
Faisal Anurag
न तो नीतीश कुमार मिट्टी में ही दफन हुए और न ही बाबूलाल मरांडी कुतुबमीनार से कूदे. दोनों ने ही भारतीय जनता पार्टी से गलबहियां कर लिया है. अपने शुरुआती दिनों में इन दोनों ही ने राजनीति में नैतिकता की सबसे ज्यादा दुहाई दी है. और दोनों ही दलबदल को लोकतंत्र के लिए घातक बताते रहे हैं.
पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर कहा करते थे, राजनीति संभावनाओं का खेल है. इसका एक मतलब तो यह है कि राजनीति में विचार व उसूल सुविधाजनक पालाबदल की राह की बाधा नहीं हैं. चुनावों में दलबदलुओं को बार-बार सबक सिखाने वाले जनादेशों का सम्मान, अपवाद को छोड़कर, मध्यमार्गी दल प्रायः नहीं ही करते हैं. दलबदल भी लोकतंत्र की दुहाई दे कर ही की जाती है.
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भारतीय राजनीति का सबसे त्रासद पक्ष यह है कि मतदाता किन राजनीतिकों पर यह भरोसा करें कि उनके वोट का सौदा नहीं हो. एकबार वोट देने के बाद वोटर एक दर्शक भर रह जाता है. 1974 के आंदोलन की सबसे बड़ी मांगों में एक प्रतिनिधि वापसी की भी आवाज बुलंद की गयी थी.
इस नारे को बुलंद करने वाले ही लोग आज तमाम मध्यमार्गी दलों के निर्णायक हैं. और केंद्रीय सत्ता में भी हैं. अनुभव बताता है कि सत्ता की आकांक्षा में दलबदल अब उनके लिए लोकतंत्र की कमजोरी नहीं है. वास्तविकता तो यह है कि कोई भी लोकतंत्र बगैर सामूहिक नैतिक आचरण ओर मानदंड के बिना कारगर नहीं हो सकता है.
लोकतंत्र का सहारा ले कर ही हिटलर जैसा फासिस्ट जर्मनी में सत्ता में आया था. और तमाम लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं, संस्थाओं ओर मान्यताओं को फौजी बूटों से रौंद दिया था. 1947 के बाद आजाद हुए देशों में अनेक ऐसे भी हैं, जिन्होंने लोकतंत्र का लिबास उतार कर तानाशाही को अपना लिया है और अपनी तानाशाही को लोकमान्यता देने का नाटक भी करते हैं.
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झारखंड और बिहार तो दलबदल के साथ जनादेश का सौदा करने की होड़ में हरियाणा के मुकाबले खड़े हो गये हैं. हरियाणा के दो नेताओं की तरह आया राम गया राम का रिकार्ड तोड़ने वाले कई नेका हैं. भजनलाल के रिकार्ड की बराबरी तो नीतीश कुमार कर ही चुके हैं.
नीतीश कुमार ने भ्रष्टाचार को जीरो टालरेंस बता कर जिस तरह भाजपा को दोबारा गले लगाया, वह राफेल सहित अन्य विवादों में उन्हें नहीं दिखा. मोदी के 2014 में केंद्रीय राजनीति में आने के साथ उन्होंने कहा था भाजपा पहले वाली नहीं रही. और एनडीए भी. नीतीश के रहते वे सारे मुद्दे जो कभी एनडीए के हाशिये पर थे, आज भाजपा के लिए मुख्य हैं.
और एनडीए के घटक दलों ने मिल कर उन तामाम मामलों पर संसद में वोट किया. इसमें आर्टिकल 370 भी है. तीन तालाक भी. इसके अलावे कई सवाल अब नीतीश जी को परेशान नहीं करते थे. अब तो वे यह भी कहते नहीं सुने जा रहे हैं कि उनकी धर्मनिरपेक्षता को कोई चुनौती नहीं दे सकता. उनकी अंतरात्मा अब खामोश हो गयी है.
झारखंड में बाबूलाल मरांडी भी राजनीति में शुद्धता और नैतिकता पर जोर देते रहे हैं. लेकिन लोकसभा चुनाव के बाद से ही वे जिस तरह की भूमिका निभा रहे हैं, उसे लेकर कई हलकों में चर्चा होती रही है. अब तो उनके निकट सहयोगी रह चुके प्रदीप यादव भी आरोप लगा रहे हैं कि विधानसभा चुनाव के पहले ही मरांडी ने भाजपा से समझौता कर लिया था.
मरांडी अब तक यह नहीं समझा पा रहे हैं कि वे किन कारणो से भाजपा में जा रहे हैं. जबकि वे झारखंड विकास मोर्चा को राज्य का विकल्प बताते रहे हैं. मरांडी ने तब दलबदल के मामले को खूब उठाया. जब उनका साथ छोड़ उनके छह विधायक भाजपा में चले गये थे. उन विधायकों ने भी भाजपा के साथ झाविमो के विलय की बात कही थी.
मरांडी ने अपने दल से उन सभी लोगों को पहले तो कार्यसमिति से बाहर किया, जो विलय का विरोध कर सकते थे. और अपने दोनों विधायकों को बिना किसी छानबीन के बाहर कर दिया.
अभी जनोदश ताजा-ताजा है. झाविमों के तीनों विधायक जिसमें मरांडी भी शामिल हैं, भाजपा विरोधी मतों के कारण ही जीतने में सफल हुए थे. भाजपा के खिलाफ चुनाव लड़कर भाजपा में जाना तब किसी सवाल को जन्म नहीं दे सकता जब मरांडी विधायक से इस्तीफा लेकर, फिर मतदाताओं का समर्थन लेने जाते.
भाजपा ने ही कर्नाटक के 14 विधायकों का दलबदल करवाने के पहले उन्हें इस्तीफा दिलवाया. और फिर पार्टी का टिकट दिया. कांग्रेस जेडीएस सरकार गिराने के पहले इस आपरेशन कमल को अंजाम दिया गया. झारखंड में पहले भी भाजपा ऐसे विधायकों की मदद से ही सरकार बनाती रही है. जिन्होंने जनादेश के खिलाफ जा कर पाला बदला.
दलबदल लोकतंत्र की वह लाइलाज बीमारी है, जो सत्ता को अनियंत्रित करती है. और विकास के एजेंडे से बेपटरी भी करती है.
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