
- कोयला ट्रांसपोर्टरों के अधिवक्ताओं ने बुलायी प्रेस कांफ्रेंस
Ranchi: नक्सलियों को लेवी देने के मामले में झारखंड के कई कोयला कारोबारी को अभियुक्त बनाया गया है. जिन मामलों में कोयला कारोबारियों को अभियुक्त बनाया गया है, उसकी जांच नेशनल इंवेस्टीगेशन एजेंसी (एनआइए) कर रही है. कोयला कारोबारियों के अधिवक्ताओं ने पांच फरवरी को एक प्रेस कांफ्रेंस बुलाया है.
प्रेस कांफ्रेंस से संबंधित आमंत्रण पत्र में साफ कहा गया है कि एनआइए के द्वारा उद्योगपतियों, कोल ट्रांसपोर्टरों और उनके कर्मचारियों को परेशान किया जा रहा है. आमंत्रण अधिवक्ता मनोज कुमार मिश्र की तरफ से जारी किया गया है. जिसके मुताबिक, अधिवक्ता प्रवीण गुप्ता और शुभम गुप्ता पत्रकारों से बात करेंगे.
ऐसे में यह सवाल उठ रहा है कि क्या एनआइए के अधिकारी टेरर फंडिंग के नाम पर कोयला कारोबारियों को तंग कर रही है. उनका दोहन कर रही है. क्योंकि अधिवक्ताओं का कहना है कि जिन मामलों की जांच एनआइए कर रही है, उसमें उद्योगपति और कोल ट्रांसपोर्टर पीड़ित पक्ष हैं. उनसे नक्सलियों ने वसूली की है. लेकिन एनआइए के अधिकारी उद्योगपतियों और कोल ट्रांसपोर्टरों से अपराधी की तरह व्यवहार कर रहे हैं.
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NIA ने सुदेश केडिया को जेल भेजा था
उल्लेखनीय है कि पिछले दिनों एनआइए ने ऐसे ही एक मामले में कोल ट्रांसपोर्टर सुदेश केडिया को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया था. जबकि कुछ अन्य ट्रांसपोर्टरों के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट हासिल कर उनकी तलाश की जा रही है. कई मामलों में कुछ कोल ट्रांसपोर्टर लंबे समय से जेल में बंद हैं.
उल्लेखनीय है कि चतरा के टंडवा में टीपीसी नाम के उग्रवादी संगठन ने कोल ट्रांसपोर्टरों से हर माह करीब 15 करोड़ रुपये से अधिक की वसूली कई वर्षों तक की. चतरा से लेकर रांची पुलिस मुख्यालय तक के अधिकारी चुप्पी साधे रहे.
यहां तक कि सरकार के स्तर से भी कोई कार्रवाई नहीं की गयी. तत्कालीन एडीजी लॉ एंड ऑर्डर अनिल पाल्टा ने जब टीपीसी के खिलाफ कार्रवाई शुरु की, तब सरकार ने उन्हें उस पद से हटा दिया. उस वक्त रघुवर दास राज्य के मुख्यमंत्री थे और डीके पांडेय राज्य के डीजीपी.
वर्ष 2015 में इससे संबंधित खबरें मीडिया में आने के बाद पुलिस विभाग के अफसरों को लगने लगा था कि देर-सबेर इस मामले की जांच होगी. जिस कारण मामले की जांच को लेकर फेंका-फेंकी शुरु की गयी.
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एसआइटी गठन के बाद भी जांच शुरू नहीं हुई
चतरा एसपी ने मुख्यालय से जांच के लिये लिखा और पुलिस मुख्यालय ने जांच के लिए एसआइटी का गठन करने की अनुशंसा सरकार से की. तो मुख्य सचिव के स्तर से गृह सचिव को आदेश दिया गया कि लेवी वसूली की जांच की जाये और जरुरत पड़े, तो जांच के लिए एसआइटी का गठन की जाये. संचिका पर एसआइटी का गठन भी हुआ. पर आदेश नहीं निकला. नतीजा किसी भी स्तर से जांच शुरु नहीं की गयी.
आरोप है कि लेवी वसूली का एक बड़ा हिस्सा पुलिस अफसरों से लेकर सत्ता शीर्ष तक भी पहुंचता था. यही कारण है कि सरकार और पुलिस के अफसरों ने लेवी वसूली की जांच ही नहीं होने दी. मीडिया में लगातार खबरें प्रकाशित होती रही.
बाद में मामला एनआइए को सौंप दिया गया. अब एनआइए की जांच में कोल ट्रांसपोर्टरों को तो दोषी पाया जा रहा है, लेकिन जिम्मेदार पदों पर तैनात तब के अफसरों से पूछा तक नहीं जा रहा कि क्यों शिकायत मिलने के बाद भी कार्रवाई नहीं की गयी.
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