हुआ.
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यह अलग बात है कि फाइलों की लालफीता शाही का जमाना चला गया है और कंप्यूटर के बाद डिजिटल क्रांति आ गयी है. इसके बाद भी ना बाबूओं का राज कम हुआ है, ना ठाठ. बता दें कि धनबाद लोग सिर्फ कमाने आते हैं. मोटी पूंजी और तगड़ी पैरवी लगाकर आते हैं. लोग आते हैं-कमाते हैं और चले जाते हैं. यहां जो बस गये हैं उनमें से ज्यादातर लोगों को सिर्फ कमाई से मतलब है. बाप बड़ा न भैया…सबसे बड़ा रुपैया. धनबाद की ऐसी तैसी…यही यहां का बेस्ट फार्मूला है.




