
Ranchi : शिक्षा मंत्री ने 8 मई को एक सवाल उठाया था. उन्होंने शिक्षकों से पूछा था कि सरकारी स्कूल के एक शिक्षक पर हर माह 4000 रुपये खर्च होते हैं. फिर भी लोगों की पसंद प्राइवेट स्कूल ही क्यों हैं?
झारखंड राज्य प्राथमिक शिक्षक संघ के वरीय उपाध्यक्ष सुनील कुमार झा ने शिक्षा मंत्री को अपना जवाब भेजा है. बिंदुवार सुझाव दिये हैं. हम उसे हू-ब-हू प्रकाशित कर रहें हैं.
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पढ़ें शिक्षक का सुझाव
– सरकारी विद्यालयों में भी पूर्व प्राथमिक कक्षाओं यथा नर्सरी, केजी के प्रावधान को लागू किया जाए.
– सभी बच्चों की न्यूनतम 75% उपस्थिति अनिवार्य किया जाए तथा प्राइवेट स्कूलों की तरह यहां भी अभिभावकों को इसके लिए जवाबदेह बनाया जाए.
– छोटे-छोटे विद्यालयों को मर्ज करते हुए पंचायत स्तर पर दो या तीन +2 स्तरीय, नर्सरी से बारहवीं तक विकसित किया जाए तथा उनमें पर्याप्त शिक्षकों के साथ तमाम आधुनिक सुविधाएं उपलब्ध हों.
– नेतरहाट स्कूल की तर्ज पर विद्यालयों को बाहरी हस्तक्षेप से मुक्त करते हुए स्वायत्तता प्रदान किया जाए. विद्यालयों में प्रतिस्पर्धा की भावना को विकसित करते हुए उनके ओवर ऑल परफॉर्मेंस के आधार पर नैक की तरह ग्रेडिंग की व्यवस्था किया जाए.
– विभिन्न NGO ने झारखंड शिक्षा परियोजना की मिलीभगत से शिक्षा में तथाकथित सुधार के नाम पर सरकारी स्कूलों को एक प्रयोगशाला बना दिया है. इसके चलते शिक्षकों की मौलिक शिक्षण क्षमता कुंठित हो रही है और शिक्षा के स्तर में लगातार ह्रास हो रहा है. इस कुप्रथा को तत्काल बन्द किया जाए तथा शिक्षकों के लिए सिर्फ आनलाइन प्रशिक्षण का प्रबंध किया जाए.
– मध्याह्न भोजन योजना के संचालन एवं संबंधित वित्तीय दायित्व से शिक्षकों को पूर्णतः मुक्त किया जाए.
– विद्यालयों में रिपोर्टिंग एवं अन्य गैर शैक्षणिक कार्य के लिए लिपिक का पद सृजित किया जाए.
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