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झारखंड में ईसाइयत के इतिहास की शुरूआत है 2 नवंबर का दिन

इस दिन 1845 को पहले चार जर्मन मिशनरी पहुंचे थे रांची, जाना था म्यांमार (बर्मा) पर रांची में ही रुककर मिशन का काम किया

Ranchi :  2 नवंबर 1845 यह तारीख झारखंड के इतिहास में महत्वपूर्ण तारीख है. इस दिन प्रथम चार जर्मन मिशनरी रांची पहुंचे. इसलिए माना जा सकता है कि यह दिन झारखंड में ईसाईयत के इतिहास की शुरूआत है.

उन मिशनरियों में शामिल थे एमिल शत्स, थियोदोर यानके, अगस्तुस ब्रांत और फ्रेडरिक वच्च. इन मिशनरियों को जर्मनी के फादर गोस्सनर ने म्यांमार में धर्म प्रचार के लिए भेजा था. पर ये सभी रांची पहुंच गये. इनके रांची पहुंचने का प्रसंग भी बड़ा रोचक है.

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म्यांमार जाने वाले मिशनरी रांची पहुंच गये

फादर गोस्सनर ने इन मिशनरियों को म्यांमार में धर्म प्रचार के लिए भेजा था. चारों मिशनरी अपनी यात्रा के क्रम में पहले कोलकाता पहुंचे. कोलकाता में इन मिशनरियों की मुलाकात छोटानागपुर के कुछ लोगों से हुई जो वहां कुली का काम कर रहे थें. जब चारों मिशनरियों ने उन कुलियों को देखा तो उन्हें लगा कि वे अलग लोग (आदिवासी) हैं. उन्होंने पता लगाया और तब वे छोटानागपुर के लिए चल पड़े.

उस जमाने में वे मिशनरी बैलगाड़ी में बैठकर भारी तकलीफों के साथ कई दिनों के सफर के बाद रांची पहुंचे. उन्होंने जिस जगह पर पड़ाव डाला, उस जगह को उन्होंने नाम दिया, बेथेसदा (दया का घर). इसके बाद उसी स्थान पर रहकर वे आदिवासी समुदाय के बीच धर्म प्रचार का काम करते रहे.

तकरीबन एक साल के बाद 25 जून 1846 को एक अनाथ बच्ची मार्था का बपतिस्मा (ईसाई धर्म में दीक्षित होने का पहला संस्कार) हुआ. इसके कुछ समय बाद चार अन्य लोगों ने बपतिस्मा लिया और झारखंड में ईसाइयत की शुरूआत हुई.

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1851 में क्राइस्ट चर्च की नींव डाली गयी

जब लोगों के ईसाई धर्म को स्वीकार करने की खबर फादर गोस्सनर को जर्मनी में मिली तो उन्होंने एक बड़ा गिरजाघर बनाने का आदेश दिया. गिरजाघर बनाने की जिम्मेवारी पादरी हर्जोग को मिली. 18 नवंबर 1851 को गिरजाघर की नींव डाली गयी. चार साल के बाद 1855 में यह बनकर तैयार हुआ जिसे आज हम क्राइस्ट चर्च के रूप में जानते हैं. 1855 के दिसंबर में क्रिसमस पर पहली बार यहां आराधना हुई.

आज गोस्सनर कंपाउंड में जहां, मॉडरेटर का बंगला है उसी के सामने एक स्मरण पत्थर है. यह पत्थर उन्हीं चार मिशनरियों की स्मृति में बना है. हर वर्ष उन मिशनरियों की स्मृति में 2 नवबंर को मिशन पर्व मनाया जाता है.

इस वर्ष दो नवंबर को सार्वजनिक कार्यक्रम नहीं होंगे

इस वर्ष कोविड की वजह से कोई सार्वजनिक कार्यक्रम नहीं होंगे. जीइएल चर्च के सचिव प्रदीप कुजूर ने बताया कि मॉडरेटर जोहन डांग, बिशप जॉनसन लकड़ा, संयुक्त सचिव अटल खेस, अनूप मुंडूसहित चर्च के कुछ पदाधिकारी स्मरण पत्थर के पास जाकर चारों मिशनरियों को श्रद्धांजलि देंगे.

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