
Ranchi : राज्य सरकार किसानों को सबल बनाने की पहल कर रही है. 50,000 रुपये तक कर्ज माफी का प्रावधान 2019-20 के बजट में किया गया है. उधर 11 बरसों से कृषक समाज को केसीसी का लाभ दिलाने वाला किसान हेल्प डेस्क किसी तरह दिन काट रहा है. करीब 4000 किसानों को किसान क्रेडिट कार्ड के जरिये आर्थिक मदद मुहैया करा चुके किसान हेल्प डेस्क में अरसे से सन्नाटा पसरा पड़ा है.
3600 किसानों को हेल्प डेस्क ने दिलाया है केसीसी का लाभ
वैसे किसान जिन्हें पात्रता के बावजूद बैंकों से किसी तरह का ऋण नहीं मिल पाता, उन्हें हेल्प डेस्क केंद्र की मदद मिल सकती है. किसान क्रेडिट कार्ड किसानों के लिए महत्वपूर्ण आधार है. केसीसी के आधार पर उन्हें खेती के लिए हर साल महाजनों से लोन लेने के झंझट से राहत मिल जात है. जिन किसानों को बैंक से केसीसी बनाने में दिक्कत आती है, वे राज्य स्तरीय किसान हेल्प डेस्क में संबंधित पत्र, कागजातों के साथ संपर्क कर सकते हैं.
हेल्प डेस्क द्वारा संबंधित बैंक के जिले के प्रमुख पदाधिकारी के साथ तुरंत पत्राचार किया जाता है. उपयुक्त पात्रों के मामलों में 15 दिनों के अंदर कार्रवाई करने की अपील की जाती है. बैंक इस पत्र के आधार पर कार्रवाई करते भी हैं. अब तक 3600 से भी अधिक किसान हेल्प डेस्क की पहल पर केसीसी का लाभ ले चुके हैं.
सुबोधकांत सहाय ने किया था उद्घाटन
7 सितम्बर, 2009 को तत्कालीन केन्द्रीय खाद्य प्रसंस्करण मंत्री सुबोधकांत सहाय ने समाहरणालय भवन में किसान हेल्प डेस्क केंद्र का उद्घाटन किया था. राज्य स्तरीय किसान हेल्प डेस्क सह ऋण सलाह केंद्र की स्थापना सांस्थिक, वित्त एवं कार्यान्वयन विभाग, झारखंड राज्य स्तरीय बैंकर्स समिति की कृषि उप समिति (एसएलबीसी) तथा किसान महासभा, झारखंड के संयुक्त तत्वावधान में की गयी थी. फिलहाल किसान हेल्प डेस्क सरकार से हेल्प की आस लगाये बैठा है.

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टेलिफोनिक सेवा है फेल, कंप्यूटर भी दो बरसों से पड़ा है डेड
किसान हेल्प डेस्क का उपयोग राज्य के सुदूरवर्ती इलाकों के किसान भी कर सकें, इसके लिए हेल्प डेस्क में एक टेलिफोनिक कनेक्शन दिया गया. 0651-2217223 पर कोई भी फोन करके केसीसी सम्बन्धी परामर्श या फिर सरकार की किसान सम्बन्धी खेती बाड़ी स्कीम के बारे में जानकारी ले सकता था. लाभुकों का रिकॉर्ड रखने और अन्य कामों के लिए एक कंप्यूटर, प्रिंटर की भी व्यवस्था थी.
2011 में टेलीफोन बिल नहीं चुकाये जाने के कारण फोन लाइन काट दी गयी. यानी फोन की घंटी यहां नौ सालों से नहीं बज रही. एक कंप्यूटर था जो पिछले दो सालों से बेकार होकर बंद पड़ा है. अब स्थिति यह है कि जिस किसी किसान को हेल्प डेस्क के बारे में पता चलता है, वह आस लगाये यहां आता है. दो स्टाफ हैं, जिन्हें 8 बरसों से एसएलबीसी (राज्य स्तरीय बैंकर्स समिति) की ओर से एक रुपया किसी भी मद में नहीं मिल सका है. दो स्टाफ के खर्च के अलावा ऑफिस के लिए आवश्यक स्टेशनरी और अन्य चीजों के लिए होनेवाले खर्च की जवाबदेही उसी की है.
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सभी 24 जिलों में खुलना था हेल्प डेस्क, रांची में ही सिमटा रहा हेल्प डेस्क
किसान हेल्प डेस्क सह ऋण परामर्शी केंद्र की जरूरत सभी जिलों में महसूस की गयी थी. पूर्व कृषि मंत्री मथुरा महतो के समय वर्ष 2009-10 में राज्य के चौबीसों जिले में एक किसान हेल्प डेस्क खोले जाने की योजना बनी थी. हालांकि इसे ठंडे बस्ते में ही डाल दिया गया है.
ऐसे में राज्य के दूर-दराज के किसानों के लिए किसान हेल्प डेस्क, रांची पहुंचकर मदद मांगना आसान नहीं. पूर्व में कृषि विभाग के स्तर से किसानों को जागरूक करने हेतु काउंसेलिंग प्रोग्राम हेल्प डेस्क कार्यालय में चलाये जाते थे. यह भी अब कई कारणों से सुस्त हो चुका है. प्रचार-प्रसार के अभाव में किसानों की उपस्थिति काउंसेलिंग में संतोषजनक दर्ज नहीं हो पाती.
किसान हेल्प डेस्क के बारे में सामान्यतः अब किसानों को भी जानकारी नहीं हो. ना तो उसकी अपनी कोई वेबसाइट है, ना ही संपर्क करने का दूसरा जरिया. अगर किसी किसान को इसकी मदद भी लेनी हो तो दूसरे जिलों से रांची आकर कृषि संबंधी जानकारी लेना हर लिहाज से खर्चीला है. सांस्थिक, वित्त एवं कार्यान्वयन विभाग, झारखंड सरकार ने पहल की थी कि सभी विभागों के पदाधिकारी हेल्प डेस्क केंद्र में किसान हितों से संबंधित जानकारियां साझा करेंगे. पर इस पर भी अमल होता नहीं दिखता.
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