
Mumbai: कोरोना वैश्विक महामारी से जंग जारी है. इससे उबरने के लिए वैक्सीन पर भी तेजी से काम चल रहा है. वहीं अबतक के रिसर्च में ये बात सामने आयी है कि कोरोना से संक्रमित हुए मरीज के शरीर में एंटीबॉडी बनती है, जो उसे कोरोना से लड़ने की क्षमता देता है. लेकिन ये एंटीबॉडीज आखिर कोरोना से ठीक हो चुके मरीज के शरीर में आखिर कितने दिनों तक रहती है.
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कोविड-19 वायरस को लेकर अध्ययन कर रहे एक्सपर्ट का दावा है कि इस महामारी से ठीक हो चुके मरीजों की बॉडी में ये एंटीबॉडीज ज्यादा दिनों तक नहीं बनी रहती है. मुंबई के जेजे ग्रुप ऑफ हॉस्पिटल के कर्मचारियों पर हुए सर्वे में ये बात सामने आयी है कि ये एंटीबॉडीज कुछ महीनों तक ही शरीर में रहती है.
कुछ महीनों से ज्यादा नहीं रहती एंटीबॉडीज- रिसर्च
मुंबई के जेजे ग्रुप ऑफ हॉस्पिटल में किये गये सर्वे में जो जानकारी सामने आयी है वो कोरोना के इलाज, वैक्सीन बनाने में काफी मददगार साबित हो सकती है. इस रिसर्च के प्रमुख डॉ. निशांत कुमार का कहना है कि सात सप्ताह पहले जेजे, जीटी औऱ सेंट जॉर्ज हॉस्पिटल्स के 801 स्वास्थ्य कर्मियों में से 28 आरटी-पीसीआर टेस्ट में कोरोना पॉजिटिव मिले थे. लेकिन, जून में हुए सीरो सर्वे में किसी के भी शरीर में एंटीबॉडीज नहीं पायी गयी.
वहीं जेजे हॉस्पिटल के 34 और लोग तीन से पांच हफ्ते पहले पीसीआर टेस्ट में कोरोना से संक्रमित पाये गये थे, बाद में इनका सीरो सर्वे कराया गया जिसमें क्रमशः 90 औऱ 38.5 फीसदी लोगों में एंटीबॉडीज थी. इस स्टडी से साफ होता है कि समय के साथ एंटीबॉडीज खत्म होती गयी.
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क्या होती है एंटीबॉडी
मानव शरीर में रोगों से लड़ने की क्षमता होती है, जिसे रोग प्रतिरोधक क्षमता कहते हैं. इस इम्यून सिस्टम के द्वारा आप कई तरह के रोगों से बिना इलाज के ही सुरक्षित रहते हैं और आपके प्रतिरक्षा तंत्र में एंटीबॉडी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. वायरस के दुष्प्रभाव को कम व नष्ट करने का कार्य इन्हीं एंटीबॉडीज के द्वारा किया जाता है. शरीर में एंटीजन के प्रवेश करने के बाद ये एंटीबॉडी का बनना शुरू हो जाता है.
कोविड-19 से बचाव करने वाले एक एंटीबॉडी की पहचान हुई
कोरोना को लेकर लगातार रिसर्च जारी है, वहीं वैज्ञानिकों ने मानव शरीर में पाए जाने वाले एक एंटीबॉडी की पहचान की है जो कोविड-19 के लिए जिम्मेदार सार्स सीओवी-2 संक्रमण से बचाव कर सकता है या उसे सीमित कर सकता है.
अमेरिका के मैसाचुसेट्स मेडिकल स्कूल यूनिवर्सिटी (यूएमएमएस) के अनुसंधानकर्ताओं ने सार्स-सीओवी-2 स्पाइक प्रोटीन के खिलाफ प्रतिक्रिया करने वाले मानवीय मोनोक्लोनल एंटीबॉडी (एमएबी) का पता लगाया है जो श्वसन प्रणाली के म्यूकोसल (शरीर के आंतरिक अंगों को घेरे रहने वाली झिल्ली) टिशू पर एसीई2 रिसेप्टर पर वायरस को बंधने से रोकता है.
मोनोक्लोनल एंटीबॉडी वे एंटीबॉडी हैं जो समान प्रतिरक्षा कोशिकाओं द्वारा बनाए जाते हैं और ये सभी सेल विशिष्ट मूल सेल की क्लोन होती हैं.
अध्ययन के मुताबिक इस त्वरित एवं महत्त्वपूर्ण खोज की उत्पत्ति 16 साल पहले हुई थी जब यूएमएमएस के अनुसंधानकर्ताओं ने आइजीजी मोनोक्लोनल एंटीबॉडी विकसित की थी जो इसी तरह के वायरस, सार्स के खिलाफ प्रभावी था.
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