
शहादत दिवस पर विशेष
Naveen Sharma
Ranchi : अंग्रेजों के खिलाफ स्वतंत्रता संग्राम के यज्ञ में अपने प्राणों की आहूति देने वाले अमर क्रांतिकारी मदनलाल धींगड़ा का आज बलिदान दिवस है. मदनलाल धींगड़ा का जन्म 18 सितम्बर सन् 1883 को पंजाब प्रांत के सम्पन्न हिन्दू परिवार में हुआ था. उनके पिता दित्तामल जी सिविल सर्जन थे और अंग्रेजी रंग में पूरी तरह रंगे हुए थे. इनकी माताजी अत्यन्त धार्मिक एवं भारतीय संस्कारों से परिपूर्ण महिला थीं.
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तांगा-चालक औऱ मजदूर के रूप में भी काम किया
इनका परिवार अंग्रेजों का विश्वासपात्र था और जब मदनलाल को भारतीय स्वतन्त्रता सम्बन्धी क्रान्ति के आरोप में लाहौर के एक कॉलेज से निकाल दिया गया तो परिवार ने मदनलाल से नाता तोड़ लिया. मदनलाल को जीवन यापन के लिये पहले एक क्लर्क के रूप में, फिर एक तांगा-चालक के रूप में और अन्त में एक कारखाने में मजदूर के रूप में काम करना पड़ा.
कारखाने में श्रमिकों की दशा सुधारने के लिए उन्होंने यूनियन (संघ) बनाने की कोशिश की किन्तु वहाँ से भी उन्हें निकाल दिया गया.
कुछ दिन उन्होंने बंबई में काम किया फिर अपनी बड़े भाई की सलाह पर सन् 1906 में उच्च शिक्षा प्राप्त करने इंग्लैण्ड चले गये. वहाँ उन्होंने यूनिवर्सिटी कॉलेज लन्दन में यांत्रिकी अभियांत्रिकी में प्रवेश ले लिया. विदेश में रहकर अध्ययन करने के लिये उन्हें उनके बड़े भाई ने तो सहायता दी ही. इंग्लैण्ड में रह रहे कुछ राष्ट्रवादी कार्यकर्ताओं से भी आर्थिक मदद मिली थी.
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सावरकर की “अभिनव भारत के सदस्य बने
लन्दन में रहते हुए धींगड़ा भारत के प्रख्यात राष्ट्रवादी विनायक दामोदर सावरकर एवं श्यामजी कृष्ण वर्मा के सम्पर्क में आये. ये दोनों महान क्रांतिकारी मदनलाल धींगड़ा की प्रचंड देशभक्ति को देखकर बहुत प्रभावित हुए.
इसके बाद वीडी सावरकर ने मदनलाल को “अभिनव भारत ” नामक क्रान्तिकारी संस्था का सदस्य बनाया और हथियार चलाने का प्रशिक्षण दिया.मदनलाल धींगड़ा ‘ इण्डिया हाउस ‘ में रहते थे जो उन दिनों भारतीय विद्यार्थियों के राजनीतिक क्रियाकलापों का केन्द्र हुआ करता था. ये लोग उस समय खुदीराम बोस और उनके कई क्रांतिकारियों को अंग्रेजों द्वारा फांसी लगाये जाने से बहुत क्रोधित थे. जिसका प्रतिशोध लेने का विचार करते रहते थे.
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सर विलियम हट कर्जन वायली पर 5 गोलियाँ दागी
1 जुलाई सन् 1909 की शाम को ” इण्डियन नेशनल ऐसोसिएशन ” के वार्षिकोत्सव में भाग लेने के लिये लंदन में भारी संख्या में भारतीय और अंग्रेज इकठे हुए.जैसे ही भारत सचिव के राजनीतिक सलाहकार सर विलियम हट कर्जन वायली अपनी पत्नी के साथ हॉल में प्रविष्ट हुआ, धींगड़ा ने उनके चेहरे पर 5 गोलियाँ दाग दीं. इसमें से चार सही निशाने पर लगीं. उसके बाद धींगड़ा ने अपने पिस्तौल से स्वयं को भी गोली मारनी चाही किन्तु उन्हें पकड़ लिया गया.
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पेंटविले जेल में फाँसी दी
23 जुलाई 1909 को धींगरा मामले की सुनवाई पुराने बेली कोर्ट में हुई.अदालत ने उन्हें मृत्युदण्ड का आदेश दिया और आज ही के दिन अर्थात 17 अगस्त सन् 1909 को लन्दन की पेंटविले जेल में फाँसी दी. गई. माना कि अंग्रेजों ने उनकी जीवन लीला समाप्त कर दी थी , लेकिन उनकी यशलीला तो आज इतने वर्षों बाद भी बुलंदी पर है.
स्केच : प्रभात ठाकुर, कला निर्देशक, बॉलीवुड
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