Opinion

डेमोक्रेसी इंडेक्स में भारत का 10 पायदान नीचे फिसलना तानाशाही के बढ़ते प्रभाव का संकेत

Faisal Anurag

डेमोक्रेसी इंडेक्स में भारत पांच  देशों की सूची से पहली बार बाहर हुआ है. दुनिया की लिबरल पत्रिका इकोनॉमिस्ट हर साल इस इंडेक्स को प्रकाशित करता है. 2018 में भारत इस इंडेक्स में 41वें स्थान पर था. 2019 के ताजा प्रकाशित इंडेक्स में वह 51वें स्थान पर है.

दुनियाभर में भारतीय लोकतंत्र की साख मानी जाती है और यह एक बड़ा ब्रांड माना जाता रहा है. लेकिन भारत के लोकतंत्र को लेकर यह सूची बेहद चिंताजनक तस्वरी पेश करती है. भारत के संविधान की प्रस्तावना में लोकतांत्रिक गणराज्य का सपना दर्ज है.

इकोनॉमिस्ट इंटेलिजेंस यूनिट ने इस इंडेक्स को तैयार किया है. ये संस्था प्रसिद्ध और सम्मानित पत्रिका दि इकोनॉमिस्ट का हिस्सा है. हालांकि इकोनॉमिस्ट का रूझान लिबरल पूंजीवादी है. बावजूद इस धारा से असमहत लोग भी इस पत्रिका को गंभीरता से लेते हैं.

इकोनॉमिस्ट की टिप्पणियों और शोध आलेख आमतौर पर दुनियाभर में हलचल मचाते हैं. यहां तक की पूंजीवादी राजनीतिक पार्टियों और नीतियों की आलोचना से वह परहेज नहीं करता है.

लोकतंत्र की स्थिति को लेकर इस सूची का भारत के संदर्भ में महत्व इसलिए भी है कि अन्य कई संस्थानों के इंडेक्स भी इसी से मिलते-जुलते निष्कर्ष दे रहे हैं. हाल में अमेरिका की एक बडी संस्था ने भारत के लोकतंत्र की स्थिति को लेकर गंभीर चिंता जाहिर किया है.

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2006 से दि इकोनॉमिस्ट इस इंडेक्स को जारी कर रहा है. तब से लेकर भारत दुनिया के पचास श्रेष्ठ लोकतंत्र की सूची में रही है. यह पहला अवसर है कि वह पचास की सूची से बाहर किया गया है. इस सूची में चार तरीके से देशों के हालात का आकलन किया जाता है. नार्वे में दुनिया का सबसे बढ़िया लोकतंत्र है.

जिन देशों में पूरा लोकतंत्र है, उन्हें शीर्ष बीस स्थान वाले देश माने जाते हैं. दस के अलावे तीन अन्य श्रेणियां हैं: कमजोर लोकतंत्र, हाईब्रिड लोकतंत्र और अधिनियमवादी. भारत को दूसरी सूची में जगह दिया गया है.

दक्षिण कोरिया भी 20वें स्थान पर है. शुरू के पांच देशों में नार्वे के अलावे आइसलैंड, स्वीडन,न्यूजीलैंड डेनमार्क है. चीन और उत्तरी कोरिया 165 देशों की इस सूची में नीचे के पायदान पर है. उरूग्वे भी पचास बेहतर लोकतंत्र में शामिल है.

लोकतंत्र की स्थिति का आकलन सरकार के कामकाज,चुनाव प्रक्रिया और बहुलतावाद,राजनीतिक भागीदारी व राजनीतिक संस्कृति तथा नागरिक स्वतंत्रता के आधार पर किया जाता है. भारत दस अंक यदि फिसला है तो इसके लिए जो कारण द इकोनॉमिस्ट ने बताये हैं, वे भारत की छवि के लिए बेहद चिंताजनतक है.

पिछले सालभर की अनेक घटनाओं के कारण भारत के बहुलतावादी स्वरूप और नागरिक अधिकारों को इस इंडेक्स में गिरावट का कारण बताया गया है. आर्टिकल 370 को हटाए जाने के बाद कश्मीर में नागरिक अधिकरों को लेकर गंभीर आकलन किया गया है.

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इसके साथ ही भारत में नागरिक अधिकारों के क्षेत्र में रिकॉर्ड का लगातार कमजोर होना भी उसके फिसलने का प्रमुख कारण है. भारत का संविधान व्यक्ति की गरिमा और उसकी स्वतंत्रता की गारंटी करता है. बावजूद नागरिक आजादी का सवाल पिछले सालों में कमजोर हुआ है.

विरोधी स्वर से निपटने का जो रवैया भारत सरकार ने अपनाया है, उससे भारत की छवि प्रभावित हो रही है. न्यूजीलैंड की राजधानी में बुधवार को एक बड़ा प्रदर्शन भारत के नागरिकता कानून के विरोध में हुआ. इसमें न्यूजीलैंड की ग्रीन पार्टी की एक सांसद ने भी भाग लिया.

इस महिला सासंद ने न्यूजीलैंड की प्रधानमंत्री से अपील की है कि वह भारत के वर्तमान हालत पर सख्त रवैया अपनायें. न्यूजीलैंड के ऑकलैंड शहर में हो रहा ये प्रदर्शन दुनियाभर में हो रहे प्रदर्शनों में मायने में अलग है कि इसमें भारतीय मूल के लोगों के साथ न्यूजीलैंड के नौजवानों ने भी प्रभावी शिरकत की है. इन प्रदर्शनों का असर दुनियाभर में पड़ रहा है.

अमेरिका,कनाडा ऑस्ट्रलिया,फ्रांस,ब्रिटेन,अमेरिका सहित अनेक देशों में सीएए के खिलाफ प्रदर्शनों ने विश्व मीडिया को आकर्षित किया है. दुनिया के अनेक बड़े अखबारों में इसे लेकर लिखा गया है. अमेरिकी अखबारों का स्वर तो तीखा है. भारत की वैश्विक छवि इससे प्रभावित हो रही है.

अधिनायकवादी देशों में लोकतंत्र के अभाव को लेकर विश्व जनमत का चिंतित होना स्वाभाविक ही है. भारत के आसपास के देशों में भी जिस तरह लोकतंत्र के नाम पर मजाक हो रहा है, उससे एशिया की एक निरंकुश छवि ही बनती है.

हांगकांग के छात्रों के आंदोलन से पूरी दुनिया वाकिफ है और उससे सहानुभूति रखती है. चीन अपने अधिनाकवादी रूझानों के कारण बदनाम देश है. पश्चिम ने लोकतंत्र को सारी दुनिया में सर्वस्वीकार अवधारणा बना दिया है.

हालांकि पश्चिमी मॉडल के लोकतंत्र की भी अपनी सीमा है. बावजूद व्यक्ति की गरिमा और विरोध के अधिकार के साथ अनेक सामाजिक इंसाफ के तत्व इस मॉडल के प्रमुख आयाम हैं, जिसे दुनियाभर के युवा सराहते हैं.

ट्यूनिशिया और मिश्र के तहरीक चौक के आंदोलनों का असर यह है कि उन देशों के आसपास भी अधिनायकवाद के खिलाफ बुलंद आवाज उठ रही है.

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