Jamshedpur

पत्रकार कल्याण के चाचा अक्खय गोराई का निधन, संघर्ष भरा रहा उनका जीवनकाल

Jamshedpur :  पटमदा के लावा के रहने वाले पत्रकार सह बुद्धिजीवी मंच पटमदा के सचिव कल्याण कुमार गोराई के चाचा अक्खय गोराई (76) का शनिवार की शाम करीब साढ़े चार आकस्मिक निधन हो गया. वे मिलनसार व मृदुभाषी व्यक्ति थे. इससे क्षेत्र में शोक की लहर दौड़ गई. वे पत्नी उर्मिला गोराई, दो पुत्रों बिरिंची उर्फ प्राणकृष्ण गोराई, श्यामल उर्फ नाडु गोपाल गोराई और एक पुत्री अलका गोराई समेत पोते-पोतियों का भरा-पूरा परिवार छोड़ गए हैं. वे पांच भाइयों में तीसरे थे. वे दो माह से बीमार चल रहे थे और जमशेदपुर के एक चिकित्सक से उनका इलाज चल रहा था. उनका एक पैर व हाथ में फाइलेरिया की बीमारी थी. श्यामल गोराई ने बताया कि शनिवार की दोपहर उन्होंने भोजन भी किया था लेकिन अचानक साढ़े चार बजे संभवतः हर्ट अटैक के कारण अंतिम सांस ली. शनिवार की देर रात तक लावा मौजा स्थित सतीकुड़ श्मशान में अंतिम संस्कार कर दिया गया. बड़े पुत्र ने उन्हें मुखाग्नि दी.

अंतिम संस्कार में ये थे शामिल

अंतिम संस्कार में गांव के ही उज्जवल कांति दास, अरूण सिंह, आलोक वरण सिंह, सागर सिंह, लागर सिंह, बुद्धेश्वर कुंभकार, लवघन सहिस, सुधीर कुमार सिंह, दीपक गोराई, तरणी सिंह, गोपाल सहिस, निरंजन गोराई व (दामाद) घनश्याम गोराई, अनुज पूर्णचन्द्र गोराई और चंद्रमोहन गोराई के अलावे अन्य परिजन शामिल हुए.

संघर्ष भरा रहा जीवन

एक जमाना था जब यहां के लोगों के पास छोटी मोटी खेती के अलावे जीविका का कोई वैकल्पिक साधन नहीं हुआ करता था. तब दो वक्त की रोटी का जुगाड़ करना भी मुश्किल होता था. उन्होंने आज से करीब 45 वर्षों पूर्व पश्चिम बंगाल के वर्द्धमान जिला स्थित सिमलन में  अपनी पत्नी व तीनों बच्चों के साथ मजदूरी करने चले गए थे. उस जमाने में पटमदा समेत आस-पास के बड़ी संख्या में लोग मजदूरी करने बंगाल के वर्द्धमान समेत विभिन्न जिलों में काम करने जाते थे. नामाल खाटा या पूब खाटा कहा जाता था. करीब 20 वर्षों तक वहां रहकर वहां के किसानों के यहां मजदूरी की और अपने बच्चों की शिक्षा-दीक्षा समेत परवरिश की. वहां से प्रतिवर्ष अपने माता-पिता को देखने के लिए वहां की प्रसिद्ध मिठाई “सोन्देश” लेकर वे आते थे. जिसे अपने परिवार के लोगों के अलावे पड़ोसियों में भी बांटा जाता था. परिजनों के साथ-साथ पड़ोसियों को भी उनके घर लौटने की प्रतीक्षा करते थे. करीब 20 वर्षों तक वहां मजदूरी करने के बाद स्थायी रूप से अपने गांव लौटे और यहां मकान बनाकर फिर से रहने लगे. इस बीच उन्होंने कई वर्षों तक बेटों के साथ खेती-बाड़ी की. साथ में गौ सेवा करने लगे. उनके ही बदौलत आज उनके घर में आधे दर्जन से अधिक गाय हैं और उसका दूध बेचकर ही अपने पोतों सुमित गोराई व असीम गोराई को उच्च शिक्षा दिला रहे थे.

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