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“कर लो दुनिया मुट्ठी में” के बाद अंबानी घराने का “जियो दन दना दन…” के Condition Apply में देश फंसा तो नहीं!

Akshay Kumar Jha

बात 1995 की है. उस वक्त घर में लैंड लाइन होना एक सम्मान की बात होती थी. मोहल्ले भर में उस घर को फोन वाले घराने के नाम से जाना जाता था. फिर एक समय आया जब घर-घर में लैंडलाइन लगने लगे. जरूरतें बढ़ने लगी.

जरूरत को पूरा करने के लिए WLL (Wireless Local Loop) एक विकल्प के तौर पर सामने आया. बीएसएनएल ने सबसे पहले WLL फोन की सुविधा पब्लिक तक पहुंचायी.

अब गाड़ियों में भी फोन लेकर लोगों को सफर करते देखा जाता था. बीएसएनएल के अलावा दूसरी कंपनियों ने इस कारोबार में निवेश किया. फोन की जरूरत अब भारत में लत बनती जा रही थी.

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स्टूडेंट्स, सरकारी कर्मी, प्राइवेट कंपनियों में काम करने वाले और बिजनस मैन की पहली जरूरत फोन साबित होने लगी.
फोन की बढ़ती जरूरत को देखते हुए सन 2000 में मोबाइल फोन लोगों के हाथों में दिखने लगा था.

लेकिन आउटगोइंग और इनकमिंग कॉल इतनी महंगी थी कि उसको अफोर्ड करना बड़ा मुश्किल था. लेकिन मोबाइल फोन के बढ़ते बाजार के आकार ने मार्केट को थोड़ा सस्ता किया.

और 2002 में अंबानी घराने ने कर ली ‘दुनिया मुट्ठी में’

अब हम 2002 में प्रवेश कर चुके थे. भारत को बिजनस सिखाने वाला अंबानी घराना के इस फील्ड में धमक के बाद मानो बाजार में भूचाल आ गया.

टेलीकॉम सेक्टर में पहले से काम करने वाली बीएसएनएल, एयरटेल, वोडाफोन (हच), आइडिया, टाटा, एयरसेल और स्पाइस जैसी कंपनी के होश उड़ गए.

धीरू भाई अंबानी दुनिया छोड़ कर जा चुके थे. कंपनी की जिम्मेदारी जीएम के तौर पर मुकेश अंबानी और एमडी के तौर पर अनिल अंबानी के पास थी.

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धीरू भाई अंबानी ने जो अपने दोनों बच्चों को सिखाया था. उसे कर दिखाने का वक्त था. पिता अंबानी देश के लोगों की आदत जानते थे. उन्होंने अपने होनहारों को सिखाया था कि इंडिया में कुछ भी फ्री बांटो लोग मना नहीं करेंगे.

लेकिन सही वक्त पर वसूली कैसे करनी इसकी जानकारी हो, तभी फ्री में कुछ भी बांटने की हिम्मत करो. इसी ज्ञान के साथ अंबानी घराने ने धीरूभाई अंबानी के सम्मान में रिलायंस कम्युनिकेशन की शुरुआत की. सिर्फ 500 रुपए में फोन. सारे कॉल फ्री. इंटरनेट भी गाहे-बगाहे चलता था.

फिर क्या था. CDMA (Code Division Multiple Access) और GSM (Global System Of Mobile) दोनों तरह के मोबाइल मार्केट में आ गए.

पूरे देश में 933 और 9835 से शुरु होने वाले नंबर को बोल बाला था. लेकिन धीरे-धीरे सारे नंबर खत्म हो गए. अब जो नंबर बचे हैं, वो किसी और कंपनी में पोर्ट कर लिए गए हैं.

आखिर ऐसा हुआ क्या

अनिल धीरूभाई अंबानी ग्रुप (एडीएआर) के मुखिया अनिल अंबानी की प्रमुख कंपनी रिलायंस कम्युनिकेशन (RCom) की अगुवाई में कंपनी ने कमाई के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए.

2008 में इस कंपनी का मार्केट कैपिटल 1,65,917 करोड़ रुपए पर पहुंच गया. टेलीकॉम सेक्टर में कॉम्पीटीशन बढ़ने पर आरकॉम ने भी सस्ती कॉल दर, आकर्षक ऑफर्स की रणनीति अपनाई, लेकिन यही कदम इसके लिए घाटे का सौदा साबित हुए.
कंपनी ने ग्राहकों को मोबाइल थमाते वक्त पूरी जिंदगी फ्री कॉलिंग का वादा किया था.

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लेकिन उसमें ना समझ में आने वाली Condition Apply थे. कंपनी के अंदर क्या हुआ यह शोध का विषय हो सकता है. लेकिन धीरे-धीरे Rcom के सारे नंबर बंद होने लगे.

हालत यह हो गयी कि कंपनी का मार्केट कैपिटल 10 मई 2019 को घटकर 652 करोड़ रुपए पर आ गया है. अनिल धीरूभाई अंबानी ग्रुप (एडीएआर) के मुखिया अनिल अंबानी की प्रमुख कंपनी रिलायंस कम्यूनिकेशन (RCom) की दिवालिया प्रक्रिया शुरू हो गयी.

नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) ने आरकॉम की दिवालिया प्रक्रिया को मंजूरी दे दी. एनसीएलटी ने कंपनी के निदेशक मंडल को भंग करते हुए उसके संचालन के लिए पेशेवरों के एक समूह की नियुक्ति कर दी और सुनवाई शुरू हो गयी.

इतनी भारी भरकम बात लोगों को शायद ही समझ में आयी. इस बीच देश में नंबर पोर्टब्लिटी सिस्टम लागू हुआ. जिसे अपना पुराना नंबर चाहिए था, उन्होंने नंबर पोर्ट करा लिया. बाकी CDMA फोन बच्चों के खेलने के काम आने लगे और RCom के ग्राहक दुनिया को मुट्ठी में नहीं कर सके.

अंबानी घराने ने इस बार कहा “जियो दन दना दन…”

फिर से एक बार 2002 की ही तरह अंबानी घराने के बड़े भाई मुकेश अंबानी ने टेलीकॉम सेक्टर को हिला कर रख देने वाला प्लान बनाया. इस बार फ्री कॉलिंग के साथ इंटरनेट की लत ऐसी लगा दी, मानो इंटरनेट खुदा ही हो गया. वो भी फ्री…फ्री…फ्री.

इस काम को भी करने में उन्हें अपने पिता धीरू भाई अंबानी का ही ज्ञान काम आया. 2011-12 की बात है. देश भर में रिलायन्स जियो के 4G टावर लग रहे थे. 2014-15 से जियो का सिम मार्केट में आ गया.

दुकानों में लाइन लगा कर पब्लिक जियो का सिम लेने लगी. क्योंकि रिलायंस इसे फ्री में बांट रही थी. सिम के साथ लाइफ टाइम फ्री कॉलिंग और इंटरनेट की सेवा देने का वादा भी मिल रहा था.

फिर एक समय आया जब जियो ने नेट पैक और फ्री कॉलिंग के लिए पैकेज खरीदने पड़ने लगे. हर ऑफर में नेट पैक का पैसा लगने की बात थी और फ्री कॉलिंग एक तय अवधि तक देने का वादा था.

लेकिन एक बार फिर से हालात बदल रहे हैं. 10 अक्टूबर से जियो अब नए रिचार्ज करने वालों से दूसरे नेटवर्क पर बात करने के लिए पैसा ले रही है.

एक बार फिर से पब्लिक कुछ नहीं कह पा रही है. क्योंकि इस बार भी सिम लेते वक्त Condition Apply वाले पन्ने को किसी ने ठीक से देखने की जरूरत नहीं समझी थी.

अब देखने वाली बात होगी कि जियो का “दे दन दना दन…” का क्या होता है. क्या जिस तरह से एक बार फिर से जियो ने दुनिया को मुट्ठी में कर लिया है, उस गिरफ्त से पब्लिक निकल पाएगी. या सच में पब्लिक के साथ जियो ने “दे दन दना दन कर दिया.”

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